मानव अधिकारों की सर्वव्यापी घोषणा की 75वीं वर्षगांठ :
मानव अधिकारों की गारंटी के लिए पूंजीवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्था को ख़त्म करना होगा

मानव अधिकारों की सर्वव्यापी घोषणा (यू.डी.एच.आर.) को 75 साल पहले, 10 दिसंबर, 1948 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा, 48 सदस्य देशों की मंजूरी के साथ, अपनाया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध, जिसमें 12 करोड़ से अधिक लोग मारे गए थे, की समाप्ति के तुरंत बाद इसे अपनाया गया था। वह ऐसा समय था जब दुनिया के लोग फासीवाद, साम्राज्यवादी युद्ध और उपनिवेशवादी गुलामी को पूरी तरह से ख़त्म करने के लिए तरस रहे थे।

आज, यू.डी.एच.आर. को अपनाने के 75 साल बाद, दुनिया के लोग, अमरीकी साम्राज्यवाद के पूर्ण राजनीतिक और सैन्य समर्थन के साथ, इज़रायल द्वारा गाज़ा और वेस्ट बैंक में फ़िलिस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ किए जा रहे अमानवीय जनसंहार के गवाह हैं। लगभग दो महीनों में, महिलाओं, बच्चों, डॉक्टरों, राहतकर्मियों और मीडिया कर्मियों सहित लगभग 20,000 लोगों की जान चली गई है, जबकि कई हज़ार लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। अस्पतालों, आवासीय भवनों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के पूरी तरह से नष्ट हो जाने के कारण, वहां के पीड़ित लोग, शरणार्थियों के रूप में, एक ऐसे नरक में कैद हैं, जहां न तो कोई भोजन, पानी या चिकित्सा के साधन हैं और न ही लगातार बमबारी से बचने के लिए कोई जगह बाकी है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद में सदस्य देशों द्वारा, इस जनसंहारक युद्ध को रोकने और फ़िलिस्तीनी लोगों के अधिकारों की बहाली की मांग करने वाले, रखे गए हर प्रस्ताव पर अमरीका और उसके पश्चिमी साम्राज्यवादी सहयोगियों ने सुनियोजित तरीक़े से उसके ख़िलाफ़ वोट डाला है।

अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और अन्य देशों सहित, दुनिया भर में लाखों लोग, सड़कों पर उतरकर, बड़े-बड़े विरोध-प्रदर्शनों में, इस जनसंहार को खत्म करने और फ़िलिस्तीनी लोगों के अधिकारों की सुरक्षा करने की मांग कर रहे हैं। दुनिया भर के लोगों के गुस्से और विरोध के बावजूद, अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके सहयोगी, इज़रायल के विस्तारवादी मंसूबों और फ़िलीस्तीनी लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों को इनकार करने के इज़रायल के इरादों को उचित ठहराते हुए और उनको पूर्ण समर्थन देते हुए, मानव अधिकारों के इस सबसे बर्बर और जबरदस्त उल्लंघन का समर्थन करते जा रहे हैं।

मानव अधिकारों का उल्लंघन – एक अपवाद नहीं, बल्कि एक सामान्य नियम

जब मानव अधिकारों की सर्वव्यापी घोषणा को अपनाया गया था, तो घोषणा पर हस्ताक्षर करने वाले ब्रिटेन, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमरीका के साम्राज्यवादी राज्य एक कहानी पेश करने की कोशिश कर रहे थे कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुए मानव अधिकारों का उल्लंघन एक अपवाद था। उन्होंने दावा किया कि चूंकि जर्मनी, इटली और जापान के फासीवादी समूह को हरा दिया गया है, इसलिए कोई फिर से मानव अधिकारों का उल्लंघन करने की जुर्रत नहीं करेगा। परन्तु, पिछले 75 वर्षों के जीवन के अनुभव ने इस हक़ीक़त को बार-बार सामने लाया है कि मानव अधिकारों का उल्लंघन कोई अपवाद नहीं था। ऐसा दावा करने वाली शक्तियों द्वारा ही बार-बार मानव अधिकारों का उल्लंघन किया गया है।

अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके सहयोगियों ने एक के बाद एक, हमलावर युद्ध छेड़े हैं, कई राष्ट्रों पर क़ब्ज़ा किया है और उन्हें तबाह किया है तथा कई स्वतन्त्र देशों में शासन-परिवर्तन को अंजाम दिया है। उन्होंने “लोकतंत्र और मानव अधिकारों” को क़ायम रखने के नाम पर अफ़गानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया और अनेक अन्य देशों की संप्रभुता का खुलेआम उल्लंघन किया है। लाखों लोगों को शरणार्थी बना दिया गया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इस समय दुनिया में, 11.4 करोड़ से भी अधिक लोग विस्थापित शरणार्थियों के रूप में जबरन बेघर किये गए हैं। 3.5 करोड़ से अधिक शरणार्थी अपने देश से भागकर दूसरे देशों में शरण लेने को मजबूर हैं।

विभिन्न देशों की भूमि, श्रम और क़ीमती खनिज संसाधनों की साम्राज्यवादी लूट, इन देशों में गृह-युद्धों को आयोजित किया जाना, साथ ही इन देशों पर क़ब्ज़ा करने के उद्देश्य से किये गए युद्ध – ये सब इन दर्दनाक हालातों के लिए ज़िम्मेदार हैं। लेकिन, अमरीका, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में शरण लेने के इच्छुक लोगों के साथ बेहद अमानवीय व्यवहार किया जाता है। अमरीका-मैक्सिको सीमा पर, अमरीका में शरण की मांग वाले लोगों पर क्रूर हमला किया जाता है और उन्हें जानवरों की तरह पिंजरे में बंद कर दिया जाता है। ब्रिटिश सरकार इस समय, ब्रिटेन में शरण लेने के इच्छुक लोगों को, पूर्वी अफ्रीका के रवांडा देश में निर्वासित करने के लिए, एक क़ानून पर विचार कर रही है। रवांडा उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद द्वारा तबाह किया गया, एक छोटा ग़रीब देश है।

यूरोप और उत्तरी अमरीका के तथाकथित लोकतांत्रिक देशों में, वहां के शासक, प्रवासियों और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़, सुनियोजित तरीक़े से नस्लवादी और फासीवादी हमले आयोजित करते हैं। राज्य की आलोचना करने वाले और अपने अधिकारों की मांग करने का साहस करने वाले लोगों को फासीवादी क़ानूनों के तहत जेल में कैद किया जाता है। उन देशों में बेरोज़गारी, ग़रीबी और बेघर लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इस से उस झूठ का लगातार पर्दाफ़ाश हो रहा है कि उन तथाकथित उन्नत समाजों के सभी सदस्यों को इंसान लायक जीवन जीने का अवसर मिलता है।

हिन्दोस्तान भी मानव अधिकारों की सर्वव्यापी घोषणा का एक हस्ताक्षरकर्ता है। लेकिन, हिन्दोस्तानी राज्य करोड़ों मेहनतकश लोगों के सुरक्षित रोज़गार तथा इज्ज़तदार इंसानी जीवन जीने लायक वेतन के अधिकार की हिफ़ाज़त नहीं करता है। हिन्दोस्तानी राज्य लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और पर्याप्त पोषण के अधिकार की गारंटी नहीं देता है। हिन्दोस्तानी राज्य धर्म, जाति व लिंग के आधार पर भेदभाव और हिंसा से लोगों को नहीं बचाता है। हिन्दोस्तानी राज्य लोगों के ज़मीर के अधिकार और यहां तक कि उनके जीने के अधिकार की भी हिफ़ाज़त नहीं करता है।

मानव अधिकारों को हासिल करने के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाएं

समाज में जन्म लेने वाले सभी इंसानों को इस समाज का सदस्य होने के नाते, कुछ मूलभूत अधिकार प्राप्त हैं। समाज की प्रगति के स्तर के अनुसार, मानव अधिकारों की परिभाषा लगातार विकसित और उन्नत होती रही है। पर्याप्त और पौष्टिक भोजन, कपड़े और आवास के अलावा, इनमें सुरक्षित रोज़गार का अधिकार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के अधिकार और इस दिन व युग में इज़्ज़तदार इंसानी जीवन जीने लायक वेतन पाने के अधिकार भी शामिल हैं।

हमारे देश और दुनियाभर में, उत्पादक शक्तियों के अपार विकास की वजह से, समाज के हर सदस्य को मानव अधिकारों की गारंटी देने की हालतें पैदा हो गयी हैं। इस सम्भावना को हक़ीक़त में बदलने के रास्ते में रोड़ा है वर्तमान आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था। मानव अधिकारों को सुनिश्चित करना, पूंजीवादी शोषण और साम्राज्यवादी लूट के चलते मुमकिन नहीं है। आज दुनिया में मानव अधिकारों को हक़ीक़त में सुनिश्चित करने के लिए, अमरीकी साम्राज्यवाद और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों को अपनी लूट- खसोट को बढ़ावा देने के लिए अन्य देशों पर हमला करने और उन पर अपनी आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था को थोपने के “अधिकार” से वंचित करना होगा। प्रत्येक देश के लोगों को साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और हमलावर युद्धों से मुक्त होकर, अपनी पसंद की आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को स्थापित करने का अधिकार होना चाहिए।

मानव अधिकारों को हक़ीक़त में सुनिश्चित करने के लिए, इजारेदार पूंजीपतियों को मज़दूर वर्ग, किसानों और अन्य मेहनतकश लोगों के शोषण और हमारे प्राकृतिक संसाधनों की लूट के ज़रिये अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाने के ”अधिकार“ से वंचित करना होगा।

पूंजीवादी शोषण को ख़त्म करके और देश के विशाल संसाधनों को मेहनतकश लोगों के हाथों में लाकर ही, समाज अपने सभी सदस्यों की मांगों को पूरा कर सकता है। केवल ऐसे समाज में ही मानव अधिकारों की आधुनिक परिभाषा की पुष्टि की जा सकती है, जो अधिकार समाज के सभी सदस्यों के लिए सर्वव्यापी हों और जिनका उल्लंघन किसी भी बहाने या किसी भी हालत में न हो सके।

आइए, हम प्रत्येक देश में और विश्व स्तर पर, पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को आधुनिक समाजवादी व्यवस्था में बदलने के दृष्टिकोण के साथ, समाज के हर सदस्य के मानव अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाएं।

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