महाराष्ट्र के बिजली क्षेत्र के मज़दूरों ने निजीकरण के खि़लाफ़ अपना संघर्ष तेज़ किया:
बिजली का निजीकरण समाज-विरोधी और मज़दूर-विरोधी है

पिछले 2 वर्षों में देशभर के बिजली क्षेत्र के मज़दूरों ने बिजली क्षेत्र के निजीकरण की पूंजीवादी योजना को बार-बार चुनौती दी है। दिसंबर 2022 और जनवरी 2023 के पहले सप्ताह में महाराष्ट्र के बिजली क्षेत्र के मज़दूरों ने पूरे महाराष्ट्र में बिजली क्षेत्र के बढ़ते निजीकरण के विरोध में अथक अभियान चलाया। इस अभियान के तहत 4 जनवरी 2023 को 72 घंटे की हड़ताल शुरू की।

Thane_Electricity_workers_protestपूंजीपति सर्व हिन्द स्तर पर बिजली (संशोधन) विधेयक 2022 को पारित करने की मांग कर रहे हैं। जिससे राज्य बिजली बोर्डों के वितरण नेटवर्क के निजीकरण में आसानी होगी। इसके साथ ही, विभिन्न राज्य सरकारें बिजली (संशोधन) विधेयक के पारित होने की प्रतीक्षा किए बिना, बिजली आपूर्ति का निजीकरण कर रही हैं। निजी बिजली कंपनियों, अडानी पावर और टोरेंट पावर ने महाराष्ट्र के मुख्य रूप से शहरी औद्योगिक केंद्रों के बड़े अत्यधिक लाभदायक हिस्सों में समानांतर वितरण के लिए आवेदन दिए हैं। इसी तरह, टाटा पावर ने महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में बिजली क्षेत्र का पूर्ण अधिग्रहण करने की इच्छा जाहिर की है। जिनका मक़सद स्पष्ट है कि सबसे अधिक लाभदायक क्षेत्रों में बिजली के वितरण को अपने हाथ में लेना।

महाराष्ट्र के बिजली कर्मचारियों ने सरमायदारों द्वारा किये जा रहे हमलों का जवाब दिया। महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी वर्कर्स फेडरेशन और सबऑर्डिनेट इंजीनियर्स एसोसिएशन सहित इंजीनियरों, कर्मचारियों और अधिकारियों की 30 से अधिक यूनियनों ने एक संयुक्त संघर्ष समिति का गठन किया है। जिसे महाराष्ट्र राज्य वीज कर्मचारी, अभियन्ते व अधिकारी संघर्ष समिती कहते हैं। संयुक्त संघर्ष समिति ने कामगार एकता कमेटी व अन्य मज़दूर संगठनों और जनसंगठनों के साथ मिलकर, निजीकरण के खि़लाफ़ एक सार्वजनिक अभियान चलाया। उन्होंने इस बात को उजागर किया कि निजीकरण से कामकाजी लोगों के लिए बिजली बहुत महंगी हो जाएगी।

संयुक्त संघर्ष समिति ने घोषणा की कि किसी के पास यह अधिकार नहीं है कि वह मज़दूरों के श्रम से और लोगों के टैक्स के पैसे से बनाये गये सार्वजनिक संपत्ति को निजी हाथों में सौंप दे। समिति ने 30,000 से अधिक ठेका मज़दूरों को नियमित करने की मांग की, जो बिना किसी सामाजिक सुरक्षा के अत्यधिक शोषणकारी परिस्थितियों में वर्षों से काम कर रहे हैं। समिति ने दिसंबर 2022 के अंतिम सप्ताह में नागपुर में विधानसभा के सामने एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया, जिसमें हजारों मज़दूरों ने भाग लिया।

हड़ताली कर्मचारियों के खि़लाफ़ महाराष्ट्र आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम (मेस्मा) लगाने की महाराष्ट्र सरकार की धमकी के बावजूद, बिजली कर्मचारियों ने 4 जनवरी, 2023 को अपनी हड़ताल शुरू की। देशभर के बिजली क्षेत्र के मज़दूरों के संगठनों ने महाराष्ट्र के अपने भाइयों और बहनों को अपना समर्थन दिया, जबकि आसपास के राज्यों की यूनियनों ने महाराष्ट्र में जाकर हड़ताल तोड़ने का काम करने से इंकार कर दिया।

यह देखते हुए कि बिजली कर्मचारी दृढ़ता से एकजुट हैं और यह महसूस कर रहे हैं कि उनके संघर्षों के लिए राज्य के मेहनतकश लोगों का समर्थन बढ़ रहा है, महाराष्ट्र सरकार को बिजली मज़दूरों के साथ बातचीत करने के लिये आना पड़ा और कुछ हद तक उनकी मांगों को मानना पड़ा।

बिजली कर्मचारियों को यह समझने की ज़रूरत है कि यह महाराष्ट्र सरकार द्वारा उठाया गया एक अस्थायी क़दम है। मज़दूर पूंजीपति वर्ग की सरकारों के वादों पर विश्वास नहीं कर सकते। पूंजीपतियों की निजीकरण की योजना को विफल करने के लिए, बिजली कर्मचारियों को संघर्ष को और तेज़ करते हुए, और पूरे देश के मेहनतकश लोगों को शामिल करके संघर्ष को व्यापक बनाने की आवश्यकता है।

आधुनिक समाज में भोजन, आवास, बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सुरक्षित पेयजल, परिवहन और संचार, आदि के साथ-साथ बिजली भी प्रत्येक मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। यह जीवन के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा है और इसलिए इसे एक सर्वव्यापी मानव अधिकार माना जाना चाहिए। राज्य यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है कि यह अधिकार प्रत्येक मनुष्य को हासिल हो सके।

परन्तु, आज़ादी के 75 साल बाद भी, करोड़ों ग्रामीण और शहरी घरों में बिजली की सुविधा नहीं है, या वे न्यूनतम बिजली का उपयोग करते हैं, क्योंकि उनके पास बिजली का बिल भरने के लिये पैसे नहीं हैं। बिजली उत्पादन और वितरण का विस्तार योजनाबद्ध तरीक़े से करने तथा यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हर देशवासी की बिजली की बढ़ती ज़रूरत को पूरा किया जाए।

बिजली को लेकर जो वर्ग संघर्ष चल रहा है, वह इस बात को लेकर है कि इस महत्वपूर्ण उत्पादक शक्ति का मालिक कौन है और इसके उत्पादन और वितरण का उद्देश्य क्या होना चाहिए।

एक तरफ इजारेदार पूंजीपति बिजली आपूर्ति को अपने लिए अधिकतम मुनाफ़े के स्रोत के रूप में देखते हैं। प्रमुख राजनीतिक पार्टियों और हिन्दोस्तानी राज्य पर अपने वर्चस्व का इस्तेमाल करते हुए, पूंजीपितयों ने यह सुनिश्चित किया है कि हर सरकार बिजली आपूर्ति के निजीकरण के कार्यक्रम को लागू करे।

दूसरी तरफ बिजली क्षेत्र के मज़दूर और मेहनतकश लोग हैं, जो इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि पूरे समाज की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बिजली एक अनिवार्य आवश्यकता है, और यह एक सार्वभौमिक मानव अधिकार है। वे इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि इस क्षेत्र में निजी लाभ की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इजारेदार पूंजीपति इस मानव अधिकार को कभी सुनिश्चित नहीं कर सकते।

1991-1992 से केंद्र और अधिकांश राज्यों की हर सरकार ने बिजली क्षेत्र के निजीकरण को बढ़ाने पर ज़ोर दिया है। सबसे पहले बिजली उत्पादन क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला गया। फिर बिजली अधिनियम 2003 के माध्यम से, अधिकांश राज्य बिजली बोर्डों को विभाजित किया गया और बिजली का उत्पादन, पारेषण और वितरण करने वाली कंपनियों में विभाजित कर दिया गया। ऐसा न केवल मज़दूरों की एकता को तोड़ने और मज़दूरों की ताक़त को कम करने के लिए किया गया था, बल्कि इसने लाभदायक बिजली उत्पादन और वितरण में निजी पूंजी को आसानी से प्रवेश करने में भी मदद की।

बेशक ये सभी क़दम लोगों को बेहतर गुणवत्ता की, सस्ती और आसानी से उपलब्ध बिजली देने के नाम पर उठाये गए थे। परन्तु लोगों का अनुभव यह रहा है कि बिजली पहले के मुक़ाबले कहीं अधिक महंगी हो गई है और आसानी से उपलब्ध भी नहीं होती। जबकि दूसरी ओर निजी कंपनियां भारी मुनाफ़ा कमाती रही हैं। इससे यह तथ्य सिद्ध हो गया है कि इन तथाकथित सुधारों का वास्तविक उद्देश्य लोगों की सेवा करना नहीं था बल्कि निजी कंपनियों को और धनी बनाना था।

पूंजीपतियों की लालच स्वभाविकतः कभी पूरी नहीं हो सकती। वे हमेशा अधिक से अधिक मुनाफ़ा चाहते हैं। उनकी चाहत को पूरा करने के लिए, केंद्र सरकार 2014 से विद्युत (संशोधन) अधिनियम के ज़रिये, और सुधार लाने पर ज़ोर दे रही है। इन सुधारों का उद्देश्य है लोगों के पैसे और श्रम से निर्मित लाखों करोड़ रुपये के उत्पादन, पारेषण और वितरण के बुनियादी ढांचे को औने-पौने दामों पर निजी पूंजीपतियों को सौंपना और बिजली वितरण में निजी कंपनियों के प्रवेश को आसान बनाना।

देशभर में अपनी एकता का उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुये, विभिन्न स्तरों पर काम कर रहे बिजली क्षेत्र के मज़दूरों ने केंद्र सरकार के बिजली संशोधन अधिनियम को पास करावने के प्रयासों का वीरतापूर्वक विरोध किया है। उन्हें नौकरी से निकालने की सरकार द्वारा बार-बार दी गयी धमकियों के आगे वे झुके नहीं हैं। उन्होंने उजागर किया है कि कैसे पिछले 30 वर्षों में विभिन्न सरकारों ने सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनियों को सुनियोजित तरीके़ से कमजोर किया है। निजीकरण के खि़लाफ़ बिजली मज़दूरों का जुझारू संघर्ष, उन सभी मज़दूरों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो निजीकरण के खि़लाफ़ और अपनी रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर हो रहे हमलों के खि़लाफ़ बहादुरी से लड़ रहे हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का निजीकरण हमारे देश के इजारेदार पूंजीपतियों के समूहों द्वारा निर्देशित एक कार्यक्रम है।

इस योजना को पूरी तरह से हराने के लिए पूरी अर्थव्यवस्था का संपूर्ण नव-निर्माण करने की आवश्यकता है। वर्तमान में अर्थव्यवस्था हिन्दोस्तानी और अंतर्राष्ट्रीय इजारेदार पूंजीपतियों के लिये ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा पैदा करने की दिशा में चलती है। इस दिशा को पलटना होगा। वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन तथा वितरण को संपूर्ण जनसंख्या की बढ़ती भौतिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं की अधिकतम संभावित पूर्ति के मक़सद से संचालित करने की आवश्यकता है।

अतः बिजली के निजीकरण के खि़लाफ़ किया जा रहा संघर्ष भी पूंजीवादी व्यवस्था और अर्थव्यवस्था की पूंजीवादी दिशा के खि़लाफ़ संघर्ष का एक अनिवार्य हिस्सा है। मज़दूर वर्ग को पूंजीवाद से छुटकारा पाने के लिये और अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के लिये मेहनतकश किसानों के साथ गठबंधन करके अपना राज स्थापित करने की आवश्यकता है।

देशभर में निजीकरण के खि़लाफ़ चल रहा संघर्ष, जैसे-जैसे तेज़ होता जा रहा है, वैसे-वैसे ज्यादा से ज्यादा मेहनतकश लोग अपने जीवन के अनुभव से इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं।

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