टमाटर की फ़सल पर एम.एस.पी. न होने का परिणाम :
किसानों को अपनी फ़सल को नष्ट करने के लिए मजबूर होना पड़ा

यह एक विडंबना ही है कि जब उत्पादकों को अपनी फ़सल नष्ट करनी पड़ती है क्योंकि उन्हें अपनी फ़सल की लागत को हासिल करने के लिए क़ीमतें नहीं मिल पाती हैं। आज महाराष्ट्र के टमाटर उत्पादकों को इसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

Ababdoned_tomatoesपिंपलगांव, नासिक और लासलगांव के थोक बाज़ारों में टमाटर की क़ीमतें जुलाई में 2,000-3,200 रुपये प्रति क्रेट (20 किलोग्राम) से गिरकर सितंबर में 90 रुपये प्रति क्रेट हो गई हैं। राज्य के कई जिलों में थोक क़ीमतों में इतनी भारी गिरावट के कारण टमाटर की खेती करने वाले लाखों किसानों के पास अपने खेतों में ट्रैक्टर चलाने या अपने बागानों को छोड़ने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है।

किसानों के मुताबिक, टमाटर की खेती करने के लिए एक किसान को पौधे, खाद और मज़दूरी पर प्रति एकड़ कम से कम एक लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं। फ़सल को निकटतम मंडी तक ले जाने के लिए उसे 10,000 रुपये से 12,000 रुपये और खर्च करने पड़ते हैं। सितंबर के महीने में महाराष्ट्र के किसी भी थोक बाज़ार में उन्हें अपनी उपज की क़ीमत 70,000 से 80,000 रुपये से अधिक नहीं मिल पा रही थी। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि किसानों ने फ़सल को बाज़ार तक ले जाने और मंडी में आगे का खर्च उठाने के बजाय अपनी उपज को खुद ही नष्ट कर दिया।

बताया जा रहा है कि टमाटर के लिए एम.एस.पी. तय करने की मांग को लेकर राज्यभर के किसानों के एक समूह ने सितंबर के आखि़री सप्ताह में मुंबई में विरोध प्रदर्शन करने की योजना बनाई थी। सभी फ़सलों के लिये एम.एस.पी. की मांग लंबे समय से चली आ रही मांग है, जिसे नज़र-अंदाज़ कर दिया गया है। एक के बाद एक सरकारों के तहत कृषि मंत्रालय ने सब्ज़ियों और फलों के लिए कोल्ड स्टोरेज के बारे में अनाप-शनाप बातें की हैं। ऐसा क्यों है कि टमाटर की खेती करने वाले किसानों को इतना आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं कराया गया है?

यह देश के लाखों किसानों की आजीविका और भलाई की आपराधिक उपेक्षा के अलावा और कुछ नहीं है। मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था कृषि व्यवसाय, बड़े थोक व्यापारियों और व्यापारिक कंपनियों और कृषि के लिए बीज, उर्वरक, कीटनाशक तथा अन्य लागत वस्तुएं बनाने वाले पूंजीपतियों के हितों की सेवा करती है। कृषि नीति उनके मुनाफ़े को सुनिश्चित करने पर केंद्रित है, जबकि मेहनतकश किसान और खेतिहर मज़दूर अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए लड़ रहे हैं। उनके श्रम की उपज बेतहाशा नष्ट हो रही है, जबकि लाखों मेहनतकश लोगों को महंगाई के कारण अपने भोजन में कटौती करनी पड़ती है।

Share and Enjoy !

Shares

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *