जे.एन.यू. में ठेका मज़दूरों ने ”सम्मान रैली“ निकाली

मज़दूर एकता कमेटी के संवाददाता की रिपोर्ट

नई दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जे.एन.यू.) के ठेका मज़दूरों के अधिकारों का क्रूरता से उल्लंघन हो रहा है। जैसे कि वेतन भुगतान में देरी, जाति के आधार भेदभाव सहित विभिन्न प्रकार के भेदभाव और नौकरी से निकाले जाने का लगातार ख़तरा।

18 सितंबर को इन्हीं समस्याओं के समाधान के लिए जे.एन.यू. में ठेका मज़दूरों ने ”सम्मान रैली“ आयोजित की। मज़दूरों ने समय पर वेतन न मिलने की समस्या उठाई, जिस कारण उनके परिवारों के दैनिक ख़र्चों को पूरा करना मुश्किल हो गया है। सफ़ाई मज़दूरों ने ठेकेदारों और जे.एन.यू. अधिकारियों पर आरोप लगाया कि वे जाति के आधार पर भेदभाव करते हैं। उन्होंने सुरक्षात्मक सामग्री उपलब्ध न कराये जाने की बात उठाई। सफ़ाई मज़दूरों के लिए सुरक्षात्मक सामग्रियों के न होने के कारण उनके स्वास्थ्य के लिये जोखि़म पैदा हो गया है। मज़दूरों ने कहा कि हमने कई बार मौखिक और लिखित शिक़ायतें दी हैं, लेकिन विभाग ने इस मुद्दे को हल नहीं किया है।

मज़दूरों ने बताया कि उन्हें बेहद कम वेतन मिलता है। मज़दूरों को आम तौर पर, मैस में दो दशकों तक काम करने बाद, आज भी केवल 15,000 रुपये ही वेतन मिल रहा है।

आंदोलन को अगुवाई देने वाले मज़दूरों को नौकरी से निकाले जाने का डर बना रहता है। उनका कहना है कि समय पर वेतन नहीं मिलता है और समान काम के लिए समान वेतन भी नहीं दिया जाता है। इन अधिकारों की मांग करने पर हमारे ऊपर नौकरी से निकले जाने का ख़तरा मंडराता रहता है। यदि किसी मज़दूर की नौकरी छूट जाती है तो बाद में उसे ठेकेदार को उसी तरह की नौकरी, उतने ही वेतन और उसी प्रकार की असुरक्षित नौकरी पाने के लिए 40,000-50,000 रुपये देने पड़ते हैं।

सन 2000 से केंद्र सरकार के इस प्रसिद्ध विश्वविद्यालय प्रबंधन ने मज़दूरों को ठेके पर रखना शुरू किया था। मैस, सफ़ाई, सुरक्षा और प्रशासन में अधिकांश कर्मचारी ठेके पर काम करते हैं। उनको गंभीर शोषण, आजीविका की असुरक्षा तथा ख़तरनाक और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है।

प्रदर्शनकारी कर्मचारी मांग कर रहे हैं कि जे.एन.यू. प्रबंधन उन्हें स्थायी श्रमिकों के रूप में मान्यता दे और वैधानिक वेतन के साथ-साथ, उन्हें मिलने वाले अन्य सभी लाभ भी दे।

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