पुणे में आतंकवादी हमले की भर्त्सना करें!

पुणे में 13 फरवरी, 2010 को एक खाने की जगह पर आतंकवादी हमले में 16 लोग मारे गये तथा दर्जनों अन्य बुरी तरह घायल हुए। मजदूर एकता लहर, इस आतंकवादी हमले पर अपना क्रोध प्रकट करती है और मृतकों तथा घायल लोगों के परिजनों के साथ हमदर्दी जताती है।

पुणे में 13 फरवरी, 2010 को एक खाने की जगह पर आतंकवादी हमले में 16 लोग मारे गये तथा दर्जनों अन्य बुरी तरह घायल हुए। मजदूर एकता लहर, इस आतंकवादी हमले पर अपना क्रोध प्रकट करती है और मृतकों तथा घायल लोगों के परिजनों के साथ हमदर्दी जताती है।

बार-बार वही सवाल उठते हैं। हिन्दोस्तान में आतंकवादी कत्लेआम क्यों हो रहे हैं? इनसे किसे लाभ हो रहा है और किसे नुकसान? इन आतंकवादी कत्लों के पीछे कौन-सी ताकतें हैं? क्या आतंकवाद की महामारी से निजात पाया जा सकता है? और अगर हां, तो कैसे?

पूंजीपतियों की मीडिया में छपी खबरों के जरिये सरकार अपना जवाब दे रही है, हालांकि औपचारिक तौर पर यह कहा जा रहा है कि इस कांड पर जांच-पड़ताल मात्र शुरू ही हुआ है। हमें बताया जा रहा है कि आतंकवादी हमले इसलिए आयोजित किये जा रहे हैं ताकि ”हिन्दोस्तान में अस्थायी हालत पैदा हो और विदेशी यहां आने से डरें। इनका इरादा है सांप्रदायिक तौर पर लोगों को बांटना और मुसलमानों के खिलाफ़ सांप्रदायिक हिंसा भड़काना। पाकिस्तान में स्थित लश्कर-ए-तोयबा नामक संगठन द्वारा ये हमले करवाये जा रहे हैं, इन्हें हिन्दोस्तानी मुसलमानों के बीच पैदा किये गये गुप्त निकायों द्वारा पाकिस्तान के खुफिया दल आई.एस.आई. के समर्थन से करवाये जा रहे हैं और इन्हें इंडियन मुजाहिदीन नामक एक गुप्त संगठन की मदद मिल रही है, जिसमें प्रतिबंधित सिमी (स्टुडेंट्स इस्लामिक मुवमेंट ऑफ इंडिया) के भूतपूर्व सदस्य शामिल हैं। हिन्दोस्तान, अमरीका और दूसरी ताकतों को पाकिस्तान पर दबाव डालना चाहिए कि पाकिस्तान में विभिन्न हिन्दोस्तान-विरोधी जिहादी संगठनों के नेताओं को गिरफ्तार किया जाये ताकि आतंकवाद से छुटकारा पाया जा सके“। यह भी ऐलान किया जा रहा है कि इस हालिया आतंकवादी हमले का इरादा है (1) 25 फरवरी को होने वाले हिन्दोस्तान-पाकिस्तान विदेश सचिव-स्तरीय वार्ता को नाकामयाब करना और (2) अफगानिस्तान में पिछले हफ्ते से शुरू हुए नये अमरीकी सैनिक हमले का जवाब देना, ताकि ”पाकिस्तान को अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ़ अमरीका के साथ अपनी सेना को तैनात न करने का कारण मिले“।

जब भी हम कम्युनिस्ट यह विश्लेषण देते हैं कि किसने इन आतंकवादी हमलों को आयोजित किया, तो पूंजीपतियों के विभिन्न तबके यह आरोप लगाते हैं कि हम ”साजि़श रचे जाने की सोच“ का शिकार बन रहे हैं। परंतु यह विदित है कि वही पूंजीपति, बिना किसी सबूत के, अपने खुदगर्ज इरादों के लिए, खुद ही इन आतंकवादी हमलों के बारे में तरह-तरह की ”साजि़शों की कहानियां“ फैला रहे हैं।

आतंकवाद के मुद्दे का लोगों को किस तरह विश्लेषण करना चाहिए?

पहली बात हमें यह समझना चाहिए कि आतंकवाद सभी साम्राज्यवादी और प्रतिक्रियावादी राज्यों की राजकीय नीति के अस्त्रागार में एक पसंदीदा अस्त्र है। इसका यह मतलब है कि अमरीका, हिन्दोस्तान, पाकिस्तान, रूस, ब्रिटेन, आदि सभी अपने-अपने देशों के अंदर अपने नापाक इरादों को बढ़ावा देने तथा अपने साम्राज्यवादी इरादों को हासिल करने के लिए आतंकवाद का इस्तेमाल करते हैं। यह उनके राज्य की नीति का उतना ही हिस्सा है, जितना कि खुलेआम राजकीय दमन है। यह अंतर्राष्ट्रीय भू-राजनीति का उतना ही हिस्सा है, जितना कि कूटनीति और उसकी निरंतरता, यानि जंग है। लोगों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि आतंकवादी हमले कराने वाले ”गैर-राज्य कारक“ हैं। आतंकवादी हमले राज्य का काम है, ठीक उसी तरह जैसे कि सांप्रदायिक हत्याकांड, नस्लवादी हमले, जातिवादी हमले, इत्यादि ”गैर-राज्य कारकों“ का नहीं बल्कि राज्य का काम है।

बीती सदी में विश्व के इतिहास को अगर देखा जाये तो इस बात को साबित करने वाले कई उदाहरण मिलेंगे। अक्तूबर क्रांति की फतह के बाद, उस समय की साम्राज्यवादी ताकतों ने सोवियत संघ के अंदर तथा यूरोप के पूंजीवादी देशों में कई आतंकवादी हमले आयोजित किये। समाजवाद को नष्ट करना और कम्युनिस्ट आंदोलन को बदनाम करना उनका इरादा था। शीत युद्ध के दौरान अमरीका और सोवियत संघ, दोनों ने फिलिस्तीनियों और अन्य राष्ट्र-मुक्ति आंदोलनों पर हमला करने तथा क्रांतिकारी कम्युनिस्टों पर हमला करने के लिए आतंकवाद का हथियार अपनाया था। हिन्दोस्तान में पूंजीवादी राज्य में 60 और 70 के दशकों में कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों को बदनाम करने के लिए, उन पर हमला करने के लिए और पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के राष्ट्र-मुक्ति आंदोलनों पर हमला करने के उद्देश्य से आतंकवाद का प्रयोग किया। पूरे दक्षिण एशिया में, यहां के देशों के राज्यों तथा विभिन्न विदेशी ताकतों ने अपने इरादों को बढ़ावा देने के लिए आतंकवाद का इस्तेमाल किया है – जैसे बलूचिस्तान, पंजाब, श्री लंका, इत्यादि में।

शीत युद्ध के समाप्त होने के बाद, साम्राज्यवाद और प्रतिक्रियावादी राज्यों ने कम्युनिस्टों और साम्राज्यवादी दादागिरी का विरोध करने वालों पर हमला करने के लिए आतंकवाद का इस्तेमाल किया है। इस्लाम धर्म का पालन करने वाले लोगों को खास निशाना बनाया गया है। अमरीकी साम्राज्यवाद ने 11 सितम्बर, 2001 को न्यूयार्क और वाशिंगटन में हुए आतंकवादी हमलों को बहाना बनाकर अफगानिस्तान और इराक पर हमलावर जंग छेड़ा था। यह देखा जा सकता है कि 11 सितम्बर, 2001 के बाद, इराक के अलावा, हिन्दोस्तान और पाकिस्तान में तरह-तरह के आतंकवादी हमले खूब बढ़ गये और फैल गये हैं।

हमारे इलाके में इन बढ़ती आतंकवादी घटनाओं को समझने के लिए हमें यह ध्यान में रखना पड़ेगा कि एशिया, खासतौर पर दक्षिण एशिया आज एक ऐसा क्षेत्र है जहां कई साम्राज्यवादी ताकतें आपस में टकरा रही हैं। एशिया में अनमोल तेल और खनिज़ संसाधन हैं, अरबों मेहनतकश लोग हैं। एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। कई साम्राज्यवादी ताकतें एशिया में अपने-अपने साम्राज्यवादी हितों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं, जिनमें अमरीका की सबसे अहम भूमिका है। हमारे इलाके में इन बढ़ती आतंकवादी घटनाओं को अंतर-साम्राज्यवादी जंग की पूर्व घोषणा समझना चाहिए।

लोगों के क्रांतिकारी मुक्ति संघर्षों को बदनाम करने के लिए और समाजवाद की ओर मजदूर वर्ग के संघर्ष पर हमला करने के लिए आतंकवाद का इस्तेमाल किया जा रहा है। हिन्दोस्तान के मजदूर वर्ग को अपने साम्राज्यवादी शासकों के खिलाफ़ तथा सभी दूसरे साम्राज्यवादियों के खिलाफ़ डटकर संघर्ष करना होगा। हमें हिन्दोस्तान, अमरीका और दूसरे देशों के साम्राज्यवादी मंसूबों और जंग की तैयारियों का निडरता से पर्दाफाश और विरोध करना होगा। हमें दक्षिण एशिया में सभी प्रकार की विदेशी साम्राज्यवादी दखलांदाजी का विरोध करना होगा। जब मजदूर वर्ग वर्तमान पूंजीवादी शासन को पलटकर, उसकी जगह पर अपना शासन लागू करेगा, तब हमारे देश में आतंकवाद की महामारी को खत्म करने की हालतें पैदा होंगी।

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