व्यवस्था में मूलभूत बदलाव की मांग

परामर्श के सहभागियों ने अनेक उदाहरण दिये जिनसे यह स्पष्ट होता है कि राज्य का इस्तेमाल करके अपने आप को बड़ा बनाने में, इजारेदार पूंजीपतियों के बीच स्पर्धा न केवल हिन्दोस्तान में आम बात है बल्कि अमरीका, ब्रिटेन, आदि देशों में भी होती है। हर एक इजारेदार घराना इस कोशिश में रहता है कि दूसरों से होड़ में वह अपने लिये सबसे अच्छा सौदा पाये और इसके लिये उन्हें अपने खुद के मंत्रियों, अधिकारियों, पार्टियों, आदि की जरूरत होती है। भ्रष्टाचार इस अर्थव्यवस्था का हम सफर है। हमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिये कि अर्थव्यवस्था में इजारेदारी वर्चस्व को खत्म किये बिना, भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकता है। इस अर्थव्यवस्था के अंतर्गत ही कानूनों में बदलाव से या लोकपाल जैसी नई संस्थाओं को बना कर भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकता है, ऐसा मानना बहुत कठिन है।

परामर्श के सहभागियों ने अनेक उदाहरण दिये जिनसे यह स्पष्ट होता है कि राज्य का इस्तेमाल करके अपने आप को बड़ा बनाने में, इजारेदार पूंजीपतियों के बीच स्पर्धा न केवल हिन्दोस्तान में आम बात है बल्कि अमरीका, ब्रिटेन, आदि देशों में भी होती है। हर एक इजारेदार घराना इस कोशिश में रहता है कि दूसरों से होड़ में वह अपने लिये सबसे अच्छा सौदा पाये और इसके लिये उन्हें अपने खुद के मंत्रियों, अधिकारियों, पार्टियों, आदि की जरूरत होती है। भ्रष्टाचार इस अर्थव्यवस्था का हम सफर है। हमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिये कि अर्थव्यवस्था में इजारेदारी वर्चस्व को खत्म किये बिना, भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकता है। इस अर्थव्यवस्था के अंतर्गत ही कानूनों में बदलाव से या लोकपाल जैसी नई संस्थाओं को बना कर भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकता है, ऐसा मानना बहुत कठिन है।

राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ताओं, विद्वानों, वकीलों, पत्रकारों, महिला आंदोलन व ट्रेड यूनियन के कार्यकर्ताओं, छात्रों, नौजवानों और मजदूरों ने एक विस्तृत चर्चा के बाद निर्विरोध फैसला लिया है कि, लोगों को असली मालिक बनाने के लिये, अपने देश की राजनीतिक व्यवस्था, राजनीतिक प्रक्रिया और संस्थानों में मूलभूत बदलाव की जरूरत है।

लोक राज संगठन द्वारा आयोजित, ‘राजनीतिक व्यवस्था, राजनीतिक प्रक्रिया और संस्थानों पर लोगों का नियंत्रण कैसे सुनिश्चित किया जाए?’ विषय पर जन परामर्श सभा के आह्वान पर दिल्ली में 10 अप्रैल के दिन 250से भी अधिक कार्यकर्ता मौजूद थे।

लोक राज संगठन के अध्यक्ष, श्री एस. राघवन ने ध्यान दिलाया कि हर दिन एक नहीं तो दूसरे घोटाले, काले धन, गैर-कानूनी खनन, मानवाधिकारों के उल्लंघन या ऐसी दूसरी खबरें सुर्खियों में रहती हैं। इन सभी से इस बात की पुष्टि होती है कि लोगों के पास अपने जीवन और भविष्य पर नियंत्रण रखने के साधन नहीं हैं। अपनी पार्टियों व निर्वाचित प्रतिनिधियों के जरिये, अर्थव्यवस्था और राज्य व्यवस्था के हर पहलू पर पूंजीपति घरानों का ही नियंत्रण रहता है।

उन्होंने ध्यान दिलाया कि हर चुनाव ने यही दिखाया है कि प्रतिदिन देश को चलाने में,प्रतिनिधियों के चयन व चुनाव में, अपने अधिकारों की रक्षा में, कानून बनाने में, या खुद शासन करने के यंत्रों व संस्थानों के बनाने व नियंत्रण करने में, लोगों की भूमिका नहीं के बराबर है। लोग यह मांग कर रहे हैं कि कार्यपालिका, विधानपालिका और न्यायपालिका लोगों के हित में चलनी चाहिये और लोगों के नियंत्रण और निगरानी में रहनी चाहिये।

प्रकाश राव ने अपने वक्तव्य में हिन्दोस्तानी लोकतंत्र की तमाम बीमारियों पर बात रखी और ठोस तर्कों से यह साबित किया कि अगर हमें अपनी समस्याओं को हल करना है तो व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन करने की सख्त जरूरत है।

यह परामर्श एक ऐसे वक्त किया गया है जब खुद को मालामाल करने के लिये इजारेदार पूंजीपतियों, मंत्रियों और अधिकारियों द्वारा राजकीय तिजोरी की लूट पर लोग बेहद गुस्सा हैं। यह लोगों के बीच चल रही चर्चा की पृष्ठभूमि में किया गया है जिसमें लोग गंभीरता से प्रश्न उठा रहे हैं कि वर्तमान प्रतिनिधित्व का लोकतंत्र, लोगों द्वारा नियंत्रण रखने और अपने भविष्य के बारे में फैसले लेने में क्यों नाकामयाब है।

परामर्श में भाग लेने वाले लोगों ने इस सवाल को चर्चा के लिये उठाया कि इतनी समस्यायें क्या हम इसीलिये झेलते हैं कि सत्ता में कुछ खराब व्यक्ति घुसे हुये हैं या कि इस व्यवस्था में ही कुछ खामी है। अलग-अलग तर्कों से उन्होंने यह निष्कर्ष पाया कि समस्या व्यवस्था में है और सत्ता में बैठे व्यक्तियों को व्यवस्था के मुताबिक चलना पड़ता है। इसके समर्थन में अनेक उदाहरण दिये गये। व्यक्तियों की सोच से व्यवस्था नहीं बदल जाती। उल्टे, वे ही व्यक्ति व्यवस्था में आगे आते हैं जो अपने आप को व्यवस्था के अनुकूल ढालते हैं। अतः लोगों के हित सुनिश्चित करने के लिये व्यवस्था को पूरी तरह बदलना होगा।

परामर्श के सहभागियों ने अनेक उदाहरण दिये जिनसे यह स्पष्ट होता है कि राज्य का इस्तेमाल करके अपने आप को बड़ा बनाने में, इजारेदार पूंजीपतियों के बीच स्पर्धा न केवल हिन्दोस्तान में आम बात है बल्कि अमरीका, ब्रिटेन, आदि देशों में भी होती है। हर एक इजारेदार घराना इस कोशिश में रहता है कि दूसरों से होड़ में वह अपने लिये सबसे अच्छा सौदा पाये और इसके लिये उन्हें अपने खुद के मंत्रियों, अधिकारियों, पार्टियों, आदि की जरूरत होती है। भ्रष्टाचार इस अर्थव्यवस्था का हम सफर है। हमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिये कि अर्थव्यवस्था में इजारेदारी वर्चस्व को खत्म किये बिना, भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकता है। इस अर्थव्यवस्था के अंतर्गत ही कानूनों में बदलाव से या लोकपाल जैसी नई संस्थाओं को बना कर भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकता है, ऐसा मानना बहुत कठिन है।

परामर्श में गंभीरता से चर्चा हुई कि कैसे प्रतिनिधित्व के लोकतंत्र की बनावट ही, पूरे समाज पर सबसे ताकतवर आर्थिक हितों का वर्चस्व सुनिश्चित करती है। हिन्दोस्तान में, और अमरीका व ब्रिटेन जैसे सबसे विकसित पूंजीवादी देशों में सरकारें सबसे बड़े पूंजीपति घरानों के लिये काम करती हैं चाहे देश के अंदर का मामला हो या अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का। जब अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस या रूस के नेता अपने प्रधान मंत्री से चर्चा करते हैं तब वे अपनी सबसे बड़ी इजारेदार कंपनियों के विक्रेताओं की हैसियत से आते हैं। इसी तरह जब अपनी सरकार दूसरों से सौदा करती है तब वह हिन्दोस्तानी इजारेदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है। यह कोई आकस्मिक बात नहीं है। इन सभी देशों की राजनीतिक व्यवस्थायें यह सुनिश्चित करती हैं कि सिर्फ सबसे बड़े इजारेदारों का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकारें ही चुन कर आ सकती हैं।

चर्चा में ऐसा महसूस किया गया कि प्रतिनिधित्व के लोकतंत्र में न तो लोग अजेंडा तय कर सकते हैं और न ही फैसले ले सकते हैं। निर्वाचन आयोग या विधि मंत्रालय द्वारा प्रतिनिधित्व के इस लोकतंत्र में प्रस्तावित सुधारों से भी, फैसले लेने के अधिकार लोगों को नहीं मिलेंगे। सिर्फ प्रत्यक्ष लोकतंत्र ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि लोग खुद अपने फैसले लेंगे और राजनीतिक व्यवस्था, प्रक्रिया व संस्थानों पर नियंत्रण करेंगे।

सहभागियों ने ध्यान दिलाया कि प्रतिनिधित्व के लोकतंत्र में लोगों की भूमिका सिर्फ मतदान तक सीमित है। प्रतिनिधियों पर मतदाता का कोई नियंत्रण नहीं होता। इस पार्टीवादी व्यवस्था के अंदर जो राजनीतिक पार्टियां और गठबंधन सत्ता में आते हैं, वे लोगों को सत्ता से बाहर रखने वाले दरबानों का काम करते हैं जबकि वे सुनिश्चित करते हैं कि इजारेदार पूंजीपतियों के आज्ञा का पालन होता रहे।

परामर्श में भाग लेने वालों ने एक पर्यायी प्रत्यक्ष लोकतंत्र के बारे में चर्चा की, जिसका परीक्षण देश के अलग-अलग स्थानों पर किया जा चुका है। प्रत्यक्ष लोकतंत्र की बुनियादी पहचान है कि उम्मीदवारों का चयन खुद मतदाता करते हैं न कि राजनीतिक पार्टियां। राजनीतिक पार्टियां या गठबंधन सत्ता में नहीं आ सकते हैं। इसमें न तो सत्ताधारी पार्टी होगी और न ही विरोधी पार्टियां। जो भी चुन कर आते हैं उन्हें मिल कर शासन करना पड़ेगा। जो चुन कर आते हैं उन्हें नियमित तौर पर मतदाताओं को अपने काम का ब्यौरा देना होगा। जिन प्रतिनिधियों को मतदाता अयोग्य पाते हैं उन्हें वापस बुलाने का तरीका भी मौजूद होना होगा। मतदाताओं को नये कानून बनाने की पहल लेने का अधिकार होना चाहिये। ऐसे प्रस्ताव कार्यकर्ताओं के देश के विभिन्न इलाकों की मौजूदा राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने के ठोस अनुभव से और उनके द्वारा प्रत्यक्ष लोकतंत्र की प्रक्रिया का अन्वेषण करने के परीक्षणों से आये थे।

सहभागियों ने जोर दिया कि वे राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ़ नहीं हैं। कमजोर और दबे-कुचले लोगों को संगठित करने और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागृत करने की एक अहम भूमिका राजनीतिक पार्टियों की होती है।

परामर्श एक सकारात्मक वातावरण में संपन्न हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों से आये कार्यकर्ता अपने खुद के अनुभवों के आधार पर एक जैसे निर्णय पर पहुंचे थे। यह फैसला लिया गया कि ऐसे ही परामर्शों को देश के अलग-अलग इलाकों में दोबारा किया जाये। यह भी फैसला लिया गया कि प्रत्यक्ष लोकतंत्र की चर्चा को और विकसित किया जाये। यानि कि, संविधान लिखने और उसमें संशोधन करने का अधिकार किसके पास होना चाहिये, न्यायपालिका और अन्य संस्थानों के कर्मियों के चयन और निर्वाचन का अधिकार किसके पास होना चाहिये, इन सब पर चर्चा जारी रखने की आवश्यकता है। इस विषय पर भी चर्चा करने की जरूरत महसूस की गयी कि संविधान कैसा होना चाहिये ताकि व्यवस्था, प्रक्रिया और संस्थान लोगों के नियंत्रण में हो और उनके अधिकारों को लागू करने के यंत्रों से सम्पन्न हों।

मजदूर एकता लहर यह मानती है कि ऐसी नई राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया जिसमें मजदूर, किसान और दूसरे मेहनतकश खुद अपने भविष्य के मालिक होंगे, इसकी रचना करने के आन्दोलन में यह परामर्श सभा एक महत्वपूर्ण कदम है।

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