गुजरात जनसंहार के बाद आठ साल

28 फरवरी, 2002 के दिन 50 से भी अधिक कार सेवक, जो अयोध्या से साबरमती एक्सप्रेस में गुजरात आ रहे थे, बहुत ही दुखद रूप से गोधरा में आग लगने से जिन्दा जल गये।

28 फरवरी, 2002 के दिन 50 से भी अधिक कार सेवक, जो अयोध्या से साबरमती एक्सप्रेस में गुजरात आ रहे थे, बहुत ही दुखद रूप से गोधरा में आग लगने से जिन्दा जल गये।

इस भयानक घटना के तुरंत बाद, राज्य ने घोषणा कर दी कि मुसलमानों ने रेलगाड़ी में आग लगाई थी और अहमदाबाद व दूसरे स्थानों में मुसलमानों पर एक जनसंहारक हमला शुरू कर दिया। इस खून-खराबे में, जो शहरों में पूरे एक हफ्ते चला और ग्रामीण जिलों में कई हफ्तों तक चला, हजारों मुसलमान लोगों का बेरहमी से हत्या व बलात्कार किया गया, उन्हें जिन्दा जलाया गया और न जाने कैसे-कैसे अकल्पनीय घोर हमले किये गये। लाखों मुसलमानों को शरणार्थी बनाया गया और भीषण अमानवीय परिस्थिति में शरणार्थी शिविरों में रहने के लिये मजबूर कर दिया गया। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुलेआम जनसंहारक हमलों के सम्बन्ध में सफाई दी, जिनको अंजाम देने में पुलिस के समर्थन से, खुद मंत्री, विधायक तथा भाजपा के उच्च अधिकारी नेतृत्व दे रहे थे। कांग्रेस पार्टी के स्थानीय सदस्यों ने या तो खुद जनसंहार में हिस्सा लिया या उसको अनिवार्य माना, जबकि कांग्रेस पार्टी ने तथाकथित हिन्दू प्रतिघात के सामने ”बेबसी“ जाहिर की। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तथा उनकी पार्टी व सरकार ने गुजरात जनसंहार को पूरी तरह जायज ठहराया।

गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ जनसंहार बिल्कुल उसी तरह आयोजित किया गया था जैसे कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली व दूसरे स्थानों पर सिखों का जनसंहार। इसे पहले से नियोजन के साथ किया गया था – एक योजनाबद्ध तरीके से, वोटर लिस्टों व हत्या की सामग्री पहले से ही जमा कर के। एकदम साफ है कि गोधरा हत्याकांड की पृष्ठभूमि में वह हिन्दुओं का स्वयंस्फूर्त जवाब नहीं था।

गुजरात जनसंहार के पश्चात, कम्युनिस्टों व अलग- अलग आस्थाओं में विश्वास रखने वाले हजारों लोगों ने बहुत बहादुरी से शिविरों की दयनीय परिस्थिति में जी रहे जनसंहार से पीडि़त लोगों की मदद का काम हाथ में लिया। राज्य के जबरदस्त विरोध व शासकों द्वारा पैदा किये द्वेषपूर्ण व जहरीले माहौल का सामना करते हुये उन्होंने ऐसा किया। उस वक्त कट्टर सांप्रदायिक प्रचार किया जा रहा था कि सभी मुसलमानों का कत्ल और बलात्कार होना चाहिये और जिन्होंने भी इसका विरोध किया उनको राज्य का दुश्मन करार दिया गया। बहुत से नागरिकों ने जनसंहार में राज्य की भूमिका का पर्दाफाश करने की चुनौती बहादुरी से स्वीकारी। उनके कार्य व संघर्ष से हिन्दोस्तान के सभी लोगों को साफ हो गया कि जनसंहार हिन्दुओं का काम नहीं था बल्कि राज्य व सत्तारूढ़ पार्टी की करतूत थी।

सांप्रदायिक हिंसा के आयोजन करने वालों को सज़ा दिलाने का हिन्दोस्तान के लोगों का अभियान, जो 1984 के सिखों के कत्लेआम के समय से चल रहा था, गुजरात के जनसंहार के बाद, इसमें और गति आई। 1984 व 2002 के अनुभवों तथा तब से अब तक सत्तारूढ़ हर एक सरकार द्वारा इनके गुनहगारों को सज़ा दिलाने के इंकार के आधार पर, इस अभियान ने इस प्रश्न का विस्तार किया कि ”कैसे हिन्दोस्तान के लोग राज्य व सत्तारूढ़ पार्टियों को सज़ा देंगे जब यही राज्य व सत्तारूढ़ पार्टियां सांप्रदायिक कत्लेआमों के कारक हैं?“

सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी तथा भाकपा व माकपा जैसी पार्टियों ने, राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक जनसंहारों को हमेशा के लिये खत्म करने व गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लोगों के संघर्ष को गुमराह करने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने कांग्रेस पार्टी को सत्ता में लाने के इरादे से, भाजपा-विरोधी गठबंधन बनाने के लिये लोगों को लामबंध करने की कोशिश की। उस समय पूंजीपतियों द्वारा लाये जा रहे पूंजीवादी आर्थिक सुधारों के दूसरे दौर के खिलाफ जनता के एकताबद्ध संघर्ष को बहका कर, एक ”धर्म निरपेक्ष“ सरकार बनाने के रास्ते पर लाया गया। भाकपा-माकपा का दावा था कि गुजरात के जनसंहार के बाद एक ”धर्म निरपेक्ष“ सरकार बनाना, आर्थिक सुधारों की खिलाफ़त करने से ज्यादा जरूरी था।

जैसे ही मनमोहन सिंह की पहली संप्रग सरकार ने शपथ ली, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी ने, विभिन्न दूसरी ताकतों के साथ, 6 जुलाई 2004 को एक विशाल जन प्रदर्शन आयोजित किया। इस जन जन प्रदर्शन ने घोषणा की कि हिन्दोस्तान के लोग सांप्रदायिक हिंसा आयोजन के गुनहगारों को सजा दिलाने का संघर्ष जारी रखेंगे तथा एक ऐसी परिस्थिति तैयार करेंगे जिसमें राज्य द्वारा सांप्रदायिक हिंसा का आयोजन असंभव होगा। इस घोषणा के जरिये संघर्षशील ताकतों ने ऐलान किया कि हमारा संघर्ष जारी रहेगा, कि हम यह भरोसा नहीं करते कि संप्रग सरकार गुनहगारों को सज़ा दिलाने का कोई कदम उठायेगी।

जीवन के अनुभवों से इसकी पुष्टि हुई है। गुजरात का शासन नरेंद्र मोदी के हाथ में जारी है और गुजरात जनसंहार के लिये किसी को सज़ा नहीं दी गयी है। कांग्रेस पार्टी को सिखों के जनसंहार के लिये किसी भी न्यायालय ने गुनहगार नहीं ठहराया है। गुनहगार को सज़ा देने का आज भी कोई यंत्र मौजूद नहीं है, जब राज्य सत्ता खुद ही गुनहगार हो।

सांप्रदायिक हिंसा का तथाकथित सामना करने के लिये पहली संप्रग सरकार ने 2005 में संसद में एक विधेयक पेश किया। इस विधेयक को परे रखना पड़ा क्योंकि लड़ाकू लोगों ने इसकी खिलाफत की और गुनहगारों को सज़ा देने की अपनी मांग पर जोर दिया। बुनियादी तौर पर इस विधेयक में यह कमी थी कि इसमें राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा को इस ढ़ंग से पेश किया गया था, जैसे कि हिंसा आम लोगों ने की हो। इसमें कत्लेआम के लिये सरकार व उच्च अफ़सरों की भूमिका को, याने कि कमान की जिम्मेदारी को, मान्यता नहीं दी गयी। संसद के अभी चल रहे सत्र में विधेयक का एक नया संसकरण पेश किया जाने वाला है। राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा के विरोध में और गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिये लड़ रहे लोग अपनी चिंता फिर एक बार जाहिर कर रहे हैं।

लोगों में बिल्कुल भ्रम नहीं होना चाहिये कि कांग्रेस पार्टी, भाजपा या वाम दल की पार्टियां सांप्रदायिक हिंसा आयोजन के गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिये वास्तव में कोई कदम लेंगे। 1858 से हिन्दोस्तान का इतिहास दिखाता है कि राज्य सत्ता को बरकरार रखने तथा मजबूत बनाने के लिये, पहले बस्तीवादी शासकों की और बाद में हिन्दोस्तानी शासक वर्ग की चुनिंदा नीति लोगों को सांप्रदायिक तौर पर बांटने की और समय-समय पर सांप्रदायिक हिंसा आयोजित करने की रही है। इसका उद्देश्य लोगों के बीच गहरी दरारें डालना व उन्हें शासक वर्ग की पार्टियों के पीछे बांधना है। इसका उद्देश्य शासक वर्ग की मज़दूर-विरोधी व किसान-विरोधी नीतियों के खिलाफ़ जनता के एकजुट विरोध संघर्ष को खत्म करना है।

कम्युनिस्टों को पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियों के ”धर्म निरपेक्षी“ स्वभाव के बारे में कोई भ्रम नहीं पैदा करना चाहिये, जैसा भ्रम समय-समय पर भाकपा व माकपा पैदा करती आयी है। धर्म निरपेक्षता और सांप्रदायिकता, दोनों, शासक वर्ग द्वारा अपने राज के बचाव के जुड़वा साधन हैं। जीवन के अनुभव ने बार-बार इस सच्चाई की पुष्टि की है कि हिन्दोस्तानी राज्य असलियत में सांप्रदायिक है। सभी पूंजीवादी पार्टियां, चाहे वे सभी हिन्दोस्तानी लोगों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती हैं या किसी खास धर्म या जाति के लोगों का, वे सभी लोगों को सांप्रदायिक तौर पर बांटने का और उन्हें शासक वर्ग के कार्यक्रम के पीछे लामबंध करने का काम करती हैं।

सिर्फ मज़दूरों व किसानों का शासन स्थापित करने से ही अपने देश के लोग, राज्य सत्ता द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा के अभिशाप से हमेशा के लिये छुटकारा पा सकेंगे।

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