मजदूरों को नौकरी से निकालने के अलावा क्या ”कोई और चारा नहीं” है?

पूंजीपति एक के बाद एक क्षेत्र से मजदूरों को नौकरियों से निकाल रहे हैं। हिन्दोस्तान में निर्यात प्रेरित उद्योगों में लाखों मजदूर अपनी नौकरियां खोये हैं, क्योंकि निर्यात तेजी से घट रहे हैं। मोटर गाड़ी, इस्पात, सीमेंट, टी.वी., फ्रिज, इत्यादि जैसी कई सामग्रियों की घरेलू मांग भी घट गयी है। फैक्टरियां उत्पादन में कटौती कर रही हैं। फैक्टरी मालिक काम की पालियों को घटा रहे हैं या लंबे समय के लिये, कभी

पूंजीपति एक के बाद एक क्षेत्र से मजदूरों को नौकरियों से निकाल रहे हैं। हिन्दोस्तान में निर्यात प्रेरित उद्योगों में लाखों मजदूर अपनी नौकरियां खोये हैं, क्योंकि निर्यात तेजी से घट रहे हैं। मोटर गाड़ी, इस्पात, सीमेंट, टी.वी., फ्रिज, इत्यादि जैसी कई सामग्रियों की घरेलू मांग भी घट गयी है। फैक्टरियां उत्पादन में कटौती कर रही हैं। फैक्टरी मालिक काम की पालियों को घटा रहे हैं या लंबे समय के लिये, कभी-कभी हफ्ते भर के लिये उत्पादन रोक रहे हैं। कई कारोबारों में सभी अस्थायी मजदूरों की छंटनी हुई है और स्थायी मजदूरों को जबरदस्ती छुट्टी पर भेजा जा रहा है। छोटे और मध्यम स्तर के कारखानों में मजदूरों के वेतन की वृध्दि रोक दी गयी है। नौकरी बचाने का संघर्ष चल रहा है।

पूंजीपति और उनके अर्थशास्त्री यह कहते हैं कि मजदूरों को नौकरी से निकालने के सिवाय कोई और चारा नहीं है, क्योंकि चीजों की मांग घट रही है। मजदूर वर्ग यह तर्क नहीं मान सकता है और न ही उसे मानना चाहिये।

पूंजीपतियों की नज़र में मजदूरों के वेतन सिर्फ एक ''खर्च'' है जिसे कम से कम करना है ताकि पूंजीपतियों के मुनाफ़े अधिक से अधिक हों। जब भी पूंजीपतियों के मुनाफों के न बढ़ने या घटने का खतरा होता है, तब पूंजीपतियों की पहली सोच होती है ''मजदूरों पर खर्च'' में कटौती करना। इसके लिये, या तो नौकरियों की संख्या घटायी जाती है, या मजदूरों से ज्यादा उत्पादन करवाया जाता है, अतिरिक्त घंटों तक काम करवाया जाता है, ''स्वैच्छिक'' वेतन स्थगन थोपा जाता है या वेतन में कटौती भी की जाती है।

मजदूरों को पूंजीपतियों के ''कोई और चारा नहीं'' के इस तर्क को ठुकराना होगा। उत्पादन का उद्देश्य सिर्फ पूंजीपतियों के मुनाफों को अधिक से अधिक बढ़ाना ही क्यों हो – इस तर्क को मजदूरों को खारिज करना होगा। सामाजिक उत्पादन का मुख्य उद्देश्य सभी मेहनतकशों को आरामदायक जीवन जीने के साधन दिलाना क्यों न हो? समाज के सभी सदस्यों के लिये रोज़गार की गारंटी क्यों न हो? अगर सभी लोगों की खरीदारी करने की शक्ति सुनिश्चित हो व बढ़ती जाये, तो अर्थव्यवस्था में मंदी और संकट की समस्यायें पैदा ही नहीं होंगी।

पूंजीवादी समाज में जब चीजों की मांग घटती है तो उसका कारण यह नहीं कि इन चीजों की जरूरत नहीं है या कम मात्रा में जरूरत है। उसका कारण यह है कि लोगों को अपनी जरूरत की चीज़ें खरीदने के लिये पर्याप्त वेतन नहीं मिलता है।

जब किसी मौसम संबंधी या कुदरती कारण या किसी और कारण से किसी वस्तु की मांग कुछ समय के लिये घट जाती है, तो मजदूरों को उपयोगी तरीके से काम पर रखने के कई रास्ते हो सकते हैं, अगर मजदूरों को सिर्फ ''खर्च'' की नज़र से न देखा जाये। ऐसे घाटे के समय पर, मजदूरों को अपनी क्षमतायें बढ़ाने या नई क्षमतायें प्राप्त करने का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। फैक्टरी में काम के घंटों को घटाया जा सकता है ताकि सबकी नौकरी बनी रहे और बाकी समय शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, जलापूर्ति, शौच प्रबंधन जैसे सामुदायिक सेवाओं में लगाया जा सकता है।

पूंजीपतियों के हमेशा ही अधिकतम मुनाफे कमाने के ''अधिकार'' को चुनौती देकर, मजदूरों को अपनी नौकरियां बचाने के लिये तत्कालिक संघर्ष करना होगा। इस संघर्ष में मजदूरों का सर्वोपरि उद्देश्य अपने वर्ग का ऐतिहासिक उद्देश्य होना चाहिये, पूंजीवाद का तख्तापलट करके उसकी जगह पर समाजवाद की स्थापना करने का उद्देश्य।

पूंजीवाद को दूर करके समाजवाद की स्थापना करने का मतलब है उत्पादन के साधनों की मालिकी को बदलना। इसका यह मतलब है कि फैक्टरियों, खदानों और बागानों की मालिकी निजी हाथों से बदल कर सामाजिक हो जायेगी। समाजवादी अर्थव्यवस्था का उद्देश्य है मेहनतकश बहुसंख्या का अधिक से अधिक सामाजिक कल्याण करना, न कि चंद मुनाफाखोरों के निजी मुनाफों को बढ़ाना, जैसा कि आज होता है।

समाजवादी अर्थव्यवस्था में मजदूरों के वेतन को उत्पादन का खर्च नहीं माना जायेगा। सभी मेहनतकशों के जीवन स्तर में उन्नति लाना उत्पादन का मकसद होगा। ऐसी सामाजिक व्यवस्था ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि रोजगार और रोजगार की सुरक्षा का अधिकार सभी के लिये एक हकीकत होगी।

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