हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अमरीकी साम्राज्यवाद का बढ़ता सैन्यीकरण

अमरीकी नौसेना ने 29 जून से 4 अगस्त, 2022 के बीच, प्रशांत महासागर में स्थित हवाई द्वीप के तट पर दुनिया के सबसे बड़े समुद्री युद्ध अभ्यास की मेज़बानी की।

RIMPAC
हिन्द प्रशांत क्षेत्र

इस समुद्री युद्ध अभ्यास को रिमपैक के नाम से जाना जाता है। इसमें 26 देशों ने हिस्सा लिया था। इसमें अमरीका के अलावा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, हिन्दोस्तान, ब्रूनेई, चिले, कोलंबिया, डेनमार्क, इक्वाडोर, इंडोनेशिया, इस्राइल, जापान, मलेशिया, मैक्सिको, नेदरलैंड, न्यूजीलैंड, पेरू, फिलीपींस, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका, थाईलैंड और टोंगा शामिल थे।

38 जहाज, 4 पनडुब्बियां, 9 देशों की राष्ट्रीय सेनाएं, 170 से अधिक विमान सहित लगभग 25,000 सैन्य कर्मियों ने हवाई द्वीप और दक्षिणी कैलिफोर्निया में और उसके आसपास एक साथ युद्ध अभ्यास में हिस्सा लिया। अमरीका के नेतृत्व में सैन्य सहयोग और समन्वय का यह एक विशाल प्रदर्शन था और स्पष्ट रूप से चीन के ख़िलाफ़ संदेश था।

1971 से अमरीका के नेतृत्व में सैन्य रिमपैक अभ्यास हर दूसरे साल में आयोजित किया जा रहा है। यह अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के सैन्य युद्ध अभ्यास के रूप में शुरू हुआ। अमरीका 1974 से इसमें अन्य देशों को शामिल कर रहा है। पिछली बार, 2018 में बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास आयोजित किया गया था। 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण, रिमपैक सिर्फ समुद्री युद्ध अभ्यास था।

इससे पहले चीन को भी रिमपैक में आमंत्रित किया गया था। चीन ने 2014 और 2016 में रिमपैक में हिस्सा लिया था। मई 2018 में, अमरीका के रक्षा संगठन पेंटागन ने चीन को पहले आमंत्रित किया और बाद में रिमपैक में भाग लेने के निमंत्रण को रद्द कर दिया। यह चीन को खुले तौर पर निशाना बनाने के अमरीका के निर्णय को दर्शाता है। अमरीका एशिया पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के उद्देश्य के लिए चीन को मुख्य बाधा के रूप में देखता है। निमंत्रण को रद्द किए जाने का कारण बताया गया कि दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति के चलते चीन और अन्य कुछ एशियाई देशों के बीच क्षेत्रीय दावों के विवाद हैं।

दिसंबर 2021 में, अमरीकी कांग्रेस के दोनों सदनों ने 2022 के लिए राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम (एन.डी.ए.ए.) पारित किया, जिसमें बाइडन प्रशासन ने सिफ़ारिश की कि ताइवान को रिमपैक में आमंत्रित किया जाए जो चीन के ख़िलाफ़ एक स्पष्ट उकसावा था। लेकिन अंततः ताइवान को रिमपैक 2022 में आमंत्रित नहीं किया गया था, इस प्रकार चीन के साथ अमरीका का टकराव और तेज होने से बच गया।

लेकिन यह ध्यान दिया जा सकता है कि इस साल जुलाई के मध्य में, जब रिमपैक 2022 अभ्यास चल ही रहा था तभी अमरीका ने चीन की समुद्री तट रेखा पर, ताइवान समुद्र-संधि के जरिए अपने युद्धपोतों को भेजकर, चीन के ख़िलाफ़ एक सैन्य उकसावे को अंजाम दिया।

2006 से रिमपैक में हिन्दोस्तान को पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त था। हिन्दोस्तान ने पहली बार रिमपैक 2014 में भाग लिया था। तब से, यह लगातार रिमपैक में हिस्सा ले रहा है। इन रिमपैक कार्यवाहियों में आई.एन.एस. सह्याद्री और आई.एन.एस. सतपुरा नामक नौसेना की जंगी जहाजों के बेड़े ने हिस्सा लिया है। इनके अलावा, रिमपैक 2022 में हिन्दोस्तानी सशस्त्र बलों ने हिन्दोस्तानी नौसेना के लिए बोइंग द्वारा निर्मित किए जा रहे पी-81 लंबी दूरी, बहु-मिशन समुद्री गश्ती विमान के साथ हिस्सा लिया। पी-81 में पनडुब्बी-रोधी युद्ध (ए.एस.डब्ल्यू.), सतह-रोधी युद्ध (ए.एस.यू.डब्ल्यू.), खुफ़िया तंत्र, समुद्री गश्त और निगरानी मिशन के लिए उन्नत क्षमताएं होने की सूचना है।

रिमपैक 2022 अभ्यासों को इस पूरे क्षेत्र पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए अमरीका द्वारा अपनाई गई रणनीति के दृष्टिकोण में देखा जाना चाहिए। अमरीका चीन की प्रगति को रोकना चाहता है। चीन हाल के वर्षों में अमरीका के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। चीन के ख़िलाफ़ बार-बार उकसाने की कार्रवाई के साथ, दक्षिण चीन सागर में अमरीकी सैन्य बलों की तैनाती का दायरा में वृद्धि हुई है। अमरीका हिन्दोस्तान और अन्य देशों को चीन के ख़िलाफ़ भड़काता भी रहा है।

अमरीका हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम करने के प्रयासों में हिन्दोस्तान को एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में देखता है। इस दिशा में, अमरीकी साम्राज्यवादी हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के साथ एक सैन्य रणनीतिक गठबंधन का निर्माण करने के साथ-साथ मजबूती प्रदान करते आ रहे हैं। अमरीका पूरे एशिया को अपने प्रभुत्व में लाने के उद्देश्य को साकार करने के लिए एशिया के अन्य देशों के लोगों के ख़िलाफ़ हिन्दोस्तान की धरती और लोगों का इस्तेमाल करना चाहता है।

अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा हिंद-प्रशांत का सैन्यीकरण इस क्षेत्र में शांति के लिए ख़तरनाक है। हिन्दोस्तानी लोगों को इस सैन्यीकरण का विरोध करना चाहिए और मांग करनी चाहिए कि हिन्दोस्तान अमरीका के साथ अपने सैन्य गठबंधन को तोड़ दे।

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