जर्मनी के ट्रेन चालकों की हड़ताल

22 फरवरी, 2011 को ट्रेन चालकों द्वारा 2 घण्टों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल की वजह से जर्मनी में सुबह की भीड़ वाले समय की रेल की यातायात ठप्प हो गयी है। राईन-मेन इलाका और स्टट्टगार्ट खास रूप से प्रभावित हुये। पूर्वी जर्मनी के ड्रेस्डेन और बर्लिन शहर की टे्रन व्यवस्था भी इस हड़ताल से प्रभावित हुयी।

22 फरवरी, 2011 को ट्रेन चालकों द्वारा 2 घण्टों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल की वजह से जर्मनी में सुबह की भीड़ वाले समय की रेल की यातायात ठप्प हो गयी है। राईन-मेन इलाका और स्टट्टगार्ट खास रूप से प्रभावित हुये। पूर्वी जर्मनी के ड्रेस्डेन और बर्लिन शहर की टे्रन व्यवस्था भी इस हड़ताल से प्रभावित हुयी।

टे्रन चालक राष्ट्रीय जर्मन रेलवे द्वारा गारंटी दी गयी न्यूनतम आमदनी के आधार पर, मेन लाईन, मेट्रो और भार वाहन रेलवे में काम कर रहे 26,000 चालकों के लिये एक राष्ट्रीय ठेका समझौता मांग रहे थे। निजी रेलवे कर्मियों के वेतन राष्ट्रीय रेल के औसतन वेतन से लगभग 30 प्रतिशत कम है। इसके अलावा निजी रेलवे में काम करने वालों के काम के हालात और सामाजिक हालात भी राष्ट्रीय रेल कर्मियों से काफी खराब हैं और उन्हें आराम करने के लिये भी राष्ट्रीय रेल कर्मियों से कम समय मिलता है।

इस राष्ट्रीय ठेके की मुख्य विशेषताएं हैं – राष्ट्रीय रेल चालकों के वर्तमान ठेके के आधार पर 5 प्रतिशत वेतन वृध्दि, मालिक के बदलने पर समान शर्तों पर रोजगार की निरंतरता, हफ्ते में 38 घण्टों का काम चालकों के लिये न्यूनतम मापदण्ड और उन चालकों के लिये सुरक्षा जो अब टे्रन चलाने के काबिल नहीं रह गये हैं। टे्रन चालकों ने बताया है कि निजी कंपनियों द्वारा चलाये जा रहे रेलवे के चालकों का काम का बोझ इतना अधिक है कि दोनों रेल कर्मियों और सवारियों को इससे खतरा है। सरकारी आंकड़ों से भी यह बात सच साबित होती है। मिसाल के तौर पर, 2009 में राष्ट्रीय रेल के चालकों की तुलना में, निजी रेल कंपनियों के चालकों ने तीन गुना ज्यादा लाल विराम बत्तिायों का उल्लंघन किया था।

मार्च, 2011 के आरंभ में मजदूरों के बीच जनमत लेने पर यह पता चला कि राष्ट्रीय रेल के 92 प्रतिशत यूनियन सदस्य तथा निजी रेल कंपनियों के 96 प्रतिशत सदस्य औद्योगिक हड़ताल और बेमियादी हड़ताल के पक्ष में थे।

पूंजीपतियों और सरकार के सीधे दमन के साथ-साथ, जर्मनी के रेल मजदूरों को मजदूर नेता के वेश में गद्दारी करने वालों का भी सामना करना पड़ता है। मिसाल के तौर पर, 2007-08 वर्ष में एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल के दौरान यूनियनों की आपसी दुश्मनी को रेल मजदूरों की एकता तोड़ने के लिये इस्तेमाल किया गया था और बाद में इन्हीं यूनियनों के एक नेता को 33,000 यूरो (20 लाख रुपये) के औसतन मासिक वेतन पर राष्ट्रीय रेल बोर्ड में मैनेजर के पद पर रख लिया गया।

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