निर्भया के भयानक बलात्कार और हत्याकांड के 11 साल बाद :
महिलाएं अभी भी सबसे बुरी तरह की हिंसा और भेदभाव का शिकार होती हैं

Nirbhaya_protestइस साल 16 दिसंबर को उस दिन के 11 साल पूरे हो गए, जिस दिन एक मज़दूर युवती “निर्भया” के साथ दिल्ली में सामूहिक बलात्कार किया गया था और उस पर जानलेवा हमला किया गया था। उस भयानक घटना के खि़लाफ़, दिल्ली और पूरे हिन्दोस्तान में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे। लोगों ने दोषियों को सज़ा देने की मांग की। उन्होंने राज्य और उसकी पुलिस, जो महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रही है, उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की। लोगों ने महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और आपराधिक न्याय प्रणाली में बड़े सुधार करने के लिए उपयुक्त प्रावधानों की मांग की।

23 दिसंबर, 2012 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश, जे.एस. वर्मा के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया। उस आयोग को आपराधिक क़ानूनों में संशोधन की सिफ़ारिश करने के लिए कहा गया था, ताकि “महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न के आरोपी अपराधियों के ख़िलाफ़ तुरंत सुनवाई और अधिकतम सज़ा दी जा सके”।

जस्टिस वर्मा आयोग ने अपनी रिपोर्ट 23 जनवरी, 2013 को सरकार को सौंपी थी। आयोग ने इसमें 10 सिफ़ारिशें की थीं जिनमें शामिल थे – बलात्कार की व्यापक परिभाषा, महिलाओं के ख़िलाफ़ अन्य अपराध जैसे कि उनका पीछा करना, ताक-झांक करना, यौन उत्पीड़न करना, एसिड से हमला करना, आदि। आयोग ने पुलिस सुधारों, आपराधिक प्रक्रिया संहिता में संशोधन और महिलाओं के खि़लाफ़ अपराधों के विशिष्ट संदर्भ में, मामलों के न्यायिक प्रबंधन में सुधार करने की सिफ़ारिश की थी। आयोग ने महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों से निपटने के लिए संस्थागत-तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा था, जैसे कि पुलिस द्वारा अनिवार्य एफ.आई.आर. दर्ज़ करना, आंतरिक शिकायत समितियों और शिकायत कक्षों की स्थापना करना, आदि।

कुछ नहीं बदला है

ग्यारह साल बाद भी यौन उत्पीड़न और अन्य प्रकार की हिंसा की शिकार महिलाओं की हालतें जस की तस बनी हुई हैं।

हमारे समाज में अधिकांश महिलाएं जो यौन उत्पीड़न, बलात्कार या किसी अन्य प्रकार की हिंसा का शिकार होती हैं, वे शिकायत दर्ज़ कराने या एफ.आई.आर. दर्ज़ कराने के लिए पुलिस स्टेशन जाने से डरती हैं। आमतौर पर उन्हें एक पुलिस स्टेशन से दूसरे पुलिस स्टेशन जाने के लिए कहा दिया जाता है। यहां तक कि अगर वह उपयुक्त पुलिस स्टेशन तक पहुंचने में क़ामयाब भी हो जाती है, तो पुलिस कई बहानों से उसकी शिकायत दर्ज़ करने या एफ.आई.आर. दर्ज़ करने से इनकार कर सकती है। पीड़ित महिला से इस तरह के सवाल पूछे जाते हैं, जो उसे बे-इज़्ज़त करने जैसे होते हैं। उस महिला से पूछा जाता है कि उसके साथ कौन था, उसने क्या पहना था, उस समय वह उस स्थान पर क्या कर रही थी, वह इतनी देर तक बाहर क्यों थी, आदि। इन सबका उद्देश्य होता है पीड़िता को उसके खि़लाफ़ हुये अपराध के लिए उसे खुद को ज़िम्मेदार के रूप में जलील करना।

जांच से लेकर मुक़दमे तक (यदि ऐसा होता है), पीड़ित महिला को हर क़दम पर अपमान सहना पड़ता है, उसे जलील किया जाता है। यहां तक कि यौन हिंसा से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पोक्सो) पारित होने के बावजूद – जिस क़ानून में बाल-बलात्कार और नाबालिगों के खि़लाफ़ यौन अपराधों की जांच के लिए विशेष प्रक्रियाएं निर्धारित की गयी हैं। इन अपराधों की शिकार नाबालिग बच्चियों को भी इस यातना और अपमान से नहीं बख्शा जाता है। क़ानूनों में बताए गए ऐसे अपराधों की शिकार महिलाओं के अधिकारों, जिसमें उनकी पहचान उजागर न करने का अधिकार भी शामिल है, इन सब अधिकारों का नियमित रूप से उल्लंघन किया जाता है।

इस प्रकार, महिलाओं के खि़लाफ़ अपराध लगातार जारी हैं और साल-दर-साल बढ़ते जा रहे हैं। हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) द्वारा प्रकाशित “हिन्दोस्तान में अपराध 2022” की रिपोर्ट इस हक़ीक़त को दर्शाती है। साल 2022 के दौरान, महिलाओं के खि़लाफ़ हुई हिंसा की दर्ज़ की गई घटनाएं 2021 के 4,28,278 से बढ़कर, 4,45,256 हो गईं, यह 2021 की तुलना में चार प्रतिशत वृद्धि दर्शाता है। प्रति लाख महिला जनसंख्या पर दर्ज़ की गयी अपराध दर 2021 में 64.5 की तुलना में 2022 में 66.4 थी। एक वर्ष में महिलाओं के खि़लाफ़ दर्ज़ अपराधों के मामले हर घंटे लगभग 51 एफ.आई.आर. दर्ज़ करने के बराबर हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि रिपोर्ट में केवल पुलिस के पास दर्ज़ की गयी शिकायतें ही दिखाई जाती हैं। महिलाओं के खि़लाफ़ अपराधों की दर प्रकाशित आंकड़ों की तुलना में बहुत अधिक है, महिलाओं को ऐसी शिकायतें दर्ज़ कराने में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

हाल ही के कुछ उदाहरण

हाल ही के कुछ उदाहरण, न्यायपालिका सहित हिन्दोस्तान की राज्य मशीनरी के पूरी तरह से महिला-विरोधी रवैये और महिलाओं को इन्साफ़ हासिल कर पाने के लिए किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, एक बार फिर उस हक़ीक़त का खुलासा करते हैं।

ओलंपिक पदक विजेताओं और राष्ट्रमंडल चैंपियन सहित प्रसिद्ध महिला पहलवानों ने अप्रैल-मई 2023 में एक महीने से अधिक समय तक नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया था। उन्होंने भारतीय कुश्ती संघ (डब्ल्यू.एफ.आई.) के प्रमुख और भाजपा सांसद बृज भूषण शरण सिंह पर, महिला पहलवानों के साथ यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया। उन्होंने डब्ल्यू.एफ.आई. प्रमुख के अपराधों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत उपलब्ध कराए थे। उन्होंने मांग की कि डब्ल्यू.एफ.आई. प्रमुख को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए, उनको उनके पद से हटाया जाना चाहिए और उनके खि़लाफ़ सख़्त कार्रवाई की जानी चाहिए। अभियुक्त के खि़लाफ़ एफ.आई.आर. दर्ज़ कराने लिए भी, महिला पहलवानों को चार दिनों तक लगातार विरोध-प्रदर्शन और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की ज़रूरत पड़ी। धरने पर बैठे प्रदर्शनकारी पहलवानों को पुलिस और अधिकारियों द्वारा सभी प्रकार की धमकियों, परेशानियों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। दिल्ली और देश-विदेश के कई हिस्सों में लोग बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी पहलवानों के समर्थन में एकजुट हुए और डब्ल्यू.एफ.आई. प्रमुख को सज़ा देने की मांग की। कई खिलाड़ियों और उनके संगठनों ने संघर्ष को अपना पूरा समर्थन दिया। आखि़रकार 28 जून को विरोध कर रहे पहलवानों को पीटा गया और जबरन प्रदर्शन स्थल से हटाकर पुलिस हिरासत में ले लिया गया। अपराधी बृजभूषण शरण सिंह अभी भी खुल्लम-खुल्ला बिना किसी रोक-टोक के आज़ाद घूम रहे हैं।

हिन्दोस्तान की आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ, 15 अगस्त, 2022 को 2002 के गुजरात में हुए क़त्लेआम के दौरान सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषी 11 लोगों को रिहा कर दिया गया। उन्हें एक गर्भवती महिला बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार करने और उसके परिवार के 14 सदस्यों की हत्या करने के जघन्य अपराध के लिए 2008 में आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। दोषियों ने उसके परिवार के अन्य सदस्यों के साथ भी बलात्कार किया और उसके तीन साल के बच्चे का सिर पत्थर से कुचलकर हत्या कर दी। अपराधियों को पकड़वाने के लिए बिलकिस बानो और उनके पति को लंबा और कठिन संघर्ष करना पड़ा। पीड़ितों सहित मानवाधिकार और महिला अधिकार संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका में दायर की है, जिसमें उन अपराधियों को छूट देने के अदालत के फै़सले को चुनौती दी गई है। अक्तूबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर अपना फै़सला सुनाने के लिए वक़्त मांगा है।

हाल ही में, दिसंबर 2023 के दूसरे सप्ताह में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में एक महिला न्यायाधीश ने न्यायपालिका के अन्य सदस्यों के द्वारा किये गए दुव्र्यवहार और यौन उत्पीड़न के परिणामस्वरूप हिन्दोस्तान के मुख्य न्यायाधीश से खुदकुशी करने की अनुमति मांगी है। अपने पत्र में, न्यायाधीश ने यौन उत्पीड़न से महिलाओं की सुरक्षा, अधिनियम (2013) को “एक बड़ा झूठ” बताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में आज की हक़ीक़त बयां की है कि “कोई नहीं सुनता, किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। शिकायत करोगी तो प्रताड़ित किया जायेगा। इस लिये अपनी औकात में रहो। जब मेरा मतलब है कि कोई नहीं सुनता, तो इसमें सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है। आपको आठ सेकेंड की सुनवाई में अपमान और जुर्माना लगाने की धमकी मिलेगी। आपको आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया जाएगा… अगर कोई महिला सोचती है कि आप इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ेंगी, तो मैं आपको साफ़ बता दूं, मैं ऐसा नहीं कर पायी” ऐसा उन्होंने अपने पत्र में लिखा है।

संघर्ष जारी है

दशकों से महिला संगठनों और अन्य प्रगतिशील संगठनों ने ऐसा क़ानून लाने के लिए संघर्ष किया है जो महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के अपराधों पर रोक लगाएगा। इन संघर्षों के परिणामस्वरूप, विभिन्न क़ानून पारित किए गए हैं, जैसे कि अनैतिक-व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956; दहेज-निषेध अधिनियम, 1961; महिलाओं का अश्लील प्रतिनिधित्व (निषेध) अधिनियम, 1986; सती-आयोग (रोकथाम) अधिनियम, 1987; घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 और कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013। हालांकि, बड़ी संख्या में महिलाओं के अपने जीवन के अनुभव से साफ़ पता चलता है कि एक कठिन क़ानूनी लड़ाई के बाद भी, जिसके दौरान, उन्हें बार-बार उत्पीड़न और अपमान का सामना करना पड़ता है, न्याय हासिल कर पाना और अपराधियों को सज़ा दिलवाना, लगभग असंभव है।

महिलाओं के साथ जारी भेदभाव और उत्पीड़न का मूल कारण, प्रचलित आर्थिक व्यवस्था और मौजूदा राज्य की प्रकृति में निहित है।

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था, मेहनतकश बहुसंख्यकों के अधिकतम शोषण के ज़रिये एक अमीर अल्पसंख्यक के हाथों में निजी लाभ को अधिकतम करने के लिए बनाई जाती है। हिन्दोस्तान में पूंजीवाद, सामंती, जातिगत और लिंग आधारित भेदभाव और उत्पीड़न को क़ायम रखकर विकसित हुआ है। समाज में महिलाओं की अधीनस्थ स्थिति उनके अत्यधिक शोषण के माध्यम से पूंजीवादी मुनाफे़ को अधिकतम करने में मदद करती है।

मौजूदा हिन्दोस्तानी राज्य, पूंजीवादी व्यवस्था और पूंजीपति वर्ग की सत्ता की रक्षा और बचाव करता है। पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां और राज्य की सभी संस्थाएं, जिनमें कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका शामिल हैं, महिलाओं के उत्पीड़न और भेदभाव को जारी रखती हैं।

वक्त की मांग है कि महिलाओं और मेहनतकश लोग राजनीतिक सत्ता को अपने हाथों में लें, ताकि वे देश का एजेंडा निर्धारित कर सकें और अपने जीवन को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण निर्णय ले सकें। अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता लेकर, मेहनतकश लोग देश की आर्थिक व्यवस्था का पूंजीपतियों के लालच के बजाय लोगों की ज़रूरतों की पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए, उसका नव-निर्माण कर पायेंगे। वे महिलाओं के किसी भी अधिकार का उल्लंघन करने वालों को तुरंत और कड़ी सज़ा दे करके, महिलाओं की पूर्ण-मुक्ति के लिए संघर्ष को आगे बढ़ा सकते हैं।

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