अफ्रीका में हिन्दोस्तान की बढ़ती मौजूदगी

अपने मुनाफे को निरंतर बढ़ाने के प्रयास के एक हिस्सा बतौर हिन्दोस्तानी पूंजीपति देश में और विदेशों में भी अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। पूंजी के लिये लाभकारी क्षेत्रों में निवेश के साथ-साथ, वे नये बाजारों, उर्जा के स्रोतों व कच्चे माल की खोज में रहते हैं। हाल के वर्षों में ऐसे क्षेत्रों में एक क्षेत्र, जिसमें उनकी मौजूदगी तेजी से बढ़ी है, नाना संसाधन संपन्न अफ्रीका है।

अपने मुनाफे को निरंतर बढ़ाने के प्रयास के एक हिस्सा बतौर हिन्दोस्तानी पूंजीपति देश में और विदेशों में भी अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। पूंजी के लिये लाभकारी क्षेत्रों में निवेश के साथ-साथ, वे नये बाजारों, उर्जा के स्रोतों व कच्चे माल की खोज में रहते हैं। हाल के वर्षों में ऐसे क्षेत्रों में एक क्षेत्र, जिसमें उनकी मौजूदगी तेजी से बढ़ी है, नाना संसाधन संपन्न अफ्रीका है।

काफी वर्षों पहले गुट निरपेक्ष आंदोलन के आधार पर, हिन्दोस्तानी राज्य के अफ्रीका के कुछ चुनिंदा देशों के साथ व्यापारिक संबंध थे, परन्तु आम तौर पर, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने अफ्रीका के साथ व्यापारिक व आर्थिक संबंधों को विकसित करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि वे इस क्षेत्र को ”पिछड़ा“ समझते थे। कुछ वर्ष पहले, सोवियत संघ व समाजवादी गुट के देशों से आर्थिक सांझेदारी खत्म हो जाने के पश्चात, वैश्वीकरण व उदारीकरण की पृष्ठभूमि में हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों के संवर्धन तथा अफ्रीका में  चीन की बढ़ती भूमिका के फैलने के डर से, इनमें बदलाव आने लगा।

जबकि चीन ने अफ्रीका के देशों के साथ आर्थिक व अन्य संबंध बनाने पर गंभीरता से प्रयत्न 1990 के दशक के अंत से ही शुरु कर दिये थे, हिन्दोस्तानी राज्य व बड़े पूंजीपतियों ने ऐसा करीब 2004 से किया। प्रतिवर्ष 5000 करोड़ डॉलर के व्यापार के साथ चीन अब अफ्रीका का तीसरा सबसे बड़ा सांझेदार है। पिछले 5 ही वर्षों में, हिन्दोस्तान का अफ्रीका के साथ व्यापार 500 करोड़ डॉलर से बढ़ कर 2500 करोड़ डॉलर हो गया है। वर्तमान में अफ्रीका में हिन्दोस्तान के सरकारी निवेश बतौर 200 करोड़ डॉलर से अधिक है जबकि निजी निवेश 500 करोड़ डॉलर से भी अधिक है।

2006 में चीन ने बेजिंग में 40 अफ्रीकाई देशों का एक शिखर सम्मेलन आयोजित किया था। उसके बाद हिन्दोस्तानी सरकार ने 2008 में दिल्ली में अपने इंडिया-अफ्रीका फोरम की सभा बुलाई। इस शिखर वार्ता में हिन्दोस्तानी सरकार ने उस क्षेत्र के लिये 4 वर्ष की अवधि के लिये 540 करोड़ डॉलर का कर्ज उपलब्ध कराने की घोषणा की। जिन परियोजनाओं में हिन्दोस्तान की भूमिका है उनमें मोज़ाम्बीक व इथियोपिया में ग्रामीण विद्युतीकरण, लेसोथो में आई.टी. प्रशिक्षण केन्द्र, सेनेगाल व माली देशों में रेलवे, कोन्गो में सीमेंट फैक्टरी, घाना में राष्ट्रीय वैधानिक संकुल तथा सियेरा लियोन में सैन्य आवास शामिल हैं।

2008 की शिखर वार्ता के बाद इस वर्ष जनवरी में उपराष्ट्रपति हमीद अंसारी ने दक्षिणी अफ्रीका के तीन देशों का दौरा किया। दो दशकों से भी अधिक अवधि में हिन्दोस्तान के किसी उच्च अधिकारी का यह पहला दौरा था। इस भेंट के दौरान जाम्बिया, मालावी तथा बोट्सवाना में विभिन्न परियोजनाओं के लिये और भी कर्ज उपलब्ध कराया गया। कर्ज की शर्त है कि परियोजनाओं के लिये माल व उपकरणों का 85 प्रतिशत हिन्दोस्तान से खरीदा जायेगा। इससे हिन्दोस्तान की बड़ी कंपनियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के लिये बढ़ता बाजार सुनिश्चित किया गया है। हिन्दोस्तानी राज्य की मालावी की मूल्यवान यूरेनियम खदानों व सूरत के हीरा तराशनें के उद्योगों के लिये बोट्सवाना के हीरों में खास दिलचस्पी है।

हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपति अफ्रीका में अपना व्यापार बढ़ाने में व्यस्त हैं। उनमें से सबसे बड़ा है टाटा समूह, जिसकी मौजूदगी 14 देशों के यातायात, दूर संचार, हाईड्रो पावर तथा होटल व्यवसाय में हैं और उसका 160 करोड़ डाॅलर से भी अधिक पूंजी निवेश है। बड़े खिलाडि़यों में कुछ दूसरे नाम हैं औषधीय बड़ी कंपनी सिप्ला, विजय माल्या का यू.बी. ग्रुप, महिन्द्रा एंड महिन्द्रा, किर्लोस्कर तथा डॉ. रेड्डी, जो अफ्रीका में मौजूद हैं।

चीन के जैसे ही, हिन्दोस्तानी कंपनियां जल्दी से अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों के मालदार खनिजों व धातुओं तथा उर्जा संसाधनों पर कब्जा जमाना चाहती हैं। जाम्बिया की सबसे बड़ी तांबे की खदानों में वेदांत रिसोर्सेस 100 करोड़ डॉलर का निवेश कर रहा है जबकि राज्य की मालिकी में ओ.एन.जी.सी. ने नाईजीरिया, अंगोला व सूडान के तेलक्षेत्रों पर कब्जा जमा लिया है।

अफ्रीका में हिन्दोस्तानी कंपनियों द्वारा निवेश के क्षेत्रों में एक नया व ध्यान देने योग्य क्षेत्र है कृषि का। इथियोपिया, केन्या, मेडागास्कर, सेनेगाल व मोज़ाम्बिक में उन्होंने लाखों हेक्टेयर भूमि खरीद ली है। इन खेतों में वे चावल, गन्ना, मक्का, दालें, ताड़ का तेल, सब्जियां व दूसरी फसलें उगा रही हैं जिनकी बिक्री हिन्दोस्तान व अन्य तीसरे देशों में की जायेगी। अकेले इथियोपिया में ही, 80 से भी अधिक हिन्दोस्तानी कंपनियों ने बागानों की खरीद के लिये अनुमानित 150 करोड़ डॉलर निवेश किये हैं। इसमें सबसे बड़ी कंपनी बंगलूरू की कारूतुरी ग्लोबल है जिसने करीब 350000 हेक्टेयर जमीन खरीद ली है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा ”कृषि भूमि बैंक“ कहा जा रहा है। इस पर गहरी चिंता भी जताई जा रही है और इसे ”खाद्य पदार्थों का डाका“ भी कहा गया है क्योंकि इससे बड़ी तादाद में स्थानीय किसानों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा सकता है और उन देशों की खाद्य व्यवस्था का सर्वनाश किया जा सकता है।

अफ्रीका के संसाधनों के दोहन व अफ्रीकी बाजारों में बढ़ती दिलचस्पी के संदंर्भ में, हिन्दोस्तानी अधिकारी व प्रसार माध्यम अब हिन्दोस्तान व अफ्रीका के प्राचीन व्यापारिक व शिष्ट संबंधों के पुनर्जीवित होने के बारे में उत्साहपूर्वक बात कर रहे हैं। परन्तु याद रहे कि जब ऐसे संबंध अफ्रीका के लोगों को शोषणपूर्ण लगे हैं – जैसा कि बस्तीवाद के काल में था – तब लोगों की नाराजगी व गुस्सा हिन्दोस्तान व हिन्दोस्तानियों के खिलाफ रहा है। अफ्रीका के कई स्थानों पर, जहां पर ऐसा महसूस किया गया कि चीनी कंपनियों ने उन देशों का फायदा उठाया है, वहां पर उन कंपनियों के खिलाफ दंगे हुये हैं तथा उन चीनी कंपनियों के खिलाफ कदम लिये गये हैं। जब हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों का उद्देश्य आक्रमक तौर पर मुनाफा बनाना है तब अफ्रीका में वर्तमान हिन्दोस्तानी विस्तार का नतीजा भी ऐसा ही हो सकता है।

हिन्दोस्तानी राज्य व बड़े पूंजीपतियों की अफ्रीका में वर्तमान बढ़ती दिलचस्पी का अफ्रीका के लोगों के साथ दोस्ती के संबंध बनाने से कोई नाता नहीं है। विश्वव्यापी पूंजीवादी व्यवस्था में एक बड़ा खिलाड़ी बनने की चाहत रखने वाले, हिन्दोस्तानी एकाधिकारी पूंजीपति अफ्रीका को शोषण विस्तार के नये मोर्चे बतौर समझते हैं।   

Share and Enjoy !

Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *