ओडिशा में रेलगाड़ी की भयानक टक्कर की सी.बी.आई. जांच :
सरकार की ज़िम्मेदारी पर पर्दा डालने की कोशिश

पिछले बीस वर्षों में सबसे बड़ी रेल दुर्घटना के बाद, हिन्दोस्तान की सरकार ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सी.बी.आई.) को यह जांच करने का आदेश दिया है कि क्या यह दुर्घटना किसी सोची-समझी साज़िश का नतीजा थी।

दुर्घटना के एक दिन बाद, 3 जून को रेल मंत्री ने घोषणा की कि वह जानते हैं कि इस हादसे के लिए कौन ज़िम्मेदार है। उन्होंने इस ओर इशारा किया कि दुर्घटना एक मानव निर्मित आपदा थी, संभवतः जानबूझकर नुक़सान पहुंचाने का एक कार्य।

एक साज़िश की तरह इसकी जांच करने का काम सी.बी.आई. को सौंपने का एकमात्र उद्देश्य है कि अधिकारियों द्वारा रेल सुरक्षा की आपराधिक उपेक्षा से जनता का ध्यान हटाया जा सके।

रेल मज़दूरों की यूनियनों के साथ-साथ, कई अधिकारियों ने बार-बार इस ओर इशारा किया है कि रेल सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हिन्दोस्तान के महालेखा परीक्षक की पिछले साल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि रेलवे के बुनियादी रखरखाव पर होने वाला खर्च 2017 से कम हो गया है, जिससे सुरक्षा में गंभीर चूक हुई है। 2012 में रेलवे सुरक्षा पर काकोदकर कमेटी ने बताया था कि रेलवे की सुरक्षा में सुधार के लिए अगले कुछ वर्षों में कम से कम 1 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की ज़रूरत है। लेकिन उस कमेटी की सिफा़रिश को नज़रंदाज़ कर दिया गया।

टक्करों से सुरक्षा के लिए तंत्र मौजूद नहीं हैं

रेल मंत्रालय विज्ञापन देता रहा है कि वह दो रेलगाड़ियों के बीच की टक्कर को रोकने के लिए रेलगाड़ियों में ‘कवच’ नामक एक टक्कर रोधी प्रणाली स्थापित कर रहा है। हालांकि, देश की 97 फीसदी रेलगाड़ियों में अभी इसे लागू किया जाना बाकी है। हादसे का शिकार हुईं उन सुपरफास्ट रेलगाड़ियों में यह सिस्टम नहीं था।

सिग्नल प्रणाली की ख़राबी कई वर्षों से रेलवे के लिए एक गंभीर मुद्दा रहा है। रेल चालाकों की यूनियनों ने ख़राब सिग्नल के मुद्दे पर अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया है। समस्या का पैमाना इस तथ्य से स्पष्ट होता कि एक वर्ष में 51,238 बार सिग्नल फेल होने की सूचना मिली है!

भारतीय रेल में ब्लॉक प्रूविंग एक्सल काउंटर सिस्टम है। यह प्रणाली इसलिए है कि उस सेक्शन पर दूसरी रेलगाड़ी को अनुमति देने से पहले यह सुनिश्चित कर लिया जाये कि वह पटरी खाली है। इसका उद्देश्य है मानवीय ग़लतियों को दूर करना और स्टेशनों के बीच रेलगाड़ियों की सुरक्षित आवाजाही को सुनिश्चित करना। भारतीय रेल विभिन्न निजी कंपनियां से इस प्रणाली को ख़रीद रहा है। हालांकि, ऐसी रिपोर्टें हैं कि आपूर्ति किए गए पुजे़र् ख़राब गुणवत्ता के हैं, जिसके कारण यह प्रणाली ख़राब हो गई है।

9 फरवरी, 2023 को दक्षिण पश्चिम रेलवे के प्रधान प्रमुख संचालन अधिकारी ने रेलवे के मुख्यालय को लिखा कि ख़राब सिग्नलिंग उपकरण के कारण मैसूर डिवीजन पर दो रेलगाड़ियों के बीच टक्कर होते-होते बच गई। ट्रेन चालक द्वारा समय पर की गई कार्रवाई से टक्कर टल गई, जिसने ग़लत ग्रीन सिग्नल देखकर रेलगाड़ी को रोक दिया। अधिकारी ने अपने पत्र में कहा कि ‘घटना इंगित करती है कि सिस्टम में गंभीर खामियां हैं … यह इंटरलॉकिंग के मुख्य काम और बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन करती है।’ सिग्नल पर रेलगाड़ी के चलने के बाद, पैनल पर ट्रैक के सही दिखने के साथ, डिस्पैच का ट्रैक बदल जाता है। इसका मतलब है कि रेल चालक को लगता है कि वह सही पटरी पर जा रहा है, लेकिन असल में पटरी को बदलकर ग़लत पटरी कर दिया गया है।

9 फरवरी के उनके पत्र में यह भी कहा गया है कि “वर्तमान घटना को बहुत गंभीरता से देखा जाना चाहिए और सिस्टम की ख़ामियों को दूर करने के लिए तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई करने की आवश्यकता है और साथ ही कर्मचारियों को काम में शॉर्टकट न लेने के प्रति संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है, जिस की वजह से बड़ी दुर्घटना हो सकती है।”

रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी की चार महीने से भी कम समय पहले की गई इस शिकायत पर रेल मंत्रालय ने कोई कार्रवाई नहीं की।

रखरखाव में लापरवाही

रेलवे की 15,000 किमी से ज्यादा पटरियों ख़राब हैं और इन्हें तत्काल मरम्मत और नवीनीकरण की आवश्यकता है। हर साल 4,500 किमी की रेल पटरियों के नवीनीकरण का काम बकी रह जाता है। हर साल लगभग 2,000 किलोमीटर का नवीनीकरण होता है। इस प्रकार, साल-दर-साल ख़राब पटरियों की कुल लंबाई बढ़ रही है।

रेल की पटरियों को इस्तेमाल अधिक से अधिक होता है जिसकी वजह से वे व्यस्त रहती हैं। इस वजह से नियमित रखरखाव के काम को करने के लिए उपलब्ध समय घट रहा है। मज़दूरों की कमी के कारण पटरियों के निरीक्षण में 30 प्रतिशत से 100 प्रतिशत की कमी है।

ऐसी ख़राब और ख़तरनाक पटरियों पर हर रोज़ और हर घंटे तेज़ गति से रेलगाड़ियां दौड़ रही हैं, जिससे हजारों यात्रियों और रेलकर्मियों का जीवन ख़तरे में है।

मालगाड़ियों में पटरियों के लिए तयशुदा भार से अधिक वजन होता है। इससे पटरियों में तेज़ी से टूट-फूट होती है। दूसरे देशों में जहां सुपरफास्ट रेलगाड़ियां चलाई जाती हैं, उनके लिए अलग नई पटरियां बिछाई जाती हैं। हमारे देश में रेल चालकों की यूनियनों की शिकायत है कि उन्हें सुपरफास्ट गाड़ियों को उसी पुरानी पटरी पर तयशुदा गति से अधिक गति से चलाना पड़ता है। इससे जान को ज्यादा ख़तरा है।

दिसंबर 2022 में संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले चार सालों में भारतीय रेल में रेलगाड़ियों के पटरी से उतरने के 1129 मामले हुए हैं! इनमें से अधिकांश गाड़ियों के पटरी से उतरने की ख़बर मीडिया में नहीं आती, क्योंकि इनमें मालगाड़ी शामिल होती हैं। हालांकि, इन मामलों में भी संबंधित रेलकर्मी ही मारे जाते हैं या घायल होते हैं और सार्वजनिक संपत्ति का बेहिसाब नुकसान पहुंचता है।

कई रेलवे पुल जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं जिनका न तो ठीक से रखरखाव किया जाता है और न ही नवीनीकरण किया जाता है। इस तरह के पुलों के गिरने से पहले भी बड़े हादसे हो चुके हैं। रेल पुलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई भी कार्रवाई नहीं की गई है।

2019-2020 की कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा 1,14,000 करोड़ रुपये आवंटित करने की आवश्यकता है। सरकार ने ऐसा करने में लापरवाही की है।

अधिकांश सवारी गाड़ियों की हालत इतनी ख़राब है कि इन दिनों भी अन्य प्रकार के यातायात साधनों का खर्च उठा सकते हैं, वे भारतीय रेल का उपयोग नहीं करते है। इसके बावजूद रोज़ाना करीब 2 करोड़ लोग इन रेलगाड़ियों से सफ़र करते हैं। जिनमें से बहुत से दैनिक यात्री हैं। दिन-ब-दिन हालात बिगड़ते जा रहे हैं।

कोविड के बाद कई रेलगाड़ियों को या तो बंद कर दिया गया है या साधारण नॉन एसी, नॉन रिज़र्व बोगियों में भारी कटौती कर दी गई है। इसका परिणाम दिखता है कि भीड़भाड़ बढ़ गई है, यात्री दरवाज़ों के बाहर या दो बोगियों के बीच में लटककर यात्रा कर रहे हैं। हाल ही में ओडिशा में हुई दुर्घटना में अनारक्षित बोगियों में क्षमता से कहीं अधिक यात्री सवार थे। यही कारण है कि बड़ी संख्या में हुई मौतों और चोटों की रिपोर्टें आई हैं।

खाली पदों को भरे जाने से इंकार किये जाने से सुरक्षा प्रभावित हो रही है

रेलवे यूनियनों ने बताया है कि भारतीय रेल में 3,12,000 पद खाली हैं। इसमें सुरक्षा श्रेणी में लाखों खाली पद शामिल हैं। वहीं, रेलगाड़ियों की संख्या में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है। जिससे मौजूदा कर्मचारियों पर भारी दबाव पड़ रहा है। जिससे रेल चालकों और रेल गार्डों, स्टेशन मास्टरों, सिग्नलिंग इंजीनियरों के साथ-साथ पटरियों को रखरखाव करने वालों पर दबाव पड़ रहा है, जिन्हें भारतीय रेल की पटरियों की देखरेख करनी होती है।

रेल चालक और गार्ड को बिना आराम किए दिन में 14-16 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन और रेल कर्मचारियों की अन्य यूनियनों की लगातार मांगों के बावजूद रेल मंत्रालय ने पर्याप्त संख्या में रेल चालकों के भर्ती नहीं की है।

नियमों के मुताबिक एक रेल चालक को लगातार काम करने के लिए अधिकतम 12 घंटे की सीमा निर्धारित है। यह नियम अपने आप में अमानवीय है। यहां तक कि इन अमानवीय घंटों को नियमित रूप से बढ़ाया जा रहा है, जिससे रेल चालकों के स्वास्थ्य और रेलगाड़ियों में यात्रा करने वाले यात्रियों और अन्य रेल कर्मचारियों की सुरक्षा ख़तरे में पड़ रही है। रेलगाड़ियों में सफ़र करने वालों के लिए यह बेहद ख़तरनाक है। एक रेल चालक को हर किमी पर एक सिग्नल मिलता है, जो गति के हिसाब से हर एक या दो मिनट में एक सिग्नल होता है। उसे उसी हिसाब से ट्रेन को नियंत्रित करना होता है। रेलवे के कई ज़ोनों में रेल चालकों की कमी का हवाला देकर मौजूद रेल चालकों को निर्धारित ड्यूटी के घंटों से ज्यादा समय तक ड्यूटी पर रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। उदाहरण के लिए दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में रेल चालक औसतन 16 घंटे लगातार ड्यूटी कर रहे हैं!

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में हिन्दोस्तान में रेल दुर्घटनाओं में 2,60,000 लोग मारे गए हैं। 2020 में कोविड-19 के कारण लगाये गये लॉकडाउन के दौरान रेलगाड़ियों की चपेट में आकर मारे गये 8,700 लोग इसमें शामिल नहीं हैं।

बड़ी रेल दुर्घटनाओं की संख्या पिछले वर्ष के 35 की तुलना में 2022-2023 में बढ़कर 48 हो गई है। बड़ी रेल दुर्घटनाएं वे हैं जिनका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, जैसे जीवन की हानि, मानव चोट, संपत्ति की क्षति और रेल यातायात में रुकावट।

रेलगाड़ियों के सुरक्षित संचालन को सुनिश्चित करने में पटरियों का रखरखाव करने वाले (ट्रैक मेंटेनर) बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारतीय रेल में पटरियों का रखरखाव करने के लिए आवश्यक 4 लाख ट्रैक मेंटेनरों में से केवल दो लाख ही काम पर मौजूद हैं। वे अपनी जान जोखि़म में डालकर बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। इनमें से बहुत से ठेके पर हैं। रेल मंत्रालय ने आवश्यक संख्या में ट्रैक मेंटेनरों को काम पर रखने या काम करने की सुरक्षित स्थिति सुनिश्चित करने पर पैसा ख़र्च करने से इनकार किया है।

यह चौंकाने वाला है, लेकिन सच है कि हर दिन औसतन 2-3 ट्रैक मेंटेनर काम के दौरान मर जाते हैं, जिनकी संख्या हर साल सैकड़ों की में होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन पर काम का अधिक बोझ होता है और साथ-साथ स्टाफ की कमी होती है और उन्हें पर्याप्त सुरक्षा उपकरण भी उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं।

महत्वपूर्ण पुर्जां की आउटसोर्सिंग

भारतीय रेल के निजीकरण के अभियान के हिस्से के रूप में, रेल मंत्रालय निजी कंपनियों को महत्वपूर्ण पुर्जां की आपूर्ति को आउटसोर्स कर रहा है। इनमें कोचों और वैगनों के एक्सल शामिल हैं जो ट्रेनों के सुरक्षित संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं। निजी ऑपरेटरों द्वारा आपूर्ति किए गए एक्सल की गुणवता ख़राब होने के कई उदाहरण सामने आए हैं।

बी.पी.ए.सी. सिस्टम, जिसे मैसूर मामले में दोषपूर्ण पाया गया था, रेलवे को जिसकी आपूर्ति कई निजी कंपनियों द्वारा की जाती है।

निष्कर्ष

रेल कर्मचारियों की यूनियनों के साथ-साथ मज़दूर वर्ग के अन्य संगठन, बार-बार रेल यात्रा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तत्काल उपायों की आवश्यकता की ओर इशारा करते रहे हैं। लेकिन सरकारों ने लगातार इन ज़रूरतों को पूरा करने से इनकार किया है। बालासोर की त्रासदी इस आपराधिक उपेक्षा का एक परिणाम है।

रेल हादसों के लिए रेल कर्मचारियों को दोष देना सभी सरकारों की आदत रही है। इस तरह वे यात्रा करने वाली जनता को रेल कर्मचारियों के ख़िलाफ़ भड़काने की कोशिश करते हैं।

हाल ही में हुए दर्दनाक हादसे के पीछे संभावित साज़िश की जांच की बात करके सरकार समस्या की जड़ से जनता का ध्यान भटकाना चाहती है।

समस्या का मूल कारण यह है कि राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों सहित पूरी अर्थव्यवस्था पूंजीवादी मुनाफ़ों को अधिकतम करने के लिए तैयार है, लेकिन लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नहीं। निजीकरण, आउटसोर्सिंग और लाभ को ज्यादा से ज्यादा करने के परिणामस्वरूप भारतीय रेल कर्मचारियों की भारी कमी, रखरखाव और सुरक्षा उपायों की उपेक्षा से ग्रस्त है।

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