यह गणतंत्र पूंजीपति वर्ग की हुकूमत का साधन है

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 23 जनवरी, 2024.

इस वर्ष 26 जनवरी को हिन्दोस्तान के गणतंत्र घोषित किये जाने की 74वीं वर्षगांठ है। आज के दिन 1950 में स्वतंत्र हिन्दोस्तान का संविधान लागू हुआ था।

पिछले 74 वर्षों के जीवन के अनुभव से स्पष्ट होता है कि हिन्दोस्तानी गणतंत्र सभी मामलों में संविधान की घोषणाओं के बिल्कुल विपरीत है।

नीति निदेशक तत्व (हिन्दोस्तान के संविधान का भाग चार) यह घोषणा करते हैं कि राज्य की नीति हर किसी को काम करने और रोज़गार कमाने का अधिकार सुनिश्चित करने की दिशा में होगी। हक़ीक़त तो यह है कि बेरोज़गारी चरम स्तर तक बढ़ गई है। स्थिति इतनी भयावह है कि बेरोज़गार युवाओं को, फ़िलिस्तीनी मज़दूरों की जगह पर, इज़राइल में नौकरी देने का वादा किया जा रहा है।

नीति निदेशक तत्वों में घोषित किया गया है कि राज्य की नीति यह सुनिश्चित करेगी कि आर्थिक विकास की वजह से धन बहुत कम हाथों में केंद्रित न हो जाए। पर वास्तविकता यह है कि हिन्दोस्तानी राज्य अपनी नीति को मेहनतकश जनता को ग़रीबी की ओर धकेल कर, एक अमीर अल्पसंख्यक तबके को और अधिक अमीर बनाने की दिशा में संचालित कर रहा है। सबसे अमीर 1 प्रतिशत आबादी के पास

40 प्रतिशत से अधिक धन है। सबसे बुनियादी समस्याओं का भी समाधान नहीं किया गया है। क़रीब 41 प्रतिशत लोगों के पास पक्के मकान नहीं हैं। लगभग 30 प्रतिशत घरों में शौचालय की सुविधा नहीं है। सभी बच्चों के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा एक खोखला वादा बनकर रह गई है। मज़दूरों और किसानों के बच्चों को बचपन से ही शिक्षा में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 14-18 साल की उम्र के लगभग

25 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 में पढ़ाया गया पाठ नहीं पढ़ सकते हैं। वे साधारण जोड़ना और घटाना भी नहीं कर सकते हैं। सरकारी स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार, 4.5 करोड़ से अधिक बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास कुपोषण के कारण स्थगित है।

इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड में महिलाओं को प्रमुख भूमिका निभाने के लिए संगठित किया गया है। इसका प्रचार यह बताते हुए किया जा रहा है कि राज्य ने हमारे देश में लड़कियों और महिलाओं की मुक्ति के लिए कितना कुछ किया है। सच तो यह है कि महिलाएं और लड़कियां बेहद दमनकारी और शोषणकारी व्यवस्था की शिकार बनी हुई हैं, और राज्य इस व्यवस्था की हिफ़ाज़त करता है। महिला पहलवानों के हालिया साहसी संघर्ष से सत्ता में बैठे लोगों के हाथों महिलाओं का यौन उत्पीड़न फिर सामने आया है।

संविधान की प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि हिन्दोस्तानी राज्य एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसके सबूत के तौर पर इस तथ्य का हवाला दिया जाता है कि समय-समय पर चुनाव होते रहते हैं। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में चुनाव एक बहुत ही असमान प्रतियोगिता है। करोड़ों रुपयों के प्रचार बजट वाली सरमायदारी पार्टियों का चुनावों पर वर्चस्व है। जो लोग मज़दूरों और किसानों के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनका चुना जाना लगभग असंभव है।

उम्मीदवारों के चयन में मतदाताओं की कोई भूमिका नहीं है। अपने धन बल और मीडिया पर प्रभुत्व का उपयोग करके, पूंजीपति अपनी भरोसेमंद पार्टियों में से एक को चुनाव जिताते हैं और उसकी सरकार बनाते हैं। चुनावों के बाद, लोगों के पास यह सुनिश्चित करने का कोई तरीक़ा नहीं होता है कि चुने गए प्रतिनिधि उनके हित में कार्य करें। यदि उनका निर्वाचित प्रतिनिधि उनके हितों के विरुद्ध कार्य करता है तो लोगों को उन्हें वापस बुलाने का अधिकार नहीं है। फ़ैसले लेने की पूरी प्रक्रिया में लोगों को मात्र दर्शक बनाकर रखा गया है। लिए गए फ़ैसलों को प्रभावित करने की किसी भी शक्ति से लोगों को वंचित कर दिया गया है।

संविधान में यह घोषणा, कि यह एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है, आज पूरी तरह बेनकाब हो गई है। राज्य मशीनरी धार्मिक मामलों में गहराई से उलझी हुई है। धार्मिक आस्था और जाति के आधार पर बड़े पैमाने पर भेदभाव होता है। राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा के बार-बार होने वाले कांडों में हज़ारों लोग मारे गए हैं।

ज़मीनी हक़ीक़त संविधान के दावों के विपरीत इसलिए है क्योंकि 1947 में ब्रिटिश शासकों ने सत्ता की सर्वाेच्च शक्ति हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग को हस्तांतरित कर दी थी। इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट ने संप्रभुता को ब्रिटिश ताज से हिन्दोस्तान की संविधान सभा को हस्तांतरित कर दिया था। संविधान सभा में बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों के प्रतिनिधि हावी थे। संविधान सभा ने जिस संविधान को अपनाया, वह एक ऐसी व्यवस्था को वैधता देता है, जिसमें फ़ैसले लेने की शक्ति पूरी तरह से पूंजीपति वर्ग के हाथों में है। प्रस्तावना और नीति निदेशक तत्वों का उद्देश्य था राज्य के वास्तविक चरित्र को छिपाते हुए, उन सभी चीजों का वादा करना, जो लोग चाहते थे।

हिन्दोस्तान का संविधान संप्रभुता, यानी फ़ैसले लेने की शक्ति, लोगों के हाथों में नहीं देता है। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिमंडल को नीतिगत फ़ैसले लेने का विशेष अधिकार है। नये क़ानून बनाने का विशेष अधिकार संसद को है। क़ानून और नीतियां क्या होनी चाहिएं, यह तय करने में लोगों की कोई भूमिका नहीं है।

हिन्दोस्तानी राज्य पूंजीपति वर्ग की हुकूमत का साधन है। इस गणतंत्र की सभी संस्थाएं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका-पूंजीपति वर्ग के कार्यक्रम को लागू करने के लिए काम करती हैं। पूंजीपति वर्ग के एजेंडे का विरोध करने वालों को सुरक्षा बलों की लाठियों और गोलियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अपराधी बताकर जेल में डाल दिया जाता है। आज हिन्दोस्तान की जेलों में लगभग पांच लाख कैदी हैं, जिनमें से 70 प्रतिशत को अभी तक किसी भी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया है।

हमारे देश के लोग सभी प्रकार के शोषण और उत्पीड़न से मुक्ति की आकांक्षा रखते हैं। इस आकांक्षा को पूरा करने के लिए, पूंजीपति वर्ग की हुकूमत की जगह पर, मज़दूरों और किसानों की हुकूमत स्थापित करनी होगी। ऐसा करके ही सभी प्रकार के शोषण को समाप्त किया जा सकेगा और अर्थव्यवस्था को, पूंजीवादी लालच को पूरा करने के बजाय, लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में संचालित किया जा सकेगा।

हमें एक नए प्रकार का गणतंत्र स्थापित करना होगा, जिसका संविधान लोगों को संप्रभुता प्रदान करेगा। संविधान को यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्यपालिका विधायिका के प्रति जवाबदेह हो और विधायिका मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हो। संविधान को एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया की व्यवस्था करनी चाहिए, जिसमें मेहनतकश लोगों की निर्णायक भूमिका हो। सभी मतदाताओं को उम्मीदवारों के चयन में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और उसके बाद ही किसी उम्मीदवार को चुनना चाहिए। मतदाताओं को अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को किसी भी समय वापस बुलाने का अधिकार और क़ानून बनाने का अधिकार भी मिलना चाहिए। संविधान को दोबारा बनाने के अधिकार समेत बाकी सभी शक्तियां लोगों के पास होनी चाहिए।

कुल मिलाकर, हिन्दोस्तानी गणतंत्र के नव-निर्माण की ज़रूरत है। ऐसा करके ही समाज के सभी सदस्यों के लिए खुशहाली और सुरक्षा की गारंटी दी जा सकती है।

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