अमरीकी साम्राज्यवाद की रणनीति में हिन्दोस्तान की भूमिका

अमरीकी साम्राज्यवाद की पूरे एशिया पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की रणनीति में हिन्दोस्तान प्रमुख भूमिका निभा रहा है।

अमरीकी विदेश विभाग में पूर्वी एशिया और रणनीतिक के मामलों के ब्यूरो के उप सहायक सचिव, एलेक्स वोंग ने अप्रैल 2018 में “इंडो-पैसिफिक रणनीति” के विषय पर दिये गये एक भाषण में निम्नलिखित बातें रखीं :

“इंडो-पैसिफिक” शब्द पर अपना ध्यान केंद्रित करें। यह महत्वपूर्ण है कि हम इस शब्द का उपयोग कर रहे हैं । इससे पहले, लोग एशिया-पैसिफिक शब्द का इस्तेमाल करते थे … लेकिन हमने इन शब्दों को दो कारणों से अपनाया है, और यह दो कारणों से महत्वपूर्ण है। नंबर एक, यह … इस वर्तमान वास्तविकता को स्वीकार करता है कि दक्षिण एशिया और विशेष रूप से हिन्दोस्तान, पैसिफिक और पूर्वी एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। … दूसरा, यह हमारे हित में है, अमरीका के हित में है, श कि हिन्दोस्तान इस क्षेत्र में तेज़ी से महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। यह एक ऐसा देश है जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्वतंत्र और खुली व्यवस्था को नियंत्रित कर सकता है और संभाल सकता है और हमारी नीति है यह सुनिश्चित करना कि हिन्दोस्तान उस भूमिका को निभाए।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का मतलब है हिन्द महासागर व प्रशांत महासागर का क्षेत्र। इसमें अफ्रीका के पूर्वी तट से लेकर अमरीका के पश्चिमी तट तक के पूरे क्षेत्र के सभी देश शामिल हैं। हिन्दोस्तान और अमरीका इसके दो छोर (पश्चिम में हिन्दोस्तान और पूर्व में अमरीका) बनने वाले हैं। हिन्दोस्तान की भूमिका है अमरीका को एशिया पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में सहायता करना।

अमरीका यह मांग कर रहा है कि सभी देशों को इजारेदार पूंजीपतियों और साम्राज्यवादी राज्यों द्वारा अप्रतिबंधित लूट के लिए अपने दरवाज़े खोल देने चाहिएं और बहुपार्टीवादी प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र के नुस्खे का पालन करना चाहिए। जो देश ऐसा नहीं करते हैं, उन पर “स्वतंत्र और खुला” नहीं होने का आरोप लगाया जाता है।

एडमिरल जॉन एक्विनिलो ने, मई 2018 में अमरीका-पैसिफिक नौसेना की कमान संभालने पर घोषणा की थी कि :

“बड़ी-बड़ी ताक़तों की आपसी प्रतिस्पर्धा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र से ज्यादा और कहीं भी नहीं हैं …”।

अमरीका ने अपनी एशिया-धुरी की नीति के तहत, अपनी सेनाओं का अधिकतम हिस्सा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया है। दक्षिण चीन सागर में अमरीका ने अपने सशस्त्र बलों की तैनाती में तेज़ी से वृद्धि की है और वह चीन के द्वीपों से 12 मील की दूरी के अंदर सुनियोजित तरीके से ‘फ्रीडम ऑफ़ नेविगेशन (नौसंचार की स्वतंत्रता)’ नामक युद्ध अभ्यासों को नियमित तौर पर करता रहता है। ये चीन को उकसाने की कोशिशें हैं। ये चीन और हिन्दोस्तान समेत कई अन्य देशों द्वारा माने जाने वाले उस क़ानून का उल्लंघन हैं, जिसके अनुसार युद्ध पोतों को किसी देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले, उस देश से अनुमति लेनी होती है। विशेष आर्थिक क्षेत्र को उस देश की तटरेखा से 200 कि.मी. की दूरी तक के क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है। अमरीका हिन्दोस्तान और अन्य देशों को चीन के खि़लाफ़ भड़काता रहा है।

हिन्दोस्तान के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 18 अगस्त को, बैंकाक, थाईलैंड के चुलालोंगकोर्न विश्वविद्यालय में दिए गए एक भाषण में कहा था कि:

”… हिन्दोस्तान के हितों का बहुत बड़ा हिस्सा अब हिन्दोस्तान के पूर्व में, हिंद महासागर से आगे और प्रशांत महासागर क्षेत्र में है।” इससे आगे, उन्होंने कहा कि, “सीधे शब्दों में कहें तो हिंद महासागर से प्रशांत महासागर का अलग होना 1945 से चल रहे, अमरीकी रणनीतिक प्रभुत्व का सीधा परिणाम था। चूंकि पिछले दो दशकों में अलग-अलग देशों की ताक़तों में परिवर्तन हुए हैं, इसलिए इसमें भी बदलाव होना अनिवार्य है। अमरीका की वर्तमान नयी स्थिति, चीन के साथ-साथ हिन्दोस्तान का उभर कर आगे आना, जापान और ऑस्ट्रेलिया के इस क्षेत्र से बढ़ते बाहरी सम्बन्ध, दक्षिण कोरिया के व्यापक हितों और वास्तव में, आसियान के व्यापक दृष्टिकोण, इन सभी ने इस परिवर्तन में योगदान दिया है। … अब किसी एक देश के लिए इस सबतरफ़ा बोझ को संभालना संभव नहीं है।”

मंत्री महोदय का तात्पर्य यह है कि पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए हिन्दोस्तान को अमरीकी साम्राज्यवाद के ‘बोझ’ को उठाने में हिस्सेदार बन जाना चाहिए। हिन्दोस्तान को विभिन्न देशों के लोगों को अपनी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं को स्थापित करने से रोकने और चीन के प्रभाव क्षेत्र के विस्तार को रोकने के ‘बोझ’ को उठाने में अमरीका का सांझेदार बनना चाहिए।

चीन पिछले दो दशकों में अमरीका के लिए एक प्रमुख चुनौती के रूप में उभरा है। अमरीका, चीन की प्रगति को रोकना चाहता है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए, वह हिन्दोस्तान को सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ियों में से एक के रूप में देखता है। हिन्दोस्तान की इस भूमिका को हासिल करने के लिए, अमरीका खास कर पूर्व की दिशा में हिन्दोस्तान की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा दे रहा है। हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीवादी घराने अपने बाज़ारों और कच्चे माल के स्रोतों को बढ़ाने और अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने की नयी-नयी संभावनाओं से बेहद उत्साहित हैं। वे अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ सहयोग और चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के ज़रिए ऐसा करने का सपना देख रहे हैं।

पिछले दो दशकों में, अमरीकी साम्राज्यवादी क्रमशः हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के साथ सैन्य-रणनीतिक गठबंधन बनाते जा रहे हैं और उसे मजबूत कर रहे हैं। अमरीका पूरे एशिया को अपने प्रभुत्व में लाने के अपने उद्देश्य को साकार करने के लिए, हिन्दोस्तान के क्षेत्र और लोगों को एशिया के अन्य देशों के लोगों के खि़लाफ़ इस्तेमाल करना चाहता है।

हिन्दोस्तानी राज्य ने अमरीका के साथ कई सैन्य समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इन समझौतों से इस बात की संभावना बनती है कि अमरीका इस क्षेत्र में अपने युद्धों के लिए हिन्दोस्तान को अपने सैनिक अड्डे के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। हिन्दोस्तान का शासक वर्ग अपने तंग साम्राज्यवादी मंसूबों को हासिल करने के लिए, देश की संप्रभुता और इस क्षेत्र में शांति को ख़तरे में डाल रहा है। वह एक ख़तरनाक रास्ते पर चल रहा है जो हमारे लोगों और देश को विनाशकारी युद्ध में धकेल सकता है।

अमरीका के साथ अपने गठबंधन को मजबूत करने के साथ-साथ, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने रूस के साथ भी अपना सैनिक-रणनीतिक संबंध बना रखा है। हिन्दोस्तानी शासक वर्ग इन संबंधों को बनाए रखने में कई फ़ायदे देखता है। हिन्दोस्तानी सेना को ऐतिहासिक तौर पर, रूस से अत्याधुनिक हथियार प्राप्त होते रहे हैं। इन हथियारों की देखरेख के लिए हिन्दोस्तान रूस पर निर्भर है। इसके अलावा, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग रूस के साथ समन्वय करके, हिन्दोस्तान के उत्तर पश्चिम की ओर – ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और मध्य एशियाई गणराज्यों में अपने हितों को बढ़ावा देने की उम्मीद करता है। वह रूस के साथ अपने संबंधों को नष्ट नहीं करना चाहता है, जैसा कि अमरीका मांग कर रहा है। यह इस बात से साफ़-साफ़ नज़र आता है कि हिन्दोस्तानी राज्य ने, अमरीका की मांगों के बावजूद, यूक्रेन में युद्ध के लिए रूस की निंदा करने या रूस पर प्रतिबंध लगाये जाने को जायज़ ठहराने से इनकार किया है। इस समय, अमरीका हिन्दोस्तान को रूस के साथ संबंधों के मामले में काफी लम्बी छूट दे रहा है। अमरीका चीन को अलग-थलग और कमजोर करने के अपने उद्देश्य में हिन्दोस्तान का इस्तेमाल करना चाहता है। अमरीकी साम्राज्यवादी चीन के खि़लाफ़ एक के बाद एक उकसाने वाली हरकत करने की कोशिश कर रहे हैं और वे हिन्दोस्तान पर भी ऐसा करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। अमरीका जिस रास्ते पर चल रहा है, उसके परिणामस्वरूप हमारे क्षेत्र में युद्ध या एक और विश्व युद्ध हो सकता है।

हिन्दोस्तानी शासक वर्ग एक खतरनाक रास्ता अपना रहा है। हिन्दोस्तानी मज़दूर वर्ग और लोगों को अमरीकी साम्राज्यवाद की एशिया पर अपना प्रभुत्व जमाने की रणनीति में, हिन्दोस्तान की भागीदारी का विरोध करना चाहिए। हमें अमरीका के साथ हिन्दोस्तान के सैनिक-रणनीतिक गठबंधन को तोड़ने की मांग करनी चाहिए और इसके लिए संघर्ष करना चाहिए।

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