शोपियां मामले में सी.बी.आई. द्वारा लिपा-पोती

असलीयत पर पर्दा डाला और लोगों का उत्पीड़न किया कश्मीर में लोगों के खिलाफ़ आतंक की निन्दा करें!

असलीयत पर पर्दा डाला और लोगों का उत्पीड़न किया कश्मीर में लोगों के खिलाफ़ आतंक की निन्दा करें!

मई 2009 को शोपियां में जहां चारों ओर सेना और अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी साफ नजर आती है ऐसे में दो महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और निर्मम हत्या की गई। इसके खिलाफ़ पूरे कश्मीर में दो सप्ताह तक लोगों ने हड़तालें और जबर्दस्त प्रदर्शन किये और मांग की कि इस मामले के लिए जिम्मेदार सेना के जवानों के जुर्म की तहक़ीक़ात की जाये और गुनहगारों को सजा दी जाये (देखिये मजदूर एकता लहर का 1-15 जुलाई, 2009 का अंक)। सितंबर 2009 को यह मामला सी.बी.आई. को सौंपा गया। हाल ही में सी.बी.आई. ने यह ऐलान किया कि उन्होंने तहकीकात पूरी कर ली है जिसके मुताबिक यह पता चलता है कि इन महिलाओं के साथ न तो बलात्कार हुआ था और न ही उनकी हत्या की गई। बल्कि इन महिलाओं की मौत घुटने-भर गहरे पानी में डूबने से हुई! साथ ही सी.बी.आई. ने उन लोगों का उत्पीड़न करना शुरु कर दिया जो इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे। महिलाओं के परिजनों की ओर से जो वकील केस लड़ रहे थे और जिन डॉक्टरों ने पोस्ट-मार्टम किये थे उनके खिलाफ़ भी उत्पीड़न शुरु कर दिया है।

जब से शोपियां का यह मामला सामने आया है उसी दिन से यह साफ नजर आता है कि राज्य के सशस्त्र बल और तमाम केंद्रीय और प्रांतीय एजेंसियां निर्ममता से लोगों को न्याय से वंचित करने और सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही हैं। इन महिलाओं को बागानों से अपने घर की ओर जिस रास्ते से जाना था वह रास्ता हमेशा सशस्त्र सेना और अर्धसैनिक बलों से भरा रहता है। इस रास्ते पर एक जिला पुलिस लाईन, एक सेना की चौकी और एक सी.आर.पी.एफ. कैंप मौजूद है। इसके बावजूद सुरक्षा बल यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने कुछ नहीं देखा। महिलाओं के मृत शरीरों में से एक महिला का मृत शरीर सुबह उस जगह पाया गया जहां पर कुछ घंटे पहले लोगों ने और परिजनों ने काफी छानबीन की थी लेकिन कुछ नजर नहीं आया था।

गुज्जर खानाबदोश जो कि इस इलाके में डेरा डाले हुए थे उन्होंने बताया कि उन्होंने 29 मई की रात को महिलाओं की चीखें सुनी थी। इन खानाबदोशों को अगली ही रात सुरक्षा बलों ने वहां से भगा दिया। सड़कों पर लगातार प्रदर्शन के बाद, आखिर एक सप्ताह के बाद इस मामले की एक एफ.आई.आर. 7 जून, 2009 को दर्ज की गई। जबकि एक सप्ताह से ज्यादा वक्त बीत चुका था। 6 जून, 2009 को जारी की गई फारेंसिक रिपोर्ट और पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट से यह साबित हुआ कि उन महिलाओं का बलात्कार और कत्ल किया गया था।

शोपियां बार असोसिएशन ने यह आरोप लगाया था कि इस मामले के चश्मदीद गवाह पुलिस के विशेष जांच दस्ते (एस.आई.टी.) की हिरासत में हैं लेकिन 17 जून तक उनको मुख्य न्यायाधीश के सामने पेश नहीं किया गया, जिससे यह ज्ञात होता है कि इन गवाहों को खामोश करने की कोशिश की गई थी। जबर्दस्त जन प्रदर्शनों के बाद एक न्यायायिक जांच बैठाई गई लेकिन लोगों को इस पर विश्वास नहीं था क्योंकि इस जांच समिति के अध्यक्ष पद पर एक सेवा निवृत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को मुख्यमंत्री द्वारा नियुक्त किया गया था जबकि ऐसे मामलों में न्यायाधीश की नियुक्ती सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा की जाती है।

सशस्त्र बलों द्वारा बलात्कार, टार्चर और कत्ल करना यह सब कश्मीर और उत्तार-पूर्व के राज्यों में बहुत आम बात हो गई है, जहां पर सशस्त्र बलों का राज चलता है। सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून, इस फाशीवादी कानून के तहत सेना और अर्धसैनिक बलों को किसी भी तरह की कानूनी कार्यवाही से पूरी तरह की छूट दी गई है, चाहे वे कितना ही वहशी गुनाह क्यों न करें। इसलिए यह स्वाभाविक है कि कश्मीर, मणिपुर और उत्तार-पूर्व के अन्य राज्यों के लोग जहां पर सेना और अर्धसैनिक बलों का कब्जा है सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून और अन्य फाशीवादी कानूनों के खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं। इस तरह के बलात्कार और कत्ल के मामलों के खिलाफ़ लोग एकजुट होकर सड़कों पर आ जाते हैं और सशस्त्र बलों को चुनौती देते हैं। इसलिए सरकारी अधिकारी ऐसे मामलों को साधारण हादसा या फिर शोपियां जैसे ''डूबने से हुई मौत'' कहकर दबाने का जतन करते हैं।

1 जून, 2009 को मुख्यमंत्री ने यह दावा किया कि यह मामला ''पानी में डूबकर'' मरने का मामला है, जबकि जिस नहर में इन महिलाओं के शव पाये गये थे वहां पर केवल घुटने-भर ही पानी था। इस इलाके में ऐसा मामला कभी हुआ ही नहीं जहां घुटने-भर पानी में कोई डूब गया हो, और इन महिलाओं के खुद डूबने का कोई कारण भी नहीं था। इसके अलावा 30 मई, 2009 को जो फ्लोटेशन टेस्ट किये गये उससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह डूबकर मरने का मामला नहीं है। अब इस बात का पर्दाफाश हो गया है कि सी.बी.आई. ने गवाहों पर दबाव डालकर उनका बयान बदलने पर मजबूर किया है।

सी.बी.आई. ने पहले उस डाक्टर को अपना बयान बदलने के लिए दबाव डाला जिसने यह साबित किया था कि महिलाओं के साथ लैंगिक हिंसा हुई थी। दबाव के चलते डाक्टर ने कहा कि उसने पहले झूठ कहा था। उसके बाद 28 सितंबर को मृत महिलाओं के शरीर को कब्र से निकाला गया। उनके शरीरों की ठीक से जांच भी नहीं हुई थी कि सी.बी.आई. ने दावा किया कि इन महिलाओं के साथ कोई लैंगिक हिंसा हुई इसका कोई सबूत नहीं मिला। मृत महिलाओं के सभी परिजनों के साथ सी.बी.आई. ने दर्जनों बार तहकीकात की। लेकिन जिन चार पुलिस अधिकारियों पर जांच की जिम्मेदारी थी और जिन्होंने यह स्वीकार किया था कि उन्होंने अपना काम करने में लापरवाही दिखाई थी जिसकी वजह से अहम सबूत नष्ट हो गये उसके साथ सी.बी.आई. ने एक बार भी सवाल जवाब नहीं किया। ऐसा पता चलता है कि वह डाक्टर जिसने सबसे पहले पोस्टमार्टम करके बताया था कि महिलाओं के साथ लैंगिक हिंसा हुई थी, उसको तंग करने के अलावा सी.बी.आई. शोपियां बार असोसिएशन के सदस्यों और अन्य लोगों को तंग कर रही है जो इंसाफ की मांग कर रहे हैं।

पिछले 60 वर्षों से कश्मीर के लोगों की चिंताओं को नजरअंदाज किया गया है। केंद्रीय सरकार इस बात को मानने से इंकार कर रही है कि कश्मीर के लोगों के अपने राष्ट्रीय अधिकार हैं और उन्हें अपने भविष्य का फैसला करने का हक है। जब से हिन्दोस्तान पाकिस्तान का बंटवारा हुआ है, तब से कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तानी सेना का कब्जा है तो दूसरे हिस्से पर हिन्दोस्तानी सेना का। कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्धारण के अधिकार को एक जायज राजनीतिक मांग मानने के बजाय हिन्दोस्तानी सरकार रट लगाती जा रही है कि ''कश्मीर हिन्दोस्तान का अखंड हिस्सा है''। जो कोई इसको चुनौती देता है उसे सरकार देशद्रोही, और आतंकवादी घोषित कर देती है। हिन्दोस्तानी हुक्मरानों की नीतियों के चलते एक राजनीतिक समस्या को ''कानून और व्यवस्था'' का मसला बना दिया गया है। राष्ट्रीय अधिकारों और राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष को दबाये जाने के कारण कश्मीर में आज़ादी का संघर्ष लगातार चल रहा है।

शोपियां में हुए निर्मम गुनाहों पर पर्दा डाले जाने और बेगुनाहों का उत्पीड़न किये जाने की निंदा की जानी चाहिए। जो लोग इस गुनाह में शामिल थे उनके खिलाफ़ मुकदमा चलाया जाना चाहिए। जो लोग सच्चाई बयान कर रहे हैं उनकी आवाज़ को दबाने की कोशिश की निंदा की जानी चाहिए। कश्मीर से सशस्त्र बलों को हटाया जाना चाहिए और सारे देश से सशस्त्रबल विशेष अधिकार कानून को हटाया जाना चाहिए।

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