राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम पर एन.ए.सी. का नोट

सार्वजनिक खाद्य वितरण को सर्वव्यापी बनाने की मांग से कोई समझौता नहीं!

एन.ए.सी. के कथित उद्देश्य और ठोस प्रस्ताव के बीच में बहुत चौड़ी खाई है। कथित उद्देश्य सभी नागरिकों को खाद्य के अभाव से रक्षा देना है। ठोस प्रस्ताव सिर्फ कुछ ''नाजुक हालत वाले परिवारों'' को रक्षा देने और वह भी सीमित मात्रा में सिर्फ गेहूं, चावल या मोटे अनाज़ देने का है। बाकी आबादी, जिसमें 50 प्रतिशत शहरी आबादी शामिल है, अपनी खाद्य जरूरतों को पूरा कर पायेगी या नहीं, इस पर खाद्य सुरक्षा कानून कुछ भी नहीं कहता।

सार्वजनिक खाद्य वितरण को सर्वव्यापी बनाने की मांग से कोई समझौता नहीं!

कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में गठित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एन.ए.सी.) ने प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम को समझाते हुये एक नोट जारी किया है और इसमें रूचि रखने वाले सभी दलों से 15 मार्च तक इस नोट पर टिप्पणियां देने का आह्वान किया है। यह नोट उस राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के मसौदे के समर्थन में है, जो 'प्राथमिक' और 'आम' वर्गों के परिवारों को नियंत्रित दाम पर चावल, गेहूं या मोटे अनाज तय की गई मात्रा में, कुछ शर्तों के अनुसार दिलायेगा।

नोट के प्रथम वाक्य में एन.ए.सी. ने एलान किया है कि प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून का ''उद्देश्य है हिन्दोस्तान के सभी बच्चों, महिलाओं और पुरूषों को भूख और खाद्य के अभाव से सुरक्षा देना''। परन्तु यह ठोस प्रस्ताव किया जा रहा है कि अनाज का सार्वजनिक वितरण क्रमश: देश की तीन चौथाई आबादी (90 प्रतिशत ग्रामीण और 50 प्रतिशत शहरी आबादी) को ही प्राप्त होगा। यह मान लिया गया है कि बाकी आबादी बाजार से अनाज खरीद सकती है और उसे नियंत्रित दाम पर अनाज दिलाने की कोई जरूरत नहीं है। इसके समर्थन में कोई सबूत नहीं दिया गया है।

2006-07 के सरकारी नेशनल सेम्पल सर्वे के अनुसार, शहरी आबादी का 80 प्रतिशत प्रतिमाह प्रति व्यक्ति 1800रुपये से कम खर्च कर पाता है। इन हालतों में यह मुमकिन नहीं है कि कोई मेहनतकश व्यक्ति बाजार की कीमतों पर अपनी संम्पूर्ण खाद्य जरूरतों को पूरा कर सके।

अत: एन.ए.सी. के कथित उद्देश्य और ठोस प्रस्ताव के बीच में बहुत चौड़ी खाई है। कथित उद्देश्य सभी नागरिकों को खाद्य के अभाव से रक्षा देना है। ठोस प्रस्ताव सिर्फ कुछ ''नाजुक हालत वाले परिवारों'' को रक्षा देने और वह भी सीमित मात्रा में सिर्फ गेहूं, चावल या मोटे अनाज़ देने का है। बाकी आबादी, जिसमें 50 प्रतिशत शहरी आबादी शामिल है, अपनी खाद्य जरूरतों को पूरा कर पायेगी या नहीं, इस पर खाद्य सुरक्षा कानून कुछ भी नहीं कहता। गिने-चुने नाज़ुक हालत के परिवारों को भी सिर्फ अनाज़ की गारंटी ही दी जायेगी। वे दाल, दूध, सब्जियां, तेल और पौष्टिक आहार की अन्य जरूरतों को खरीद पायेंगे या नहीं, इस पर कुछ नहीं कहा जा रहा है। देश में नौजवान पुरूषों और स्त्रियों में कुपोषण की ऊंची मात्रा के बावजूद, एन.ए.सी. ने अपने प्रस्ताव में सार्वजनिक वितरण व्यवस्था से दाल और तेल को निकाल दिया है, परन्तु खाद्य और पोषण की सुरक्षा की बात कर रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि वह इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रहा है!

डा.सी. रंगराजन की अगुवाई में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा गठित एक विशेषज्ञ समिति ने जनवरी 2011 में अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उस रिपोर्ट में यह प्रस्ताव किया गया है कि सार्वजनिक खाद्य वितरण को ''सरकार के पास उपलब्ध अनाजों'' के अनुसार, आधी से कम आबादी तक सीमित किया जाये। मेहनतकश लोगों के अनेक संगठनों ने उस रिपोर्ट की जमकर निंदा की। एन.ए.सी ने अपने नोट में यह कहा है कि सिर्फ 75 प्रतिशत आबादी को क्रमश: खाद्य दिलाना मुमकिन है और सार्वजनिक प्रापण में 15 प्रतिशत – 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी से यह मुमकिन होगा।

न तो विशेषज्ञ समिति और न ही एन.ए.सी. इस असूल को मानता है कि खाद्य एक सर्वव्यापी अधिकार है और इसकी गारंटी सभी के लिये होनी चाहिये। सर्वव्यापी अधिकार की जगह पर वे कुछ शर्तों के साथ खाद्य दिलाने की बात करते हैं। जिस कानून का उन्होंने प्रस्ताव किया है, उसके तहत कोई मजदूर यह मांग लेकर अदालत नहीं जा सकेगा, कि उसे और उसके परिवार को ऐसी कीमतों पर खाद्य प्राप्त हो जो वह दे सकता है। किसी भी मेहनतकश परिवार को सिर्फ मूल अनाज ही मिलेगा और उस अनाज का दाम तथा कितनी मात्रा में अनाज मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर होगा कि उस परिवार के पास 'प्राथमिक' कार्ड है, 'आम' कार्ड है या कोई भी कार्ड नहीं है। आबादी को 'प्राथमिक' और 'आम' वर्गों में बांटकर एन.ए.सी. ने न सिर्फ खाद्य के अधिकार को सर्वव्यापी बनाने से इंकार किया है, बल्कि वह लोगों को बांट रहा है। इससे लोगों के आत्म सम्मान को ठेस पहुंचती है और खाद्य के अधिकार को एक संविधानीय अधिकार, जिसे पाने के लिये कानून का सहारा लिया जा सके, ऐसा अधिकार बनाने के लिये संघर्ष कर रहे लोगों की एकता को तोड़ा जा रहा है। आबादी को 'प्राथमिक', 'आम' और बिना कार्ड वालों के वर्गों में इस तरह बांटना वर्तमान बी.पी.एल., ए.पी.एल. और बिना कार्ड वालों में आबादी के बंटवारे से किसी भी मूल रूप से भिन्न नहीं है। यह बंटवारा हमेशा मनमानी से किया गया है और अभी भी किया जा रहा है। राज्य और शासक वर्ग की पार्टियां इस बंटवारे का फायदा उठाकर, वोट हासिल करने की राजनीति के आधार पर, किसी को अनुदान देते हैं तो किसी और को इससे वंचित करते हैं।

प्रस्ताव को समझाने वाले नोट में कई ऐसी बातें हैं जो जनता के गुस्से को ठंडा करने के लिये डाली गयी हैं, जैसे कि राज्यों को अपने क्षेत्र के अन्दर अनाज खरीदने और वितरित करने को प्रोत्साहित करने के कदम और एक सुधरी हुई सार्वजनिक वितरण व्यवस्था जिसमें ''राशन की दुकानों को समुदाय के संस्थानों द्वारा चलाया जायेगा, जो अपने खरीदारों के प्रति जवाबदेह होंगे'', का विचार।

विशेषज्ञ समिति के प्रस्तावों की तुलना में एन.ए.सी. के प्रस्ताव को ''बेहतर विकल्प'' या ''कम बुरा'' बताया जा रहा है। ''हम इतनी ही उम्मीद कर सकते हैं, अत: एन.ए.सी. के प्रस्ताव का समर्थन करें'' – यह तर्क पेश करके सर्वव्यापी खाद्य गारंटी के अधिकार के लिये संघर्ष को ठंडा करने की कोशिश की जा रही है।

सरकार के सभी सलाहकार संस्थान सर्वव्यापी सार्वजनिक खाद्य वितरण के प्रस्ताव को इंकार करने में इतना अड़ियल रवैया क्यों अपना रहे हैं? वित्त संसाधनों की कमी की अक्सर बात की जाती है परन्तु यह तो एक बहाना मात्र है। हाल के वर्षों में केन्द्रीय सरकार ने अर्थव्यवस्था को 'प्रेरित' करने के नाम पर बड़ी पूंजीवादी कंपनियों और बैंकोको लाखों-करोड़ों रुपये दिये हैं, जिससे 'धन की कमी' का तर्क बिल्कुल खोखला साबित होता है।

सच तो यह है कि खाद्य के सर्वव्यापी अधिकार का असूल पूंजीवादी मुनाफाखोरों के हितों के खिलाफ़ है। खाद्य को एक सर्वव्यापी अधिकार की मान्यता देना तो दूर, पूंजीपतियों की सरकारें खाद्य के व्यापार से पूंजीवादी कंपनियों को प्राप्त होने वाले मुनाफों को बढ़ाने के तौर-तरीकों को और विस्तृत करने में व्यस्त रही हैं।

यह सच्चाई विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट से स्पष्ट होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सार्वजनिक अनाज की खरीदी (जो इस समय पूर्ण उत्पादन का लगभग एक तिहाई भाग है) को बढ़ाने से ''बाज़ार की कीमतों पर बुरा असर पड़ेगा'', अत: सार्वजनिक खरीदी को नहीं बढ़ाया जाना चाहिये। अगर सार्वजनिक खरीदी निजी खरीदी से ज्यादा हो जाती है, तो रिलायंस और दूसरे हिन्दोस्तानी तथा विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों की, आने वाले सालों में खाद्य से अधिकतम मुनाफे कमाने की योजनाएं सब बिगड़ जायेंगी।

खाद्य सुरक्षा की सर्वव्यापी गारंटी के लिये सार्वजनिक खरीदी और भंडारण बहुत निर्णायक है। परन्तु इसके लिये निजी खिलाड़ियों को उन सारी सहूलियतों से वंचित करना होगा, जो उन्हें इस समय मिलती हैं तथा जिनकी वे, अपनी सट्टेबाजी के मुनाफों को बढ़ाने के लिये, और अधिक मात्रा में मांग कर रहे हैं। वायदा बाजारी में जमाखोरी तथा सट्टेबाजी के ज़रिये दामों को बढ़ा या घटा कर खूब मुनाफे बनाये जाते हैं। पूंजीपति खाद्य पदार्थों और साथ ही साथ दूसरे पदार्थों के व्यापार से अधिकतम मुनाफे कमाने के मौके को नहीं खोना चाहेंगे। सरकार इन पूंजिपतियों के हितों की रक्षा करती है, अत: वह भूख और कुपोषण से सर्वव्यापी सुरक्षा के असूल को अमल में नहीं लाना चाहती है।

सर्वव्यापी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की मांग को लेकर अनेक संगठन और समूह संघर्ष में आगे आये हैं और वे इससे कम कुछ स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। सर्वव्यापी और बिना शर्त सार्वजनिक खाद्य वितरण के असूल से मजदूरों और किसानों को कभी भी समझौता नहीं करना चाहिये, बल्कि इसे एक अधिकार बतौर मान्यता दिलाने के लिये संघर्ष करना चाहिये! प्रत्येक बच्चे, स्त्री और पुरुष को पर्याप्त मात्रा में व उचित दाम पर खाद्य मिलना चाहिये। राज्य को यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिये। खाद्य सिर्फ गेहूं, चावल और मोटे अनाज तक सीमित नहीं होना चाहिये। लोगों को सिर्फ अनाज ही नहीं, बल्कि विटामिन, प्रोटीन और अन्य पौष्टिक पदार्थों की आवश्यकता है।

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