मुंबई लोकल रेल के ड्राइवरों का आंदोलन

हाल ही में, 18 दिसम्बर, 2008 को पश्चिम रेलवे के ड्राइवरों ने, एक नयी तरह से, मुंबई के लोगों का ध्यान अपनी समस्याओं की तरफ आकर्षित किया। उन्होंने निर्णय लिया कि इस दिन वे बिना कुछ खाये-पिये गाड़ियां चलायेंगे। रात तक कई ड्राइवर कमजोर हो गये व उन्हें चक्कर आने लगे और उनकी हालत इतनी खराब हो गयी कि बिना चिकित्सा के गाड़ी चलानी असंभव हो गयी। अत: पश्चिम रेलवे की लोकल रेल सेवा तीन घंटे तक ठप्प हो गयी।

हाल ही में, 18 दिसम्बर, 2008 को पश्चिम रेलवे के ड्राइवरों ने, एक नयी तरह से, मुंबई के लोगों का ध्यान अपनी समस्याओं की तरफ आकर्षित किया। उन्होंने निर्णय लिया कि इस दिन वे बिना कुछ खाये-पिये गाड़ियां चलायेंगे। रात तक कई ड्राइवर कमजोर हो गये व उन्हें चक्कर आने लगे और उनकी हालत इतनी खराब हो गयी कि बिना चिकित्सा के गाड़ी चलानी असंभव हो गयी। अत: पश्चिम रेलवे की लोकल रेल सेवा तीन घंटे तक ठप्प हो गयी। इससे पहले, 28 अक्तूबर को मध्य रेलवे तथा हार्बर लाईन के ड्राइवर आकस्मिक हड़ताल पर उतरे थे। वे सरकार के एक सर्कुलर का विरोध कर रहे थे, जिसमें उनके ओवरर्टाईम की सूची तय करने में उनकी पसंद को नकारा गया था।

मुंबई लोकल रेलगाड़ियों के ड्राइवर कई वर्षों से अपनी अमानवीय कार्य-परिस्थिति और अपर्याप्त वेतन व सुविधाओं का विरोध करते आये हैं। उन्होंने सरकार को कई अभिवेदन भेजे परन्तु अधिकारियों ने उनकी एक न सुनी। अपनी पुरानी शिकायतों पर ध्यान दिलाने के लिये उन्हें मजबूरन आकस्मिक हड़ताल व भूख हड़ताल पर उतरना पड़ा है।

रेलगाड़ियों को चलाने वाले ड्राइवरों पर भारी जिम्मेदारी रहती है। उदाहरण के लिये, मुंबई लोकल रेलगाड़ी में पूरी रेलगाड़ी की जिम्मेदारी सिर्फ एक ड्राइवर पर होती है। लम्बी दूरी तक चलने वाली गाड़ियों की तुलना में, लोकल में सहायक ड्राइवर तक नहीं होता। हाल में स्टेशन गार्ड की जिम्मेदारी भी ड्राइवर पर ही डाल दी गयी है। अत: उन्हें यात्रियों के चढ़ने-उतरने तथा सिगनल बदलने, आदि सब पर खुद ही पूरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। पूरी वापसी यात्रा के दौरान (जैसे कि चर्चगेट से विरार की गाड़ी में, जिसको 3 से 4 घंटे लगते हैं), उन्हें शौचालय या चाय के लिये अवकाश नहीं मिलता। उन्हें परिवार वालों के साथ कोई छुट्टी बिताने की सुविधा नहीं मिलती, और 365 दिन डयूटी के लिये तैयार रहना पड़ता है। महीने में उन्हें सिर्फ पांच बार 22 घंटे की अवधि की छुट्टी मिलती है और यह कब होगी, वह भी सुनिश्चित नहीं होता। आकस्मिक छुट्टी के लिये भी उन्हें पहले से अनुमति लेनी पड़ती है। बहुत बार ड्राइवर को सिर्फ 4 घंटे सोने को मिलता है और 10 से 12 घंटे की पाली करनी पड़ती है। इससे न केवल उनके पारिवारिक व सामाजिक जीवन पर असर होता है बल्कि यात्री सुरक्षा पर भी हानिकारक असर हो सकता है।

एक तरफ तो रेल विभाग नये ड्राइवर की भर्ती नहीं कर रहा है और न ही दूसरे कर्मचारियों को ड्राइवर बनने के लिये प्रशिक्षण दे रहा है तथा वर्तमान ड्राइवर के लिये ओवरटाइम अनिवार्य कर रहा है। दूसरी तरफ, छठे वेतन आयोग में ड्राइवरों को अपने वेतन के बारे में भेदभाव महसूस होता है। वे चाहते हैं कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों पर पुन:परीक्षण हो, ताकि उनके वेतनमान भी दूसरे सरकारी कर्मचारियों के वेतनमानों के बराबर हो जाये। ड्राइवरों की मांगें जायज हैं। इन मांगों का रेलवे प्रशासन द्वारा जल्दी समाधान कराने में, मज़दूर एकता लहर ड्राइवरों के साथ है।

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