उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया में विस्तृत जन आन्दोलन

पूरी अरब दुनिया में, उत्तरी अफ्रीका में मोर्रोको से लेकर, एल्जीरिया, लिबिया, सूडान, यमन और बहरीन तक, लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर निकलकर अपनी जन-विरोधी सरकारों के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं। टयूनिशिया और मिस्र में जन बगावत, जिसकी वजह से बेन अली और हुस्नी मुबारक की अलोकप्रिय सरकारें गिरायी गयीं, उससे प्रोत्साहित होकर इन देशों में लोग संघर्ष कर रहे हैं। इस जन आन्दोलन को कुचलने के लिये बरबर दमन का

पूरी अरब दुनिया में, उत्तरी अफ्रीका में मोर्रोको से लेकर, एल्जीरिया, लिबिया, सूडान, यमन और बहरीन तक, लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर निकलकर अपनी जन-विरोधी सरकारों के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं। टयूनिशिया और मिस्र में जन बगावत, जिसकी वजह से बेन अली और हुस्नी मुबारक की अलोकप्रिय सरकारें गिरायी गयीं, उससे प्रोत्साहित होकर इन देशों में लोग संघर्ष कर रहे हैं। इस जन आन्दोलन को कुचलने के लिये बरबर दमन का प्रयोग किया जा रहा है, टैंकों से लोगों पर हमले किये जा रहे हैं, प्रदर्शनकारियों पर बम गिराये जा रहे हैं और सशस्त्र गुण्डों द्वारा हमले करवाये जा रहे हैं। परन्तु भयानक खून-खराबे के बावजूद, लोगों के प्रदर्शन जारी हैं। हाल में हुये प्रदर्शनों में भी लोगों ने अपनी तानाशाह सत्ताओं को हटाने, राजनीतिक दमन को खत्म करने और सत्ताधारियों द्वारा देश के संसाधनों की लूट को खत्म करने की मांग उठायी है।

टयूनिशिया और मिस्र की घटनायें कोई आकस्मिक घटनायें नहीं थीं। उस इलाके में जनसमुदाय के दिलों में छिपा गहरा असंतोष और क्रोध बग़ावत के रूप में फूट पड़ा।

इन लगभग सभी दशों में शासकों ने खुद को सत्ता में स्थापित कर लिया था और अपनी सत्ता का इस्तेमाल करके, जनता को लूटकर अपने परिवारों और चमचों की दौलत को खूब बढ़ाई थी। जनता के अधिकारों को नकारा गया और जन आन्दोलनों को बेरहमी से कुचल दिया गया। परन्तु जिन सत्ताओं ने सोचा था कि हमेशा ही ऐसा चलता रहेगा, वे पूरी तरह गलत साबित हुये हैं।

इस इलाके के अनेक देशों में बड़े-बड़े तेल के संसाधन हैं, मिसाल के तौर पर लिबिया में। परन्तु यहां की जनता के हित में तथा उनके भौतिक और सांस्कृतिक जीवन स्तर में उन्नति लाने के लिये इस धन का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसके बजाय, यहां की सरकारों ने विदेशी ताकतों की सांठगांठ में, खुद को व अपने समर्थकों और शक्तिशाली विदेशी इजारेदार तेल कंपनियों के मुनाफों को बढ़ाने के इरादे से, इन संसाधनों का भरपूर शोषण किया है।

विदेशी साम्राज्यवादी ताकतों ने तानाशाह हुकूमतों को सत्ता में बिठाकर इन देशों पर नियंत्रण करने की पूरी कोशिश इसलिये की है क्योंकि यहां तेल संसाधन तो है ही, इसके अलावा इन देशों का अत्यन्त रणनैतिक स्थान भी है। मिस्र में मुबारक सरकार को अमरीका से कई अरब डालरों की सैनिक और दूसरी सहायता मिलती रही है हालांकि वहां ज्यादा तेल संसाधन नहीं हैं, क्योंकि फिलिस्तीनी लोगों के संघर्ष को कुचलने और इस्राइल के जाउनवादी राज्य का समर्थन करने की अमरीकी साम्राज्यवादियों की रणनीति में मिस्र की अहम भूमिका थी। यमन के शासकों को भी अमरीकी साम्राज्यवादियों का पूरा समर्थन हमेशा मिलता रहा है क्योंकि वह देश अमरीकी नौसेना की पांचवी टुकड़ी (फिफ्त फ्लीट) का अव है, जो फारस की खाड़ी में घूमती रहती है और आसपास के देशों को धमकाती रहती है। कतर के बारे में भी यह सच है। यानि, कई सत्तायें जिन्हें आज अपनी जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है, वे इतने समय तक इसलिये बनी रह सकीं, क्योंकि इन्हें विदेशी साम्राज्यवादी ताकतों का समर्थन प्राप्त था।

अपने बहादुर संघर्षों के जरिये टयूनिशिया, मिस्र, यमन, बहरीन, लिबिया और आस-पास के देशों के लोगों ने कई दशकों से स्थापित घिनावनी व्यवस्थाओं को विस्थापित कर दिया है। लोग अपने भविष्य के खुद मालिक बनने का अधिकार मांग रहे हैं। परन्तु वर्तमान नाजुक स्थिति में, इस इलाके में कई ताकतें सक्रिय हैं।

एक तरफ, संघर्षरत लोग अपने देश की सत्ताओं को गिराने के लिये संघर्ष कर रहे हैं या, जैसे कि टयूनिशिया और मिस्र में यह सुनिश्चित करने के लिये संघर्ष कर रहे हैं कि जनता के हितों के साथ विश्वासघात नहीं होगा और आने वाली नयी राजनीतिक व्यवस्थाओं में जनता की पूरी भूमिका होगी।

दूसरी तरफ, सेना के नेता और पुरानी सत्ताओं की दूसरी शक्तिशाली ताकतें अभी भी ऊंचे सरकारी पदों पर बैठी हैं और जनता की राजनीतिक सक्रियता को दबाने की पूरी कोशिश कर रही हैं।

अमरीकी साम्राज्यवादी तथा दूसरी साम्राज्यवादी ताकतें यह सुनिश्चित करने के लिये पीछे से साज़िश कर रही हैं, कि उनके हितों को कम से कम नुकसान हो। वे अवश्य ही इन देशों में अपने सभी संपर्कों और प्रभाव का इस्तेमाल करके, इस संकट का अपने लिये सबसे हितकारी समाधान सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं, हालांकि दिखाने के लिये वे यह प्रचार कर रहे हैं कि वे ''लोकतंत्र'' के पक्ष में हैं।

इन अरब देशों में विद्रोह करने वाले लोगों को साम्राज्यवादियों और सत्ताधारी गुटों के दांवपेच का मुकाबला करना होगा। लोगों ने अपने अनुभव से देखा है कि कैसे अमरीकी साम्राज्यवाद और अन्दरूनी जन-विरोधी ताकतों ने मिलकर जनता के दुखदर्द को बढ़ाने का काम किया है।

उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी एशिया में जो बग़ावत चल रही है, यह एक ऐतिहासिक गतिविधि है। विभिन्ना यूरोपीय देशों और दूसरे देशों में मजदूर वर्ग और लोग पूंजीवादी आर्थिक संकट के बोझ के खिलाफ़ भारी संख्या में निकलकर विरोध संघर्ष कर रहे हैं। इन सारे संघर्षों से यह जाहिर होता है कि दुनियाभर में, अपने शोषण और दमन के स्रोत, पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ़ लोगों का गुस्सा और संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है।

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