हिन्द-अमरीकी रणनैतिक गठबंधन एक साम्राज्यवादी गठबंधन है! हिन्दोस्तान व दुनिया के लोगों के हितों तथा शान्ति के खिलाफ़ है!

अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा अमरीकी साम्राज्यवादियों और हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के बीच गठबंधन को मजबूत करने के लिये, हाल में हिन्दोस्तान आये। यह गठबंधन हिन्दोस्तान के मजदूरों और लोगों के लिये तथा दक्षिण एशिया और

अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा अमरीकी साम्राज्यवादियों और हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के बीच गठबंधन को मजबूत करने के लिये, हाल में हिन्दोस्तान आये। यह गठबंधन हिन्दोस्तान के मजदूरों और लोगों के लिये तथा दक्षिण एशिया और दुनिया में शान्ति और सुरक्षा के लिये बहुत खतरनाक है। शान्ति और जनता की खुशहाली चाहने वाली सभी ताकतों को इसका विरोध करना चाहिये।
अमरीकी साम्राज्यवादी दुनिया की सबसे खतरनाक ताकतों में से एक है। वह सारी दुनिया पर अपनी पूर्ण रणनैतिक और आर्थिक प्रधानता को जमाने के इरादे से, नियमित तौर पर जंग और हमले का इस्तेमाल करता है। उसने अफगानिस्तान और इराक पर अवैध रूप से सैनिक कब्ज़ा कर रखा है। उसने पाकिस्तान में राज्य के अन्दर और आतंकवादी गिरोहों के बीच में पैर जमा रखा है। ओबामा के शासन में भी अमरीकी राज्य उतना ही सैन्यवादी और साम्राज्यवादी है जितना कि वह बुश के शासन काल में था। वह सबसे लालची पूंजीवादी इजारेदार कंपनियों के लिये काम करता है। अमरीकी अर्थव्यवस्था में घोर संकट के चलते, अमरीकी साम्राज्यवादी पूंजीपति अधिकतम मुनाफे बनाने और संकट का बोझ दूसरों पर लादने के उद्देश्य से, बढ़ते हमलों और जंग का रास्ता अपना रहे हैं। परिवर्तन लाना तो दूर, ओबामा के सत्ता में आने के साथ-साथ, अमरीकी साम्राज्यवाद अफगानिस्तान में अपने पैर और मजबूती से जमा रहा है तथा उत्तरी कोरिया और ईरान के खिलाफ़ जंग का खतरा बढ़ा रहा है।
अपने देश में गहराते आर्थिक संकट और बढ़ती बेरोज़गारी का सामना करते हुये, अमरीकी सरकार निर्यात के लिये उत्पादन बढ़ाने के तरीके तलाश रही है। हिन्दोस्तान को एक महत्वपूर्ण बाजार माना जाता है। ओबामा के साथ-साथ अब तक सबसे बड़ा व्यापार प्रतिनिधिमंडल उपस्थित था। जैसा कि ओबामा ने खुद कहा, बढ़ते बाजारों में एशिया और खास तौर पर हिन्दोस्तान के महत्व का अत्यधिक अनुमान लगाना मुश्किल है। इसीलिये अमरीकी साम्राज्यवादी हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना चाहते हैं, ताकि यहां के विशाल बाज़ार में उनका माल आसानी से आ सके तथा हिन्दोस्तान के प्रचूर श्रम और कुदरती संसाधनों का शोषण् किया जा सके।
चीन का एक बड़ी ताकत बतौर उभरना दुनिया में अमरीकी साम्राज्यवाद की प्रधानता के लिये सबसे बड़े संभावित खतरों में से एक है। चीन की तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था और दुनिया के मंच पर बढ़ते प्रभाव के कारण्, अमरीकी साम्राज्यवादी चीन के अग्रसर से काफी घबराए हुये हैं। यह बात छुपी नहीं है कि अमरीकी साम्राज्यवाद हिन्दोस्तान का इस्तेमाल करके चीन को काबू में रखना चाहते हैं। कुछ प्रमुख यूरोपीय ताकतों के साथ अपने अन्तर्विरोधों में अमरीकी साम्राज्यवादी हिन्दोस्तान जैसे देशों के मंसूबों का फायदा उठाकर अपना पलड़ा भारी करना भी चाहते हैं।
हिन्दोस्तान की सरकार ने पलक पावड़े बिछाकर ओबामा का स्वागत किया। ओबामा की यात्रा के दौरान इराक और अफगानिस्तान में अमरीकी कब्जाकारी फौज की अवैधता या पाकिस्तान के इलाके के अंदर नाजायज़ अमरीकी बमबारी के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा गया। हिन्दोस्तान के शासक साम्राज्यवाद का विरोध करने को प्रेरित नहीं हैं, क्योंकि वे खुद एक साम्राज्यवादी ताकत के रूप में मान्यता प्राप्त करना चाहते हैं। विशाल आबादी वाले इस विस्तृत देश के हुक्मरान बतौर, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग दुनिया में एक बड़ी ताकत बनने के अपने उद्देश्य को हासिल करने की दिशा में पूरा प्रयास कर रहा है। परंपरागत तौर पर हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने खुद को दक्षिण एशिया इलाके में प्रधान ताकत माना है, परन्तु अब वह इतने से संतुष्ट नहीं हैं और इस इलाके से कहीं आगे फैलने के साम्राज्यवादी इरादों को हासिल करने में लगा हुआ है। दुनिया के इस इलाके पर प्रभुत्व जमाने में वह खुद को चीन का प्रतिद्वन्द्वी मानता है। शीत युध्द के बाद की दुनिया में, वह अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ मिलकर काम करने में अपने मंसूबों को हासिल करने का सबसे अच्छा मौका समझता है। खास तौर पर सोवियत संघ के पतन के बाद, उसने बड़े ध्यान से अमरीका के साथ एक रणनैतिक संबंध बनाया है और साथ ही साथ, रूस तथा पश्चिम यूरोप और एशिया की दूसरी ताकतों के साथ अपनी परंपरागत मित्रता को भी बनाये रखा है।
हाल के वर्षों में आई.टी. और अन्य क्षेत्रों में, खास तौर पर अमरीका को कुशल हिन्दोस्तानी श्रम के निर्यात से, हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों ने खूब मुनाफे कमाये हैं। हिन्दोस्तानी पूंजीपति अमरीकी इजारेदार कंपनियों के साथ बढ़-चढ़ कर सहयोग करने की जरूरत महसूस करते हैं, सिर्फ अमरीकी बाज़ार में हिन्दोस्तानी श्रम और माल के निर्यात के लिये ही नहीं, बल्कि कृषि और आधारभूत ढांचे जैसे कई क्षेत्रों में नयी प्रौद्योगिकी हासिल करने के लिये भी। दुनिया की अर्थव्यवस्था और खास तौर पर अमरीकी अर्थव्यवस्था के वर्तमान संकट की इस घड़ी में, दोनों पक्ष एक दूसरे की जरूरतों को समझते हैं।
बीते कई वर्षों से, अमरीका और हिन्दोस्तान में चाहे कोई भी पार्टी सत्ताा में रही हो, पर अमरीकी साम्राज्यवादियों और हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के बीच संबंधों को मजबूत करने के प्रयास क्रमश: जारी रहे हैं। बुश की अगुवाई में भूतपूर्व अमरीकी सरकार के साथ परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मीलपत्थर था। हिन्द-अमरीका रणनैतिक गठबंधन, जिसका परमाणु समझौता एक हिस्सा है, उसके तहत हथियारों के विकास के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहकार्य बहुत बढ़ गया है, और अमरीकी इजारेदार कंपनियों तथा हिन्दोस्तानी राज्य के बीच कई क्षेत्रों में सहयोग पहले से बहुत आसान हो गया है। बीते कुछ वर्षों में अमरीका और हिन्दोस्तान की सेनाओं के भूमि, समुद्र और आसमान में कई संयुक्त अभियान हुये हैं। ओबामा की हाल की यात्रा के दौरान, एक अहम बात यह हुई कि अमरीकी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट पाने की हिन्दोस्तानी राज्य की लंबे अरसे से चली आ रही आकांक्षा का समर्थन करने का सार्वजनिक तौर पर वादा किया।
जबकि हिन्दोस्तानी शासक वर्ग अपने तंग खुदगर्ज हितों के खातिर, इस गठबंधन को मजबूत करना चाहता है, तो वह अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ सहयोग भी करता है और स्पर्धा भी, और कुछ मामलों में अपना ही रवैया अपनाता है। मिसाल के तौर पर, उसने ईरान पर अमरीकी हुक्म को पूरी तरह नहीं माना है। उसने अमरीकी प्रस्ताव, जो ओबामा ने अपनी यात्रा के दौरान खुलेआम किया, कि पड़ौसी म्यानमार की पश्चिमी शैली के लोकतंत्र के प्रति वचनबध्दता के अभाव की आलोचना की जाए, को भी नहीं माना है। इसी तरह, जबकि हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने पाकिस्तान के साथ चल रहे झगड़े में बार-बार अमरीकी समर्थन जुटाने की कोशिश की है, तो अमरीकी साम्राज्यवादियों ने पूरी तरह उनका समर्थन नहीं किया है।
ओबामा की यात्रा अमरीका की बड़ी पूंजीवादी कंपनियों के लिये बहुत लाभदायक थी। उसके दौरान, निजी विमान कंपनियों और हिन्दोस्तानी वायु सेना के लिये अमरीकी इजारेदार कंपनी बोइंग से कई विमान खरीदने की योजना घोषित की गई और इजारेदार कंपनी जी.ई. से 10 अरब अमरीकी डालर से अधिक कीमत की बिजली संयंत्र सामग्री खरीदने के सौदे घोषित किये गये। ये तो सिर्फ वे सौदे थे जो यात्रा के दौरान घोषित किये गये, पर जाना जाता है कि आने वाले दिनों में बहुत से और ऐसे सौदे घोषित किये जायेंगे। यह अनुमान लगाया गया है कि 2020 तक हिन्दोस्तान के साथ व्यापार 1 खरब डालर तक बढ़ जायेगा।
ओबामा की यात्रा का एक महत्वपूर्ण नतीजा यह था कि हथियारों की बिक्री और हथियार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग को बहुत बढ़ावा दिया गया। ओबामा की यात्रा के ठीक बाद, हिन्दोस्तानी सेना ने अमरीकी भारी हथियारों का परीक्षण शुरू कर दिया, जो उसने कई वर्षों से नहीं किया था। परंपरागत तौर पर, रूस हिन्दोस्तान को हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर रहा है, जबकि हाल के वर्षों में इस्राइल भी एक महत्वपूर्ण सप्लायर बन गया है। ओबामा की यात्रा की तैयारी के दौरान अमरीकी सरकार ने हिन्दोस्तान को प्रौद्योगिकी और रक्षा संबंधी निर्यात पर नियंत्रण को ढीला करने में सहमति जतायी। हाल में यह रिपोर्ट की गई है कि हिन्दोस्तान का डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑरगेनाइज़ेशन अमरीकी प्रशासन के साथ उच्च प्रौद्योगिकी वाले सैनिक हथियारों में सहकार्य को सक्रियता से विकसित करने वाला है, जो कि उसने इससे पहले नहीं किया था।
हिन्दोस्तानी राजनीतिक दलों में माकपा समेत कुछ ऐसी ताकतें हैं जो कहती हैं कि हिन्द-अमरीका गठबंधन बराबरी का संबंधनहीं है, और इसे समस्या मानते हैं। परन्तु ये ताकतें यह नहीं समझाती हैं कि यह संबंध चाहे कितना ही बराबरी का या गैर बराबरी का हो, यह दोनों पक्षों के तंग, खुदगर्ज साम्राज्यवादी मकसदों से प्रेरित है, राष्ट्रों और लोगों को लूटने और उन पर रौब जमाने तथा इसके लिये सैनिक हमले को जायज़ ठहराने के मकसदों से प्रेरित है। ऐसा संबंध किसी भी देश के मेहनतकशों या दुनिया के लोगों के हित में नहीं हो सकता। अत: इस गठबंधन का विरोध करना उन सभी राजनीतिक ताकतों के लिये असूल का मामला है, जो हिन्दोस्तान और इस इलाके के लोगों की शान्ति और खुशहाली में रुचि रखती हैं।
हिन्दोस्तान के मजदूर वर्ग और मेहनतकशों ने हमेशा लालची अमरीकी साम्राज्यवाद और दुनिया भर में उसकी जंगफरोशी और लूट का विरोध किया है। इस विरोध को वर्तमान हालतों में आगे बढ़ाना होगा, जब हिन्दोस्तानी पूंजीपति हिन्दोस्तान और विदेश में लोगों की लूट को तेज़ी से बढ़ा कर खुद एक बड़ी ताकत बनने के रास्ते पर चल रहे हैं और अपने इरादों को हासिल करने के लिये अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ मिलकर नजदीकी से काम करने का रास्ता अपनाना चाहते हैं।
हिन्द-अमरीका रणनैतिक गठबंधन मुर्दाबाद!

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