पूंजीपतियों के हितों की सेवा में केन्द्रीय बजट 2011

संप्रग सरकार के सबसे गहरे विश्वसनीयता के संकट के बीच में, 28 फरवरी, 2011 को वित्त मंत्री ने केन्द्रीय बजट को पेश किया।

संप्रग सरकार के सबसे गहरे विश्वसनीयता के संकट के बीच में, 28 फरवरी, 2011 को वित्त मंत्री ने केन्द्रीय बजट को पेश किया।

विभिन्न घोटालों द्वारा वर्तमान संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था का हाल में जो फर्दाफाश हुआ है, उससे मजदूर वर्ग को यह समझ में आया है कि संप्रग सरकार या राजग सरकार के पीछे बड़े पूंजीपति ही देश के असली शासक हैं। मजदूर वर्ग यह भी समझ रहा है कि उदारीकरण और निजीकरण के जरिये भूमंडलीकरण की नीति के चलते, खाद्य पदार्थों की कीमतें बाजार की ताकतें और सट्टेबाज निर्धारित कर रहे हैं और सरकार खाद्य पदार्थों की बढ़ती महंगाई को रोकने के लिये कोई कदम उठाने को तैयार नहीं है। इस बजट में घोषित कई कदमों से लोगों के रोज के इस्तेमाल की चीजों की कीमतें और बढ़ेंगी, जिससे लोगों की मुसीबतें भी बढ़ेंगी। दूसरी ओर बड़े पूंजीपतियों और उनके लिये लॉबी करने वाले संस्थानों ने इस बजट की बहुत सराहना की है क्योंकि इसमें प्रत्यक्ष करों को घटाने के साथ-साथ सब्सीडी और राजकोषीय घाटे को कम करने के प्रस्ताव हैं।

अप्रत्यक्ष करों के रूप में लोगों पर और 11,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डाला जायेगा।

मेहनतकशों को दी गयी थोड़ी सी छूट बतौर सब्सीडी की कुल मात्रा को अगले वर्ष 20,000 करोड़ रुपये से (यानि वर्तमान वर्ष से लगभग 12.5 प्रतिशत) घटा देने का प्रस्ताव रखा गया है।

जबकि लोगों को दी जाने वाली सब्सीडी घटायी जा रही है और लोगों के उपभोग की चीजों पर टैक्स बढ़ाये जा रहे हैं, तो इस वर्ष में अमीर पूंजीपतियों तथा उनकी कंपनियों को दी गयी टैक्स छूट 5,70,000 करोड़ रुपये तक बढ़ गयी है।

राज्य के दमन के तंत्र, रक्षा और पुलिस, पर खर्च साल दर साल बढ़ता जा रहा है। रक्षा पर खर्च 12 प्रतिशत से बढ़कर 1,64,415 करोड़ रुपये हो जायेगा जबकि गृह मंत्रालय (जिसका अधिकतम खर्चा केन्द्रीय पुलिस और सुरक्षा दलों पर होता है) का बजट 16 प्रतिशत से बढ़कर 39,600 करोड़ रुपये हो जायेगा।

पूंजीवादी वित्त संस्थानों को ब्याज भुगतान के रूप में 2,67,986 करोड़ रुपये दिये जायेंगे, जो लोगों द्वारा दिये गये टैक्स से निकाला जायेगा।

आने वाले वर्ष में निजीकरण का अजेंडा और तेजी से लागू किया जायेगा। बजट में घाटे को कम करने के नाम पर विनिवेश को जारी रखा जायेगा। इस प्रकार बड़े हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों के अजेंडे को और तेजी से लागू किया जायेगा, जबकि मजदूर-मेहनतकशों से इसके लिये और भारी अदायगी की जायेगी।

सब्सीडी में स्थगन और कटौती

2011-12के लिये खाद्य पर सब्सीडी को उसी स्तर पर रखा गया है। खाद्य कीमतों के बढ़ते दामों के कारण असलियत में मिलने वाली खाद्य सब्सीडी घट जायेगी। यह है लोगों को ''भूख से मुक्ति'' सुनिश्चित कराने के सरकार के वादे की सच्चाई!

बजट में यह प्रस्ताव किया गया है कि उर्वरक पर सब्सीडी को लक्षित पैसे की लेन-देन में बदल दिया जाये। उर्वरक पर सब्सीडी को न सिर्फ घटाया गया, इसके अलावा तथाकथित लक्षित आबादी को पैसे की लेन-देन सुनिश्चित कराने के लिये कोई तंत्र नहीं स्थापित किया गया है। जबकि इस समय सभी किसानों को कुछ सब्सीडी मिलती है, आगे चलकर किसानों को इस आधार पर बांटा जायेगा कि कौन पैसे की लेन-देन के लिये योग्य है और कौन नहीं। इस तरह यह बजट जो किसान-परस्त होने का दावा करता है वह हकीकत में पूरी तरह किसान विरोधी है।

पेट्रोलियम पर सब्सीडी को लगभग 40 प्रतिशत से घटाया जायेगा, ऐसे समय पर जब बीते दो वर्षों में कच्चे तेल की कीमतें अब सबसे अधिक हैं। इसका यह मतलब है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों की वृध्दि का बोझ लोगों पर लाद दिया जायेगा। इस तरह लोगों के उपभोग की सभी चीजों की कीमतें और बढ़ जायेंगी। सरकार पेट्रोल और डीजल के जरिये लोगों से सबसे अधिक शुल्क और टैक्स वसूलती है परन्तु इन शुल्कों और टैक्सों को कम करके पेट्रोल और डीजल की कीमत घटाकर लोगों को कुछ राहत दिलाने का बजट में कोई प्रस्ताव नहीं है।

वित्त मंत्री ने यह घोषणा की कि सरकार मार्च 2012 से उर्वरक, ईंधन और रसोई गैस की सब्सीडी की जगह पर प्रत्यक्ष पैसे की लेन-देन की व्यवस्था लाएगी। इस प्रत्यक्ष पैसे की लेन-देन की व्यवस्था के तहत सरकार किसी परिवार को उतना पैसा देगी जितना उसे सब्सीडी मिलता था और वह परिवार फिर उन चीजों को अपनी मर्जी के अनुसार कहीं से भी बाजार की कीमत पर खरीदेगा। यह प्रत्यक्ष पैसे की लेन-देन की व्यवस्था का प्रस्ताव असलियत में मौजूदे सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को पूरी तरह खत्म कर देने की दिशा में एक कदम है। आज देश में सबसे अधिक संख्या में लोग मिट्टी का तेल खरीदते हैं। इसे सार्वजनिक वितरण व्यवस्था से हटाने का कोई औचित्य नहीं हो सकता। सरकार ने खुद यह स्वीकार किया है कि बी.पी.एल. की गणना में लाखों ऐसे परिवार छूट गये हैं जिन्हें मदद की जरूरत है, पर दूसरी ओर सरकार इसी वर्गीकरण को जारी रखते हुये यह तय करना चाहती है कि किस-किस को प्रत्यक्ष लेन-देन का पैसा मिलेगा और किस-किस को नहीं।

रोजी-रोटी और शिक्षा के बजट स्थगित

सभी जरूरतमंद लोगों को रोजी-रोटी दिलाना राज्य का दायित्व है। राज्य ने नरेगा योजना को इस उद्देश्य से लागू किया था कि प्रत्येक जरूरतमंद ग्रामीण परिवार के एक व्यक्ति को 100 दिन का काम मिले। कुछ समय पहले सरकार ने मुद्रास्फीति की हालतों से निपटने के लिये नरेगा के तहत दिये गये वेतनों में संशोधन घोषित किया था। परन्तु नरेगा के लिये इस बजट में फिर से पिछले साल के ठीक बराबर, 40,000 करोड़ रुपये ही दिये गये हैं। इसका यह मतलब है कि आने वाले वर्ष में नरेगा के तहत या तो कम लोगों को नौकरी मिलेगी या कम दिनों के लिये।

2010 में शिक्षा का अधिकार कानून पास किया गया, जिसके तहत यह कहा गया है कि राज्य प्रत्येक बच्चे को शिक्षा सुविधा तथा शिक्षा प्राप्त करने के साधन दिलाने को बाध्य है। वर्तमान वर्ष में सर्व शिक्षा अभियान का संशोधित बजट 19,000 करोड़ रुपये था। आगामी वर्ष में इसका बजट मात्र 10 प्रतिशत से बढ़ाकर, 21,000 करोड़ रुपये रखा गया है, जबकि अभी भी करोड़ों बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं या स्कूल छोड़ने को मजबूर होते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शिक्षा का अधिकार कानून के तहत अपने दायित्व को पूरा करने का राज्य का कोई इरादा नहीं है, बल्कि ऐसा कानून पास करके लोगों को बुध्दू बनाना ही उसका इरादा है।

यह भ्रम तो किसी में नहीं था कि इस बजट से अर्थव्यवस्था की दिशा बदल जायेगी, परन्तु अगर मेहनतकशों ने छोटी सी राहत की भी कोई उम्मीद रखी थी तो उन उम्मीदों को पांव तले रौंद दिया गया है। लोगों की समस्याओं को हल करने तथा लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिये अर्थव्यवस्था की दिशा में मूल परिवर्तन लाना होगा। इस परिवर्तन को लाने के लिये लोगों को अपने हाथों में राज्य सत्ता लेनी होगी।

सब्सीडी 2010-11  (संशोधित अनुमान) 2011-12  (बजट अनुमान)
उर्वरक 54,977 49,998
खाद्य 60,600 60,573
पेट्रोलियम 38,386 23,640
सभी पदार्थ   1,64,153 143,570

सभी आंकड़े करोड़ रुपये में हैं 

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