प्रवासी मजदूर संगठनों ने अपने अधिकारों की गारंटी मांगी

1 जनवरी, 2010 को जब सरकार बड़ी धूम-धाम से प्रवासी भारतीय दिवस मना रही थी, तब प्रवासी मजदूर संगठनों ने संसद के सामने एक रैली आयोजित की। उन्होंने रोजी-रोटी के लिये विदेश जाने वाले हिन्दोस्तानी मजदूरों तथा रोजी-रोटी के लिये दूसरे देशों से हिन्दोस्तान आने वाले मजदूरों के अधिकारों के अभाव का विरोध किया। इन संगठनों ने देश के अंदर, एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करने के लिये जाने वाले मजदूरों के अध

1 जनवरी, 2010 को जब सरकार बड़ी धूम-धाम से प्रवासी भारतीय दिवस मना रही थी, तब प्रवासी मजदूर संगठनों ने संसद के सामने एक रैली आयोजित की। उन्होंने रोजी-रोटी के लिये विदेश जाने वाले हिन्दोस्तानी मजदूरों तथा रोजी-रोटी के लिये दूसरे देशों से हिन्दोस्तान आने वाले मजदूरों के अधिकारों के अभाव का विरोध किया। इन संगठनों ने देश के अंदर, एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करने के लिये जाने वाले मजदूरों के अधिकारों के अभाव का मुद्दा भी उठाया।

हिन्दोस्तान दूसरे देशों में बहुत बड़ी संख्या में मजदूरों को भेजता है (विश्व प्रवासन रिपोर्ट 2005 के अनुसार 2 करोड़)। हिन्दोस्तान में दूसरे देशों से बहुत से मजदूर आते हैं (2005 में दुनिया में हिन्दोस्तान 8वें नम्बर पर था)। विश्व बैंक के अनुमानों के अनुसार, 2009 में दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में, हिन्दोस्तान को प्रवासी मजदूरों से सबसे अधिक धन प्राप्त हुआ, 52 अरब अमरीकी डालर। इसमें से अधिकतम धन पश्चिमी एशिया के देशों, कनाडा और दूसरे देशों में काम करने वाले मजदूरों से प्राप्त हुआ। परन्तु प्रवासी भारतीय दिवस में इन मजदूरों, जो विदेश में काम करने वाले हिन्दोस्तानियों की अधिकतम संख्या हैं, की समस्याओं को पूरी तरह नजरअंदाज़ किया गया। सिर्फ पश्चिमी देशों में उच्च स्थान पाये हुये हिन्दोस्तानियों से पूंजी आकर्षित करने पर ध्यान दिया गया।

वर्तमान संकट के कारण पश्चिम एशिया में लाखों प्रवासी मजदूर अपनी नौकरियां खो बैठे हैं। उन्होंने विदेश में नौकरी और टिकट के लिये दलालों को खूब सारे पैसे दिये हैं। यह जानी-मानी बात है कि अधिकतर पश्चिमी एशियायी देशों में हिन्दोस्तानी मजदूरों के कोई अधिकार नहीं हैं और उनके पासपोर्ट भी मालिक जब्त कर लेते हैं। यह भी जानी-मानी बात है कि उन देशों तथा कनाडा, यूरोपीय देशों और आस्ट्रेलिया के हिन्दोस्तानी कंसलेट हिन्दोस्तानी मजदूरों को कोई हमदर्दी नहीं दिखाते हैं। परंतु प्रवासी भारतीय दिवस के तमाशे के दौरान इन मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं हुई।

दूसरी ओर, अन्य देशों से हिन्दोस्तान में काम करने के लिये आने वाले मजदूरों, जैसे कि नेपाल और बांग्लादेश से आये मजदूरों तथा एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने वाले मजदूरों की हालतें भी बहुत बुरी हैं। लुधियाना में हाल की घटनाएं, जहां देश के दूसरे इलाकों से आये हुये प्रवासी मजदूरों ने राज्य द्वारा समर्थित गुंडों द्वारा अपनी मेहनत की कमाई के लूटे जाने के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन किये थे, इस हक़ीक़त की थोड़ी सी झलक देती है। सच तो यह है कि हिन्दोस्तान में प्रवासी मजदूरों, चाहे दूसरे दक्षिण एशियायी देशों से या हिन्दोस्तान से, इनके कोई अधिकार नहीं हैं। पूंजीपति उनका बेरहम शोषण करते हैं और केन्द्रीय व राज्य सरकारें इन मजदूरों को दबाने और डराने में पूंजीपतियों को सहयोग देती हैं। प्रवासी भारतीय दिवस में इन मुद्दों का जिक्र तक नहीं हुआ।

इसीलिये प्रवासी मजदूरों ने यह मांग की कि :

  1. सरकार ऐसी प्रवासन नीति अपनाये जिसमें हिन्दोस्तान से बाहर जाने वाले और हिन्दोस्तान में आने वाले प्रवासी मजदूरों के अधिकारों को सुनिश्चत किया जाये, चाहे उनकी जाति, धर्म, लिंग आदि कोई भी हो। इस नीति में हिन्दोस्तान को एक प्रवासी मजदूर भेजने वाला और प्राप्त करने वाला देश माना जाये। इस नीति में दक्षिण एशिया पर ध्यान देना चाहिये, सभी प्रवासी मजदूरों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिये तथा बढ़ती संख्या में प्रवासी मजदूरों के जेल में बंद कर दिये जाने के मुद्दे को उठाना चाहिये।
  2. सरकार को प्रवासी मजदूरों और उनके परिवारों के अधिकारों की रक्षा पर आई.एल.ओ. के सभी आदेशों और संयुक्त राष्ट्र संघ के 1990 के आदेश को मानना चाहिये और लागू करना चाहिये। सरकार को दूसरे देशों की सरकारों के साथ समझौते करना चाहिये ताकि प्रवासी मजदूरों के मानव अधिकारों और अन्य सभी अधिकारों की रक्षा की जाये।
  3. सरकार को गैर कानूनी, खतरनाक, फरेबी दलालों के खिलाफ़ सख्त कार्यवाही करनी चाहिये।
  4. इस विरोध रैली में भाग लेने वाले संगठन थे एटक, ए.आई.टी.यू.सी., मजदूर एकता कमेटी, बी.एम.एस., सीटू, एच.एम.एस., इंटक, टी.यू.सी.सी., यू.टी.यू.सी., ए.आई.सी.सी.टी.यू., प्रवासी नेपाली एसोसियेशन, सी.ई.सी., बिल्डींग एण्ड वूड वर्कर्स इंटरनेशनल और एशिया प्रवासी फोरम।

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