अनौपचारिक मज़दूरों के अधिकारों के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण क़दम

मज़दूर एकता लहर के संवाददाता की रिपोर्ट

अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूरों के लिए एक व्यापक क़ानून बनाने पर काम करने वाले एक समूह (वर्किंग ग्रुप) ने 30 सितंबर और 1 अक्तूबर को नई दिल्ली में परामर्श व योजना के लिये एक मीटिंग आयोजित की। यह मीटिंग देश के विभिन्न भागों में आयोजित की जाने वाली ऐसी तीन मीटिंगों में से दूसरी है। पहली परामर्श व योजना मीटिंग 2-3 सितंबर को बेंगलुरू में हुई थी और तीसरी 14-15 अक्तूबर को मुंबई में होगी।

इस मीटिंग में ट्रेड यूनियनों और अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। मीटिंग में मज़दूर एकता कमेटी (एम.ई.सी.) के कार्यकर्ताओं ने भाग लिया।

परामर्श व योजना मीटिंग का उद्देश्य था अनौपचारिक मज़दूर संगठनों के प्रतिनिधियों के बीच अनौपचारिक क्षेत्र के मज़दूरों के लिए प्रस्तावित सामान्य क़ानूनी ढांचे और क्षेत्रीय क़ानूनों पर चर्चा करना। इन क़ाननों पर, इस बात को ध्यान में रखते हुए चर्चा की गई कि प्रस्तावित क़ानून का उद्देश्य – अनौपचारिक कार्यों में आई.एल.ओ. के मुख्य श्रम मानकों को सुनिश्चित करना होना चाहिए; विभिन्न प्रकार के अनौपचारिक कार्यों के लिये काम करने की उचित परिस्थितियों की गारंटी देना; पर्याप्त व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रदान करना; इन बुनियादी मांगों को लेकर विभिन्न अनौपचारिक क्षेत्रों में मज़दूरों की एकता को मजबूत करना। मीटिंग में इन मांगों को हासिल करने के लिए, एक राष्ट्रव्यापी अभियान आयोजित करने की योजना पेश की गई।

उद्घाटन सत्र में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि पी.एल.एफ.एस. (आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण) के आंकड़ों के अनुसार, असंगठित क्षेत्र के 98.18 प्रतिशत मज़दूर और संगठित क्षेत्र के 46.70 प्रतिशत मज़दूर बिना किसी औपचारिक कार्य अनुबंध के अनौपचारिक मज़दूर हैं। अनौपचारिक मज़दूरों में एक बड़ा हिस्सा महिलाएं हैं और अनौपचारिक काम सकल घरेलू उत्पाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन इन मज़दूरों को बुनियादी श्रम सुरक्षा के दायरे से लगातार बाहर रखा गया है, जिसमें सामूहिक रूप से सौदेबाजी का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और कामकाजी परिस्थितियों का विनियमन शामिल है। निर्माण, बीड़ी और नमक उद्योगों के मज़दूरों ने लंबे संघर्ष के ज़रिये कुछ क़ानूनी सुरक्षा और अधिकार हासिल कर लिए हैं, लेकिन अनौपचारिक मज़दूरों के कई अन्य तबकों के अधिकारों की अभी भी कोई क़ानूनी मान्यता या सुरक्षा नहीं है।

भाग लेने वाले संगठनों के प्रतिनिधियों ने बताया कि हिन्दोस्तान की सरकार द्वारा तैयार किये गये, चार लेबर कोड ने न केवल अनौपचारिक मज़दूरों के विभिन्न तबकों के लिए कई मौजूदा क़ानूनों को ख़त्म कर दिया है, बल्कि अधिकांश अनौपचारिक मज़दूरों को भी इसके दायरे से बाहर कर दिया है। इन चार लेबर कोड ने मज़दूरों के उन अधिकारों को भी छीन लिया है, जिन्हें उन्होंने कठिन संघर्ष करके हासिल किया था।

मीटिंग में आये भागीदारों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि संगठित और असंगठित क्षेत्रों के मज़दूरों द्वारा जीते गए अधिकारों की बहाली की मांग करते हुए, सभी प्रकार के अनौपचारिक मज़दूरों के लिए एक व्यापक क़ानून के लिए अभियान चलाने की तत्काल आवश्यकता है।

अनौपचारिक मज़दूरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रस्तावित क़ानून का एक मसौदा चर्चा के लिए पेश किया गया। मसौदे में उठाई गई मांगें थीं – हर जिले में अनौपचारिक मज़दूरों के पंजीकरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए एक क़ानूनी ढांचा हो; अनौपचारिक मजदूरों की ट्रेड यूनियनों का गठन हो और उन्हें आधिकारिक मान्यता हो; मज़दूरों और नियोक्ताओं के बीच सामूहिक रूप से सौदेबाजी और विवादों का समाधान हो; प्रत्येक जिले और राज्य में लेबर काउंसिलें हों; सामाजिक सुरक्षा; कामकाजी परिस्थितियों का विनियमन; व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा, आदि।

विभिन्न सहभागी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने अपने-अपने कार्यक्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं पर प्रकाश डाला तथा क़ानून को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए बहुमूल्य सुझाव दिए। विशेष रूप से कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और हिंसा से सुरक्षा के साथ-साथ सभी क्षेत्रों में महिला मज़दूरों के लिए क्रेच की सुविधाओं के प्रावधान का मुद्दा उठाया गया और इन्हें मसौदा क़ानून में शामिल करने की मांग की गई। सरकारी क्षेत्र के संविदा कर्मियों और आशा, आंगनवाड़ी और अन्य सरकारी योजनाओं में काम करने वाले मज़दूरों सहित उनके अधिकारों के लिए लड़ने की आवश्यकता पर भी चर्चा की गई।

अनौपचारिक मज़दूरों के मुख्य तबके जिनकी समस्याओं को मीटिंग में चर्चा के लिए उठाया गया उनमें शामिल हैं – (1) कृषि मज़दूर, (2) घरों में काम करने वाले मज़दूर (3) वन मज़दूर, (4) मछली पालन मज़दूर, (5) निर्माण-ईंट भट्ठा व पत्थर खदान मज़दूर, (6) मिट्टी के बर्तन बनाने वाले मज़दूर, (7) हथकरघा तथा बिजली के करघे चालाने वाले मज़दूर, (8) घरेलू कामगार, (9) हेयरड्रेसर और धोबी जैसे काम करने वाले, (10) प्रवासी मज़दूर (11) बंधुआ मज़दूर (12) सफाई मज़दूर (13) कूड़ा बीनने वाले (14) सूक्ष्म, लघु और मध्यम स्तर के उद्यमों में काम करने वाले मज़दूर (15) बाज़ारों में सामान ढोने वाले मज़दूर (16) ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालक (17) फेरीवाले व दुकानदार और (18) गिग तथा प्लेटफार्म मज़दूर। इन विभिन्न क्षेत्रों के मज़दूरों की प्रमुख मांगों पर अलग-अलग समूहों में चर्चा की गई कि इन मज़दूरों को नए क़ानून में कैसे शामिल किया जा सकता है, इसके लिए प्रस्ताव दिए गए।

व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा पर आयोजित एक विशेष सत्र में, तमिलनाडु में अनौपचारिक मज़दूरों के संगठनों के संघर्ष के अनुभव और उनकी उपलब्धियों को साझा किया गया। सामाजिक सुरक्षा पर किये गये एक अन्य सत्र में तमिलनाडु और केरल के मज़दूरों के अनुभव साझा किये गये।

मीटिंग इस संकल्प के साथ समाप्त हुई कि उठाए गए प्रस्तावों पर वर्किंग ग्रुप द्वारा विचार किया जाएगा और मसौदा क़ानून में शामिल किया जाएगा।

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