चुनाव अभियानों में पूंजीपतियों द्वारा धन लगाये जाने की समस्या

चुनावी-मुक़ाबलों पर धनबल का प्रभुत्व, यह मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ख़ामियों में से एक है। पूंजीपति अपनी पसंदीदा पार्टियों के चुनाव अभियानों के लिये धन देते हैं। ऐसी पार्टियों द्वारा बनाई गई सरकारें पूंजीपतियों के हित में काम करती हैं। इससे हुक्मरानों के इस दावे का पर्दाफ़ाश होता है कि यह हुकूमत लोगों का, लोगों द्वारा और लोगों के लिए है।

electoral-bonds-funds_to_partiesहाल के वर्षों में चुनावी-बांड (इलेक्टोरल बांड) पूंजीवादी कंपनियों के लिए अपनी पसंदीदा पार्टियों के अभियानों को धन देने का एक सुविधाजनक तरीक़ा बनकर उभरा हैं। भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार, जिसने 2018 में चुनावी-बांड योजना शुरू की थी, उसका दावा है कि यह योजना देश में राजनीतिक और चुनावी फंडिंग को “साफ” करने का काम करती है। यह दावा इस बात पर आधारित है कि चुनावी-बांड चुनाव अभियानों की फंडिंग में सफेद-धन के इस्तेमाल के लिए बनाया गया एक तरीक़ा है। परन्तु, काले धन के स्थान पर सफेद धन का प्रयोग, चुनावी मुक़ाबलों में असमान धन-शक्ति की समस्या को हल नहीं करता है।

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रतिद्वंद्वी पार्टियों और उम्मीदवारों का कुल खर्च 60,000 करोड़ रुपये से भी अधिक होने का अनुमान है। इसका मतलब है कि प्रति लोकसभा क्षेत्र में औसतन 100 करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च किये गये। पूंजीवादी अरबपतियों द्वारा समर्थित पार्टियों ने प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में करोड़ों रुपये खर्च किए, जबकि मज़दूरों और किसानों के हितों के लिए लड़ने वालों को केवल कुछ लाख से ही काम चलाना पड़ा।

विभिन्न विपक्षी पार्टियों के प्रतिनिधियों को इस बात पर आपत्ति है कि चुनावी-बांड के माध्यम से कौन-सा पूंजीवादी समूह किस पार्टी को कितना योगदान दे रहा है, इसकी जानकारी जनता से छिपी रहती है। लेकिन, अगर ऐसी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई भी जाती है, तो भी चुनावी मुक़ाबले में बेहद असमानता तो बनी ही रहेगी। यदि कुछ सरमायदारी पार्टियों के उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार का खर्च मज़दूरों और किसानों के उम्मीदवारों की तुलना में 50 या 100 गुना हो तो क्या चुनाव को एक निष्पक्ष मुका़बला माना जा सकता है?

चुनावों में धनबल का वर्चस्व और राजनीतिक प्रक्रिया पर पूंजीपति वर्ग की पार्टियों का वर्चस्व इस दावे का पर्दाफ़ाश करता है कि हिन्दोस्तान के चुनाव दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। “लोकतंत्र” या लोगों की इच्छा की अभिव्यक्ति तो बहुत दूर, वर्तमान व्यवस्था में चुनाव “धनतंत्र” हैं, जो सबसे अमीर लोगों की हुकूमत को सुनिश्चित करने के लिए धनबल का एक घिनावना प्रदर्शन है।

पूंजीपति वर्ग द्वारा समर्थित पार्टियां करोड़ों व्हाट्सएप और फेसबुक खातों तक अपनी पहुंच को खरीदने के लिए बहुत भारी मात्रा में पैसा ख़र्च करती हैं। परिणामस्वरूप, वे अपने छोटे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कहीं अधिक लोगों को प्रतिदिन, अपने अभियान संदेश भेजने में सक्षम होती हैं। ऐसी पार्टियों के अभियान पेशेवर सलाहकारों द्वारा डिजाइन किए जाते हैं, जिन्हें शानदार मोटी फीस दी जाती है। वे टीवी, प्रिंट और सोशल मीडिया पर विज्ञापन देने के लिए भारी मात्रा में धन खर्च करते हैं।

चुनावों के निष्पक्ष होने के लिए ज़रूरी शर्तों में से एक यह है कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के अभियानों को सार्वजनिक रूप से वित्त-पोषित (फण्ड) किया जाना चाहिए, जिससे प्रत्येक प्रतिद्वन्द्वी को लोगों के साथ बात करने का समान अवसर मिले। जब तक अत्यधिक अमीर पूंजीपतियों को अपनी विश्वसनीय पार्टियों के चुनाव अभियानों के लिए धन देने की अनुमति है, तब तक मज़दूरों और किसानों के उम्मीदवारों का चुनाव जीतना लगभग असंभव है। इसलिए न केवल चुनावी बांड के तंत्र को बल्कि चुनाव अभियानों के सभी प्रकार के पूंजीवादी फंडिंग को समाप्त करना आवश्यक है।

अगर चुनाव प्रक्रिया को लोगों की इच्छा को प्रकट करना है तो इसकी दूसरी आवश्यक शर्त यह है कि एक ऐसा तंत्र होना चाहिए जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल ऐसे उम्मीदवारों का चयन किया जाए जिन्हें लोगों का समर्थन प्राप्त है और उम्मीदवार सार्वजनिक धन से समर्थित होने के योग्य हैं।

जब तक चुनावों में उम्मीदवारों का चयन पूंजीपति वर्ग की प्रतिस्पर्धी राजनीतिक पार्टियों के आलाकमानों द्वारा किया जाता है, और लोगों के पास चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों का चयन करने की कोई ताक़त नहीं है, तब तक चुनावों के लिए, राज्य द्वारा फंडिंग करने से भी, इस मूलभूत समस्या का समाधान नहीं होगा। वर्तमान व्यवस्था के चलते, चुनावों के पब्लिक फंडिंग का मतलब है कि पूंजीपतियों की पार्टियों के उम्मीदवारों की फंडिंग करने का बोझ भी मेहनतकश जनता पर पड़ेगा, जबकि ऐसे उम्मीदवारों का एजेंडा पूंजीपतियों को और अमीर बनाना है और साथ-साथ यह दिखावा भी करना है कि वे लोगों के हित में काम कर रहे हैं।

चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन के तरीके को बदलना आवश्यक है। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं को, नामांकित किसी भी उम्मीदवार को स्वीकृत या अस्वीकार करने का अधिकार होना चाहिए। प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवारों की अंतिम सूची का चयन करने में उस क्षेत्र के मतदाताओं की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए।

एक नई राजनीतिक प्रक्रिया बनाने की सख़्त ज़रूरत है जिसमें कार्यपालिका निर्वाचित संसद या विधान सभा के प्रति जवाबदेह हो, और जो निर्वाचित होते हैं वे मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हों। ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया में लोग निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी सारी शक्ति नहीं सौंपेंगे। हम आम लोग, निर्वाचित प्रतिनिधियों से लोगों के प्रति उनकी जिम्मेदारी निभाने के बारे में उनसे जवाब-तलब करने की मांग करने की शक्ति बरकरार रखेंगे। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि हमारे हित में कार्य करने में विफल रहता है तो हमें किसी भी समय उसे वापस बुलाने का अधिकार होगा। हमें नए क़ानून और नयी नीतियां शुरू करने का अधिकार होगा।

छः महीने से भी कम समय में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। लोगों के लिए, राजनीतिक प्रक्रिया और लोकतंत्र की संपूर्ण व्यवस्था में आवश्यक बदलावों के बारे में सोचने का यह सही समय है। हमें ऐसे बदलावों को लाने के बारे में सोचना चाहिए, जिनसे हर मुद्दे पर फ़ैसले लेने की शक्ति को मेहनतकश बहुसंख्यक जनता के हाथों में लाया जा सके।

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