सरकार द्वारा ख़रीद में कटौती के कारण गेहूं की खुदरा क़ीमतों में तेज़ी आई

देशभर के क़स्बों और शहरों में काम करने वाले लोग जून 2022 से गेहूं की बढ़ती क़ीमतों का सामना कर रहे हैं। गेहूं जैसे ज़रूरी खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में वृद्धि ने लोगों पर और बोझ डाल दिया है, जो पहले से ही एल.पी.जी., पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ी हुई क़ीमतों का सामना कर रहे हैं।

2022 में गेहूं की क़ीमतों में कैसे उछाल आया? 2021-2022 की गेहूं की फ़सल के लिए 2015 रुपये प्रति क्विंटल का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) घोषित किया गया था। परन्तु, सरकार ने गेहूं की बहुत कम ख़रीद की। दूसरी ओर, पूंजीवादी व्यापारी और व्यापारिक निगम, किसानों से एम.एस.पी. से बहुत अधिक क़ीमत पर, 2100-2500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं ख़रीदने को तैयार थे। व्यापारी एम.एस.पी. से इतना अधिक भुगतान करने को इसीलिये तैयार थे क्योंकि उन्हें अपने स्टॉक को और अधिक क़ीमत पर बेचने की उम्मीद थी। यूक्रेन में युद्ध के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में गेहूं की क़ीमतें आसमान छू रही थीं। सरकार द्वारा मई 2022 में निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा करने तक, अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में गेहूं की बढ़ी हुई क़ीमतों का पूंजीपति व्यापारियों और कॉरपोरेट घरानों ने पूरा फ़ायदा उठाया। जब घरेलू बाज़ार में खुदरा क़ीमतें बढ़ने लगीं तो सरकार जन-विरोध से बचने के लिए मजबूर हो गयी। निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के बाद भी गेहूं के दाम ऊंचे बने रहे। बड़े व्यापारियों और व्यापारिक निगमों ने अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू बाज़ार में ऊंची क़ीमतों से मुनाफ़ा बनाया।

संक्षेप में, सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि निजी थोक व्यापारियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और घरेलू बाज़ार में गेहूं बेचकर भारी मुनाफ़ा मिले। मार्च-अप्रैल 2022 में फ़सल के बाद गेहूं की ख़रीद न करके ऐसा किया गया है। इसके बजाय, उसने निजी व्यापारिक कंपनियों और बड़े व्यापारियों को किसानों से सीधे गेहूं ख़रीदने और खुदरा (अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू) बाज़ार में बेचने की अनुमति दी। उसने स्पष्ट रूप से निजी व्यापारिक निगमों और बड़े थोक विक्रेताओं के हित में कार्य किया।

पूंजीपति वर्ग का प्रचार है कि निजी व्यापारियों को गेहूं बेचने वाले किसानों ने बाकी आबादी की क़ीमत पर मुनाफ़ा कमाया है। सच तो यह है कि व्यापारियों ने ही भारी मुनाफ़ा कमाया है। जबकि किसानों को 2022 में उनकी उपज के लिए एम.एस.पी. से अधिक क़ीमत मिली लेकिन उनकी कमाई व्यापारियों द्वारा लिए गए मुनाफ़े का एक छोटा हिस्सा मात्र थी। इसके अलावा, हर साल एम.एस.पी. से अधिक क़ीमतों पर ख़रीद की कोई गारंटी नहीं होती है; किसान बाज़ार की अस्थिर परिस्थितियों पर निर्भर होते हैं।

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी-दिसंबर 2022 की तुलना में, गेहूं और आटे की क़ीमतों में 150 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। जनवरी 2023 के बीच में पूरे हिन्दोस्तान में आटे का दैनिक औसत खुदरा मूल्य 35 रुपये प्रति किलोग्राम के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था।

सरकारी प्रचार के अनुसार गेहूं की क़ीमत में वृद्धि का एक कारण यह है कि अक्तूबर 2021-मार्च 22 में रबी फ़सल के दौरान गेहूं का उत्पादन कम हुआ। यह झूठ है। गेहूं का उत्पादन केवल लगभग 30 लाख टन घटकर 1068 लाख टन रह गया था, यानी कि 3 प्रतिशत से भी कम की गिरावट हुई थी। यह गिरावट कोई मायने नहीं रखती जबकि नवंबर 2021 में सरकार के पास 400 लाख टन से अधिक का गेहूं का स्टॉक था।

2022 में, सरकार ने अपने स्टॉक में वृद्धि नहीं की क्योंकि उसने केवल 187 लाख टन की ख़रीद की जो कि पिछले वर्ष की तुलना में आधे से भी कम थी। 1 नवंबर, 2021 के 420 लाख टन सरकारी स्टॉक से घटकर नवंबर 2022 की शुरुआत में सरकार का गेहूं का स्टॉक आधा रह गया था, यानि कि केवल 210 लाख टन। सरकार ने जनवरी-फरवरी 2023 में गेहूं का कुछ स्टॉक जारी कर दिया जिसके बाद यह और कम हो गया। 1 जनवरी, 2023 को सरकार के पास कम से कम 138 लाख टन का गेहूं का स्टॉक ज़रूर होना चाहिये; इसके मुक़ाबले मार्च 2023 की शुरुआत में गेहूं का स्टॉक केवल 117 लाख टन ही है, जो कि 5 साल के न्यूनतम स्तर पर है। दूसरे शब्दों में, गेहूं की सार्वजनिक ख़रीद में कटौती करना और निजी थोक व्यापारियों को किसानों से सीधे गेहूं ख़रीदकर मुनाफ़ा कमाने की अनुमति देना, यह सरकार की जानबूझकर और सोची-समझी नीति है।

इन घटनाओं से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि हिन्दोस्तानी राज्य किसानों को लाभकारी क़ीमतों पर गारंटीकृत ख़रीद और आम जनता के लिए उचित क़ीमतों पर खाद्यान्न सुनिश्चित करने के अपने दायित्व को स्वीकार नहीं करता है। बड़े व्यापारी और इजारेदार कॉर्पोरेट घराने, जो ख़रीद और वितरण पर अपना पूर्ण नियंत्रण चाहते हैं। सरकार उनके द्वारा तय किये गये एजेंडे को पूरा करने का काम करती है।

इस स्थिति को बदलने के लिए और मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीपतियों की लालच के बजाय मज़दूरों और किसानों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था की दिशा को बदलना होगा। यह मज़दूरों और किसानों की मांग है। इसे तभी पूरा किया जा सकता है जब किसानों और शहरों की कामकाजी आबादी के हितों की रक्षा के उद्देश्य से राज्य खाद्यान्नों की ख़रीद, भंडारण और वितरण को अपने हाथ में ले लेगा।

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