हमारे पाठकों से : पूंजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग के राजनीतिक अधिकारों का हनन कर रहा है

‘उदारीकरण और निजीकरण के तीस साल बाद’ तथा ‘सर्व हिन्द निजीकरण विरोधी मंच’ (ए.आई.एफ.ए.पी.) की स्थापना की रिपोर्ट, ये दोनों ही लेख मौजूदा हालात को देखते हुए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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हमारे पाठकों से : लेनिन और समाजवाद का निर्माण

बोल्शेविक पार्टी ने 7 नवम्बर, 1917 को अंतरिम सरकार को गिरफ़्तार करने के साथ ही देश के वित्त, संचार, परिवहन के सभी साधनों पर कब्ज़ा कर लिया। वित्त संस्थानों पर कब्ज़ा न करना, जो पेरिस कम्यून की असफलता का एक मुख्य कारण था, उस सबक को बोल्शेविक पार्टी ने याद रखा।

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हमारे पाठकों से: मजदूर वर्ग की एकता, वक्त की एक अविलंब जरूरत

मैं 4 जुलाई 2020 को प्रकाशित “मजदूर वर्ग की एकता, वक्त की एक अविलंब जरूरत” शीर्षक वाले सी.सी. स्टेटमेंट के जवाब में यह पत्र लिख रही हूँ। लेख में अपने हकों की लड़ाई लड़ने के लिए मज़दूर वर्ग की एकता के आह्र्वान से में पूरी तरह सहमत हूँ।

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हमारे पाठकों से : वैक्सीन उत्पादन पर इजारेदारी अधिकारों का विरोध किया जाना चाहिए!

मैं यह पत्र 13 मई, 2021 को हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित “वैक्सीन उत्पादन पर इजारेदारी अधिकारों का विरोध किया जाना चाहिए!” शीर्षक वाले लेख के सन्दर्भ में लिख रही हूं। लेख बहुत ही सही समय पर लिखा गया है और बड़ी फार्मा कंपनियों की घिनौनी हरकतों को, जिनका उपयोग वे हमेशा से अपने फायदे के लिए करते आए हैं और इस बार फिर कर रहे हैं, उनको सामने लाता है।

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हमारे पाठकों से: भारत की टीकाकरण नीति – स्वास्थ्य सेवा के निजीकरण की दिशा में बढ़ता एक और कदम

“कोविड टीकाकरण का निजीकरण जनविरोधी है” लेख में सही बयान किया गया है कि भारत की नई वैक्सीन नीति लोगों के कल्याण के लिए नहीं बल्कि निजी वैक्सीन उत्पादकों और निजी अस्पतालों के लाभ के लिए बनाई गई है।

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हमारे पाठकों से : भारतीय रेल का निजीकरण

मजदूर एकता लहर द्वारा प्रकाशित लेख, ‘भारतीय रेल का निजीकरण’ भाग 1 और भाग 2 में बहुत ही बारीकी और महत्वपूर्ण जानकारी पेश की है, जिससे आम लोगों तक इस जागरूकता को फैलाया जा सकता है कि भारतीय रेल के निजीकरण की असली वजह को छुपाया जाता रहा हैI

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हमारे पाठकों से: पेरिस कम्यून 150वीं वर्षगांठ 

मज़दूर एकता लहर द्वारा 10 अप्रैल को प्रकाशित लेख को पढ़ा, इसेे पढ़कर मानों धमनियों में रक्त के संचार की गति बहुत तीव्र हो गई। यह लेख ऐतिहासिक होने के साथ-साथ आज के लिए प्रासंगिक भी है। वर्तमान पूंजीवादी साम्राज्यवादी राज्य और उसके द्वारा खड़े किये गये स्तंभ तो सिर्फ यह प्रचार करने में लगे हैं कि यही अंतिम उन्नत व्यवस्था है और पूंजीवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है। अधिकांश पूंजीवादी पंडित समाज बनाने के लिए जिस रूपरेखा की बात करते हैं, दरअसल उसके अवशेष पेरिस कम्यून और बोल्शेविक क्रांति में निहित हैं…

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हमारे पाठकों से : वो कितने कायर हैं …

वो कितने कायर हैं हर एक की, हर एक आवाज़ से डरते हैं
वो डरते हैं कि कोई एक चिंगारी आग न बन जाये
वो डरते हैं कि लहरें सैलाब न बन जायें!
वो कितने कायर हैं …

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हमारे पाठकों से: बेरोज़गार हो गए अख़बार बाँटने वाले

कोरोना महामारी और लॉकडाउन के चलते, विभिन्न क्षेत्रों में तमाम श्रमिकों के रोज़गार के साधन ख़त्म हो गए हैं। सरकार बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घरानों को राहत पैकेज देने की बात कर रही है, परन्तु इन बेरोज़गार श्रमिकों के दुःख-दर्द शायद ही कभी सुर्खियों में आते हैं। मज़दूर एकता लहर के एक पाठक से हमें अख़बार बांटने वाले श्रमिकों की दुर्दशा के

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हमारे पाठकों से : आज़ादी के 73 साल बाद

3 सितम्बर को प्रकाषित लेख “आज़ादी के 73 साल बाद शोषण और दमन से मुक्त हिन्दोस्तान के लिए संघर्ष जारी है” में बहुत ही स्पष्ट रूप से बताया गया है कि कैसे दो धाराओं के बीच टकराव आज भी बरकरार है। और यह टकराव कोई नई बात नहीं हैं। तथाकथित आज़ादी के पहले और आज तक शासक वर्ग ने समझौते के रास्ते को अपनाया जो कि निजी स्वार्थ और मुनाफे की ओर जाता है।

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