प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश का उदारीकरण : अपने संसाधनों की लूट-खसौट का दरवाजा और खुला

वाणिज्य मंत्रालय के तहत औद्योगिक नीति व प्रोत्साहन विभाग (डी.आई.पी.पी.) ने 1अप्रैल, 2011से शुरू होने वाली एक “प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश (एफ.डी.आई.) की समेकित नीति” की घोषणा की है। सरकार के द्वारा विदेशी पूंजी पर पाबंदियों को क्रमशः हटा कर व नियंत्रण को घटा कर, एफ.डी.आई. को प्रोत्साहन देने के जारी प्रयासों का यह एक हिस्सा है।

वाणिज्य मंत्रालय के तहत औद्योगिक नीति व प्रोत्साहन विभाग (डी.आई.पी.पी.) ने 1अप्रैल, 2011से शुरू होने वाली एक “प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश (एफ.डी.आई.) की समेकित नीति” की घोषणा की है। सरकार के द्वारा विदेशी पूंजी पर पाबंदियों को क्रमशः हटा कर व नियंत्रण को घटा कर, एफ.डी.आई. को प्रोत्साहन देने के जारी प्रयासों का यह एक हिस्सा है।

इस नीति के प्रमुख बदलावों में बीज संबंधित नीति शामिल है। कृषि क्षेत्र में, बीजों व पौधों के विकास व उत्पादन में, अब बिना ‘नियंत्रित वातावरण‘ की शर्त के,  प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश को अनुमति मिली है। नियंत्रित वातावरण का मतलब होता है कि सिंचाई, तापमान, धूप, हवा की नमी तथा उगाने के माध्यम का ग्रीन हाऊसों, पॉली घरों, पालीघरों व दूसरे इस तरह के उन्नत साधनों के जरिये जलवायु का सूक्ष्मता से नियंत्रण करना। पहले से ही बागवानी, पुष्पकृषि, पशुपालन, मत्स्यपालन, साग-सब्जियों व मशरूम के उत्पादन से संबंधित क्षेत्रों में, शत-प्रतिशत  प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति थी। अर्थात, अब कृषि के अधिकांश कार्यकलापों व सेवाओं में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश पर नहीं के बराबर प्रतिबंध रहे हैं।

कृषि का क्षेत्र हिन्दोस्तान में एक बड़ा व्यवसाय बनता जा रहा है। देश और विदेश में प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बहुत जबरदस्त मांग है। उपज, फसल कटाई, माल वाहन तथा खाद्य पदार्थों की डिब्बाबंदी, जबरदस्त मुनाफे बनाने वाले निवेश के रूप में तेजी से उभर के आ रहे हैं। हिन्दोस्तान के कृषि व्यवसाय में नेसले, कैडबरी, हिन्दुस्तान लीवर, गोदरेज फूड्स एण्ड बेवरेजेस, डाबर, आई.टी.सी., ब्रिटेनिया जैसी बड़ी कंपनियां पैर जमा रही हैं। अनुमान है कि 2015तक हिन्दोस्तानी खाद्य पदार्थ उद्योग वर्तमान 181अरब डॉलर(8.15लाख करोड़ रु.) से बढ़ कर 258अरब डॉलर(11.6लाख करोड़ रु.) हो जायेगा।

विदेशी निवेश और विदेशी सहयोग/संयुक्त उद्यमों, दोनों की दृष्टि से उपभोग के खाद्य पदार्थों के क्षेत्र को उच्चतम प्राथमिकता दी जा रही है। कृषि उद्योग के दूसरे उपक्षेत्र जिन पर विदेशी पूंजी की नज़र है, गहरे समुद्र से मछली पकड़ना, एक्वा कल्चर, दूध और दूध के उत्पाद, मांस तथा मुर्गी पालन हैं। मोबाइल तकनीक के जरिये सूचना तथा सलाह देने जैसी कृषि संबंधित सेवाओं में भी, वर्तमान परिस्थिति में निवेश के लिये विशाल बजार है।

सरकार की प्रत्यक्ष विदेशी पूंजीनिवेश नीति अर्थव्यवस्था की उसी दिशा के अनुरूप है जो बिना किसी रुकावट से हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजी को अर्थव्यवस्था के किसी भी क्षेत्र में आने की आजादी देती है – चाहे वह देश के प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का मामला हो या शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि का। कृषि की यह दिशा सुनिश्चित करती है कि उत्पादन तथा व्यापार का संचालन सिर्फ सबसे बड़े इजारेदारों के मुनाफे को अधिकतम बनाने के लिये किया जायेगा। जैसा कि दूसरे क्षेत्रों में हुआ है, इस क्षेत्र में भी, पहले मुट्ठीभर बड़ी कंपनियों ने कुछेक क्षेत्रों में प्रवेश किया। इसकी सफाई में कहा गया कि कृषि उत्पादन, रख-रखाव व वितरण आधारभूत ढ़ांचा तैयार करने के लिये, और संवर्धन की जरूरी तकनीकें लागू करने के लिये, सिर्फ सरकारी निवेश पर्याप्त नहीं था। पंचवर्षीय योजनाओं के प्राथमिक वर्षों में तैयार किये गये, बीज, खेत, कृषि विस्तार सेवायें और उत्पादकों की मदद के लिये बनाये जनता के बड़े-बड़े यंत्रों को धीरे-धीरे बर्बाद होने दिया गया है। अब इन क्षेत्रों में इक्विटी फंडों के घुसने की परिस्थिति तैयार हो चुकी है (बॉक्स देखिये)। इसका मतलब है कि पूंजी तेजी से तब आयेगी जब अधिकतम मुनाफा बनाने का मौका होगा और उतनी ही तेजी से बाहर चली जायेगी जब ऐसा मौका हिन्दोस्तानी कृषि के बाहर मिलेगा।


कृषि में निजी पूंजी के घुसने का असर

पूंजी के हित के मुकाबले कृषि के हित की अधीनता से कीमतों में जबरदस्त अस्थिरता होगी। अभी से कपास जैसे माल की कीमतों में वृद्धि देखी जा चुकी है जिसमें सट्टा व्यापार होता है। क्रमशः वैश्विक पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था में सबसे बड़े बैंकों और निवेशक पूंजी के हित में हिन्दोस्तानी कृषि संकलित होती जायेगी। कृषि भूमि का आवंटन बढ़ते तौर पर इजारेदार विदेशी वित्तीय पूंजी के हित में निर्धारित किया जायेगा। बढ़ते तौर पर, खेतीबारी ठेके पर होगी और करोड़ों किसानों की जमीन के अधिग्रहण का खतरा होगा। या तो उन्हें बड़े निगमों का गुलाम बनना पड़ेगा या उन्हें अपनी जमीन बेच कर खेतीबारी छोड़नी पड़ेगी।

प्रत्यक्ष विदेशी पूंजीनिवेश और निजी निगमों के आगमन के लिये कृषि का दरवाजा खोलना सीधे तौर पर किसानों, मज़दूरों और मेहनतकश लोगों पर हमला है। कृषि, जो पोषण के लिये, खाद्य पदार्थों तथा अन्य जरूरी वस्तुओं के लिये कच्चे माल का उत्पादन है, उसे बड़े पूंजीवादी निगमों के अधिकतम मुनाफा बनाने की लालच के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है। पहले से ही हिन्दोस्तान की जनता, खाद्य तथा दूसरी हरेक जरूरी वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों से त्रस्त है। कृषि में निजी पूंजी की भूमिका और इसका पैमाना बढ़ाने से लोगों का हाल बद से  बदतर हो जायेगा।

कृषि में निजी पूंजी के प्रवेश का विरोध बहुत से किसान संगठनों ने किया है। इसे और आगे करना होगा। कृषि का हर पहलू – खाद्य पदार्थों का उत्पादन, भंडारण तथा वितरण, एक योजनाबद्ध तरीके से होना चाहिये। इसे उत्पादन करने वाले सहकारी और (भंडारण तथा वितरण के लिये) समाज के नियंत्रण में संगठनों के जरिये लागू करना चाहिये। जो निजी पूंजीवादी निगम आज खाद्य पदार्थों से मुनाफा बना रहे हैं उन्हें देश के हित में बिना मुआवजे के जब्त कर लेना चाहिये। कृषि या अर्थव्यवस्था के दूसरे कार्यकलापों में और निजीकरण की अनुमति नहीं मिलनी चाहिये। तभी, सभी मज़दूर वर्ग परिवारों को कृषि के उत्पादों की उपलब्धता स्थिर और उचित कीमतों पर सुनिश्चित करना संभव होगा।


 

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