हिन्दोस्तान के सरमायदार बड़ी तेजी से सैन्य शक्ति बढ़ा रहे हैं

आज हिन्दोस्तान अपनी आर्थिक समृद्धि की दर और देश के अंदर और पूरे विश्व में आक्रामक आर्थिक निवेशों के लिये उतना ही चर्चा में है, जितना कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी बढ़ रही भूमिका के लिये चर्चा में है। यह अपने आक्रामक फौजीकरण के लिये भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

आज हिन्दोस्तान अपनी आर्थिक समृद्धि की दर और देश के अंदर और पूरे विश्व में आक्रामक आर्थिक निवेशों के लिये उतना ही चर्चा में है, जितना कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी बढ़ रही भूमिका के लिये चर्चा में है। यह अपने आक्रामक फौजीकरण के लिये भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

हिन्दोस्तान आज दुनिया में हथियारों के सबसे बड़े खरीदारों में माना जाता है। अमरीका, रूस, फ्रांस, इज़राइल, दक्षिण अफ्रीका तथा अन्य देशों के हथियारों के सौदागर, हिन्दोस्तान के साथ बड़े-बड़े सौदे करने के लिये आपस में होड़ लगा रहे हैं।

देश के अंदर, हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार, विदेशी हथियार निर्माता कंपनियों के सहयोग से, हथियार के उद्योग में अपना हिस्सा बढ़ाने में जुटे हुये हैं।

1990 में फौजीकरण का वर्तमान दौर शुरु होने के समय से, हथियारबंद बलों की तकनीकी क्षमतायें काफी बढ़ा दी गई हैं। शीत युद्ध के खत्म होने के बाद हिन्दोस्तानी सरमायदारों ने नई हालत को अपने पक्ष में इस्तेमाल करके, एक विश्व स्तरीय साम्राज्यवादी शक्ति बनने के लिये अपनी अंतर्राष्ट्रीय रणनीति में फेरबदल करनी शुरु कर दी थी। फौजीकरण का कार्यक्रम, निजीकरण और उदारीकरण के कार्यक्रम के साथ-साथ चलता रहा है; और फौजी रणनीति को शीत युद्ध के बाद की हिन्दोस्तानी साम्राज्यवादी रणनीति के अनुकूल विकसित किया गया है।

थल, जल तथा हवाई सेनाओं को नये हथियारों के साथ लगातार मजबूत किया जा रहा है और उनका

आधुनिकीकरण किया जा रहा है। हिन्दोस्तान ने परमाणु हथियार विकसित कर लिये हैं और इन हथियारों के जरिये धरती, समुद्र या हवा से अलग-अलग दूरी तक मार करने वाली मिसाईलें भी विकसित कर ली हैं। हथियारबंद सेना को पर्वतों, मरूस्थलों तथा जंगलों जैसे अलग-अलग हालतों में जंग करने के लिये प्रशिक्षण दिया गया है। दूसरे देशों की सेनाओं के खिलाफ़ लड़ने के अलावा, इसको अपने ही देश के अंदर बगावतों को कुचलने के लिये भी प्रशिक्षित किया गया है।

थल, जल और हवाई सेनाओं में 13 लाख स्त्री और पुरुष सैनिक हैं। इनके अलावा लगभग इतनी ही संख्या अर्ध-सैनिक बलों की है। मुख्य अर्ध-सैनिक बल हैं – सीमा सुरक्षा बल (बी.एस.एफ.), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सी.आर.पी.एफ.), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आई.टी.बी.पी.), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सी.आई.एस.एफ.), स्पेशल फरंटीयर फोर्स (एस.एफ.एफ.), असम राइफल्स, राष्ट्रीय राइफल्स, डिफेंस सिक्योरिटी कोर, इत्यादि। इन्हें सीमा सुरक्षा के अलावा देश के अंदर बगावतों को दबाने और मज़दूरों-मेहनतकशों के संघर्षों को कुचलने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। युद्ध के समय ये सेना के तहत काम करते हैं।

इस समय, हिन्दोस्तान के सरमायदार अमन की बातें कर रहे हैं। वे इस तरह से बातें करते हैं कि मानों उनका ये सारा फौजीकरण हिन्दोस्तान को बाहरी खतरे से सुरक्षित करने के लिये है। मज़दूरों और किसानों को ऐसे बहकावों में नहीं फंसना चाहिये। जिस भारी पैमाने पर और जिस प्रकार का फौजीकरण किया जा रहा है, उससे साफ ज़ाहिर है कि वह हमलावर युद्धों के लिये तैयारी कर रहे हैं।

सैनिक क्षेत्र जैसे एक गैर-उत्पादक क्षेत्र पर, हिन्दोस्तान के सरमायदार इतना भारी खर्च क्यों कर रहे हैं? यह अपने इलाके के अंदर और विश्व स्तर पर बड़ी शक्तियों के बीच बदल रहे आर्थिक, राजनीतिक तथा फौजी संतुलन के संदर्भ में हिन्दोस्तान के सरमायदारों की साम्राज्यवादी रणनीति की सेवा हेतु किया जा रहा है।

इस साम्राज्यवादी रणनीति के बहुत से आपस में जुड़े हुये हिस्से हैं।

इसका मुख्य उद्देश्य, सरमायदारों के हाथों हमारे देश के लोगों की तथा हमारे विशाल प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट को, अंदरूनी तथा बाहरी खतरे से बचाना है। देश के अंदर, इसका उद्देश्य आत्म निर्धारण के लिये लड़ रहे सब उत्पीड़ीत लोगों को दबाना और मज़दूरों, किसानों तथा मेहनतकश लोगों द्वारा इंकलाब के खतरे से बचाना है। आज, हिन्दोस्तानी सेना का लगभग तीन चैथाई हिस्सा, कश्मीर व उत्तरपूर्व के प्रांतों में बग़ावतों को दबाने के लिये इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिसा इत्यादि में पुलिस तथा अर्ध-सैनिक बलों की मदद के लिये थल व हवाई सेना को बुलाया जा रहा है।

हिन्दोस्तान और चीन में, उत्तर-पश्चिमी इलाके में लेह-लद्दाख से लेकर उत्तर पूर्वी इलाके में अरुणाचल तक अपनी लंबी सीमा रेखा के साथ लगते इलाकों केे लिये 1962 में युद्ध लड़ा गया था। बीते समय में, हिन्दोस्तान तिब्बत में बागि़यों की मदद करता रहा है और चीन उत्तरपूर्व के बागि़यों की मदद करता रहा है। हिन्दोस्तान और पाकिस्तान ने कश्मीर के लिये कई युद्ध लड़े हैं। चीन और पाकिस्तान ने, हिन्दोस्तान का मुकाबला करने के लिये एक रणनीतिक गठबंधन बना रखा है। इस तरह पाकिस्तान और चीन के साथ हिन्दोस्तान के दुश्मनी भरे संबंध हैं। हिन्देास्तान, इन दोनों को इस इलाके के अंदर अपने साम्राज्यवादी उद्देश्यों के लिये खतरा मानता है।

हिन्दोस्तान के सरमायदार दक्षिण एशियाई इलाके के देशों को अपनी दादागिरी के क्षेत्र का हिस्सा समझते हैं। इसमें नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, मालदीव, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार शामिल हैं। इन देशों पर इनकी दादागिरी को इन देशों के लोगों के विरोध का और दूसरी ताकतों से मुकाबले का सामना करना पड़ रहा है। हिन्दोस्तान अपनी दादागिरी की कोशिशों  को कामयाब करने के लिये, अपनी आर्थिक तथा सैनिक ताकत का इस्तेमाल करता है। बीते समय में, इसने श्रीलंका में दखलंदाजी की है और आज भी श्रीलंका की सेना को, अंदरूनी बग़ावतें कुचलने में मदद दे रहा है। इसने मालदीव, भूटान और अफगानिस्तान में दखलंदाजी की है। नेपाली सेना पर इसका नियंत्रण है। हिन्दोस्तान के फौजीकरण का एक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हिन्दोस्तान एक इलाकाई महाशक्ति माना जाये और इस क्षेत्र के सभी देश इसकी दादागिरी को कबूल कर लें। हिन्दोस्तान के सरमायदार समूचे हिन्द महासागर को अपने प्रभाव का “स्वाभाविक” क्षेत्र मानते हैं। इसमें मलाका के जल-डमरुओं (सिंगापुर/मलेशिया) से लेकर अदन की खाड़ी तक का इलाका और बंगाल की खाड़ी व अरब सागर शामिल हैं। वे एक शक्तिशाली जल सेना विकसित कर रहे हैं जो न सिर्फ अपने समुद्री तटों की सुरक्षा करेगी, बल्कि उपरोक्त पूरे इलाके पर पहरा रखने की भी क्षमता रखती हो। हवाई शक्ति की मदद से, यह इस समुद्री इलाके पर अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही है, जैसे कि अफ्रीका में सोमालिया के तट पर तथाकथित समुद्री लुटेरों पर हमले करना। इन हमलों का मकसद, हिन्दोस्तान के लिये तेल और गैस की सप्लाई के रास्तों को सुरक्षित करना है।

हिन्दोस्तान के सरमायदार अफगानिस्तान, ईरान, वियतनाम, सुडान, म्यांमार, कई मध्य एशियाई देशों में और साथ ही अफ्रीका के कुछ देशों में भी रणनीतिक पूंजी-निवेश कर रहे हैं। ये हिन्दोस्तान से वियतनाम तक, आसियान देशों से गुज़रती हुई सड़कें व रेल पटरियां बिछाने की योजना बना रहे हैं। दक्षिण-पूर्वी एशिया में, ये सीधे तौर पर चीन से टक्कर ले रहे हैं। अफगानिस्तान में ये पाकिस्तान के साथ टक्कर ले रहे हैं। फौजीकरण का एक उद्देश्य, इन रणनीतिक पूंजी-निवेशों की सुरक्षा करना भी है।

समूचे तौर पर, हिन्दोस्तान के सरमायदार एक विश्वस्तरीय साम्राज्यवादी शक्ति बनने के रास्ते पर आक्रामक रुख़ से आगे बढ़ रहे हैं। एशिया, खासकर दक्षिण एशिया, पूर्व एशिया तथा दक्षिण-पूर्व एशिया, विश्व की सबसे तेज़ गति से बढ़ रही अर्थव्यवस्थायें हैं। पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और अफ्रीका में भरपूर मात्रा में तेल, गैस तथा अन्य प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। बड़ी साम्राज्यवादी शक्तियां – अमरीका, यूरोपीय शक्तियां, रूस, चीन, हिन्दोस्तान इत्यादि – विभिन्न इलाकों के अंदर अपने साम्राज्यवादी हितों को बढ़ावा देने के लिये आपस में सहयोग भी कर रही हैं और टक्कर भी ले रही हैं।

अमरीका इस वक्त चीन को अपना मुख्य प्रतिद्वंदी मानता है तथा उसे घेरने के प्रयास कर रहा है। हिन्दोस्तान और चीन दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों मंे और कुछ अन्य देशों के अंदर आपस में भिड़ रहे हैं। पाकिस्तान और चीन की दोस्ती को हिन्दोस्तान अपने साम्राज्यवादी रास्ते का रोड़ा मानता है। चीन के संदर्भ में, हिन्दोस्तान और अमरीका के हित आपस में मेल खाते हैं।

दुनिया के पुनःबंटवारे के लिये अंतर-साम्राज्यवादी टक्कर में, हिन्दोस्तान और चीन अभी नये दाखिल हुये हैं। लेकिन, क्योंकि पुरानी साम्राज्यवादी शक्तियों के मुकाबले, इनकी अर्थव्यवस्थायें अधिक तेज़ी से विकसित हो रही हैं, इसलिये दुनिया के पुनःबंटवारे में अपना हिस्सा बनाने के लिये ये तेज़ी से फौजीकरण कर रहे हैं। साथ ही साथ, आर्थिक व सैनिक तौर पर दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति, अमरीका दूसरे देशों पर अपनी चैधराहट को सैन्यबल से सुरक्षित करने के लिये प्रयत्नशील है। शीत युद्ध के खत्म हो जाने के बाद, अलग-अलग साम्राज्यवादी शक्तियों की आर्थिक ताकतों में तब्दीली हो गई है। इस हालत में, वर्तमान समय को अंतर-साम्राज्यवादी टक्करों का “अमनपूर्ण” समय माना जा रहा है। लेकिन, क्योंकि अमरीका कई अन्य शाक्तियांे के साथ मिलकर पूर्वी यूरोप और पश्चिम एशिया के अंदर रणनीतिक बनावट को सैन्य तौर पर बदल रहा है, इसलिए यह सीधी अंतर-साम्राज्यवादी जंगों के दौर में तब्दील हो सकता है। हिन्दोस्तान का फौजीकरण, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हिन्दोस्तानी सरमायदार अपने उद्देश्य हासिल करने के लिए और अंतर-साम्राज्यवादी जंगों में शामिल होने के लिए ही युद्ध की तैयारीयां कर रहे हैं।

साम्राज्यवादी उद्देश्यों के लिये किया जा रहा हिन्दोस्तान का फौजीकरण, हमारे मज़दूरों और किसानों के हितों के खिलाफ़ है। हमें कभी भी यह नहीं भूलना चाहिए कि अपने देश के तथा अन्य देशों के मज़दूरों, किसानों व दबे-कुचले लोगों के संघर्ष को कुचलना ही, इस फौजीकरण का मुख्य मकसद है। इसके साथ ही, अंतर-साम्राज्यवादी जंगें, हमारे लोगों के लिए तथा अन्य देशांे के लोगों के लिए भयानक तबाही मचायेंगी। कम्युनिस्टों तथा सभी मज़दूरों व मेहनतकश लोगों को, इस फौजीकरण का और जंग की तैयारियों का डटकर विरोध करना चाहिए।

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