हवाना में जी-77 का शिखर सम्मेलन :
वर्तमान विश्व-व्यवस्था में निहित अन्यायों को 134 देशों की मीटिंग ने उजागर किया

15-16 सितंबर को “ग्रुप-77” (जी-77) से जुड़े 134 देशों के प्रतिनिधि मंडल क्यूबा की राजधानी हवाना में मिले। 1964 में 77 सदस्य देशों ने साथ मिलकर, जी-77 का गठन किया था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसकी सदस्यता बढ़ती गई है और अब 134 देश इसके सदस्य बन गये हैं। वे दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी और संयुक्त राष्ट्र संघ के दो-तिहाई सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का सबसे बड़ा हिस्सा भी उन्हीं के पास है।

सबसे बड़ी पूंजीवादी और साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रभुत्व में और उनके द्वारा खुद के साम्राज्यवादी एजेंडे को दुनिया पर थोपने वाली व्यवस्था में, जी-77 के गठन के पीछे एक विचार यह भी था कि – इसके ज़रिये “अन्य देशों की आवाज़ सुनिश्चित करना, अपने सामूहिक आर्थिक हितों को स्पष्ट रूप से पेश करना तथा उनको बढ़ावा देना और उनकी सामूहिक, सबके द्वारा मिलकर बातचीत के द्वारा समझौता करने की क्षमता को बढ़ाना” संभव हो सकता है।

हालांकि चीन जी-77 का सदस्य नहीं है, लेकिन उसने जी-77 समूह के फ़ैसलो तथा उनकी गतिविधियों का समर्थन किया है। चीन ने उसके सम्मेलनों में भी “जी-77 तथा चीन” के एक हिस्से के रूप में भाग लिया है।

नई दिल्ली में हुये जी-20 के शिखर सम्मेलन के ठीक एक सप्ताह बाद, हवाना में जी-77 की मीटिंग आयोजित की गई थी। इस वर्ष जी-77 के अध्यक्ष के रूप में क्यूबा ने शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी। सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली देशों द्वारा दुनिया पर उनके प्रभुत्व का जिक्र करते हुए, क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कैनेल ने उद्घाटन सत्र के दौरान कहा कि : “इतने समय के बाद जब उत्तर (नार्थ) ने दुनिया को अपने हितों के अनुसार संगठित किया है, अब ज़रूरत है कि दक्षिण (साउथ) के देश इस खेल के नियम बदलें।”

हवाना में हुये इस शिखर सम्मेलन में 30 से अधिक देशों और राज्यों के प्रमुखों ने भाग लिया। हालांकि इस सम्मेलन में न तो हिन्दोस्तान के प्रधानमंत्री ने और न ही किसी अन्य मंत्री ने इसमें हिस्सा लिया। हिन्दोस्तानी सरकार ने विदेश मंत्रालय से केवल एक जूनियर अधिकारी को भेजने का फ़ैसला किया था। वर्तमान सरकार द्वारा खुद को “ग्लोबल साउथ की आवाज़” बुलंद करने वाले के रूप में स्थापित करने के दावों के बावजूद, यह फ़ैसला लिया गया था। इस हक़ीक़त की जानकारी होने के बावजूद भी कि जी-77 विकासशील देशों का सबसे बड़ा समूह है, सामूहिक रूप से जिसे ग्लोबल साउथ कहा जाता है।

इस वर्ष के सम्मेलन का विषय था – “दुनिया के अधिकांश देशों के सामने आने वाली वर्तमान विकास की चुनौतियों में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नयी खोज एवं नवाचार की भूमिका”। इसमें क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिग्स ने कहा कि : “वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण खाई और असमानताओं में से एक, इस हक़ीक़त पर भी ग़ौर करने की ज़रूरत है कि ज्ञान और विज्ञान विकसित करने और विज्ञान और प्रौद्योगिकी की पहुंच की प्रक्रियाओं से, ग्लोबल साउथ के देशों को बाहर रखा गया है।”

शिखर सम्मेलन के अंत में अपनाये गये हवाना-घोषणापत्र में मांग की गई कि “जिन राज्यों का इंटरनेट सहित, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर प्रधानता और प्रभुत्व है, उन्हें सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी में लगातार होने वाली प्रगति का इस्तेमाल, अन्य राज्यों के वैध-आर्थिक और तकनीकी विकास के ऊपर नियंत्रण और दमन के लिए एक हथियार के रूप में नहीं करना चाहिए।”

इस घोषणापत्र ने “नए वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान को पैदा करने की हालतों, संभावनाओं और क्षमताओं के संदर्भ में विकसित और विकासशील देशों के बीच मौजूदा असमानताओं” की ओर ध्यान आकर्षित किया और तकनीकी रूप से उन्नत शक्तियों से “विकासशील देशों की ज़रूरतों, उनकी राष्ट्रीय आवश्यकताओं, नीतियों और प्राथमिकताओं के अनुसार उनको तत्काल प्रौद्योगिकी हस्तांतरण; अतिरिक्त एवं पूर्वानुमानित तथा नए संसाधनों के ज़रिये तकनीकी सहायता, क्षमता-निर्माण और वित्तपोषण जैसी प्रक्रियाओं के साधन जुटाने” का आह्वान भी किया।

अन्य मुद्दों के अलावा, जी-77 की बैठक में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में सुधार और “वैश्विक वित्तीय प्रशासन के लिए अधिक समावेशी और समन्वित दृष्टिकोण” का आह्वान भी किया गया।

इस वर्ष एक और महत्वपूर्ण मुद्दा भी उठाया गया – जी-77 में प्रतिनिधित्व करने वाले देशों ने ऐसे अन्य देशों पर एकतरफ़ा आर्थिक प्रतिबंध लगाने पर अपना गुस्सा व्यक्त किया, जो अमरीका और अन्य बड़ी ताक़तों की इच्छाओं के अनुसार नहीं चलते। बैठक में स्पष्ट रूप से घोषणा की गई कि : “हम विकासशील देशों के ख़िलाफ़, एकतरफ़ा प्रतिबंधों सहित बाह्य-क्षेत्रीय प्रभाव वाले क़ानूनों एवं विनियमों और अन्य सभी प्रकार के जबरदस्ती थोपे जाने वाले आर्थिक प्रतिबंधों को अस्वीकार करते हैं और उन्हें ख़त्म करने की तत्काल आवश्यकता को दोहराते हैं।”

यह महत्वपूर्ण है कि यह संदेश क्यूबा से दिया गया है, जो 1962 से लगातार अमरीका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का सामना करता आ रहा है और उसको इन प्रतिबंधों के ज़रिये काफ़ी तबाह किया गया है।

जी-77 का हवाना शिखर सम्मेलन, अमरीकी साम्राज्यवाद और अन्य बड़ी शक्तियों द्वारा अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करके स्थापित और क़ायम की गई अन्यायपूर्ण और असमान विश्व व्यवस्था के प्रति दुनिया के अधिकांश देशों के बढ़ते असंतोष का प्रतिबिंब है। दुनिया के लोगों के बीच यह चेतना बढ़ रही है कि वर्तमान विश्व व्यवस्था के नियम और संस्थाएं, अमीर और शक्तिशाली लोगों के हितों की सेवा करती हैं और अधिकांश लोगों के हितों और प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए, उन्हें तुरंत बदलने की आवश्यकता है।

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