बंटवारे के बाद के पचहत्तर साल :
हिन्दोस्तान के विभाजन के पीछे ब्रिटिश साम्राज्यवादी रणनीति

1947 में उपमहाद्वीप के सांप्रदायिक बंटवारे की भयानक वारदातों को हिन्दोस्तानी लोग कभी नहीं भूलेंगे। हालांकि, इतिहास की किताबें इस विभाजन के वास्तविक उद्देश्य और, और यह क्यों हुआ, इनकी सच्चाई को छिपाती हैं। हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के राजनेता उपमहाद्वीप के विभाजन के लिए पाकिस्तान के राजनेताओं को दोषी ठहराते हैं। वे इस सच्चाई को छिपाते हैं कि इस बंटवारे के मास्टरमाइंड ब्रिटिश साम्राज्यवादी ही थे। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने हिन्दोस्तान के विभाजन को अपने हित में और संपूर्ण विश्व-साम्राज्यवाद के हितों में आयोजित किया था।

द्वितीय विश्व युद्ध का अंत जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा था, एशिया के उपनिवेशवादी और अर्ध-उपनिवेशवादी देशों के लोग, साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी बोझ से अपनी मुक्ति के लिए एक शक्तिशाली संघर्ष में उठ खड़े हुए थे। इनमें हिन्दोस्तानी लोगों के अलावा चीन, कोरिया, वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, बर्मा, फिलीपींस, ईरान, इराक और सीरिया के लोग भी शामिल थे। इनमें से कई देशों में मुक्ति संघर्षों का नेतृत्व कम्युनिस्ट पार्टियों ने किया था।

ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को यह समझ में आने लगा था कि वे बहुत लंबे समय तक हिन्दोस्तान पर अपना सीधा शासन जारी नहीं रख सकते। विश्व युद्ध समाप्त होने से पहले ही उन्होंने अपनी निकास-रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया था। मई 1945 में, ”‘हिन्दोस्तान और हिंद महासागर में ब्रिटिश साम्राज्य के रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक दीर्घकालिक नीति“ पर युद्ध मंत्रिमंडल को एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। एशिया में उनके साम्राज्यवादी हितों के लिए समाजवादी सोवियत संघ को मुख्य ख़तरा मानते हुए, इस रिपोर्ट ने ब्रिटेन के लिए, हिन्दोस्तान के रणनीतिक महत्व के चार कारणों का हवाला दिया।

एक सैनिक अड्डे के रूप में हिन्दोस्तान का स्थान, जहां से वहां पर तैनात किये गये सैनिक-बलों को न केवल हिंद महासागर क्षेत्र में बल्कि मध्य-पूर्व और सुदूर-पूर्व क्षेत्रों में इस्तेमाल किया जा सकता है; वायु और समुद्री संचार के लिए एक पारगमन बिंदु; युद्ध के लिए, अच्छी गुणवत्ता वाली जनशक्ति का एक बड़ा भंडार; और एक ऐसा देश जिस के उत्तर पश्चिम क्षेत्र से, ब्रिटिश वायुशक्ति, सोवियत सैन्य-प्रतिष्ठानों के लिए ख़तरा पैदा कर सकती थी।

(द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियास पार्टीशन – नरेंद्र सिंह सरिला, पृष्ठ 22)

1945-47 के दौरान, ब्रिटिश सशस्त्र बलों के मुखियों ने बार-बार उपमहाद्वीप के साथ, ब्रिटिश सैन्य संबंध बनाए रखने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। उन्होंने विशेष रूप से उत्तर-पश्चिमी हिन्दोस्तान के महत्व पर जोर दिया। वे इस बात पर ज़ोर देते रहे कि हिन्दोस्तान के विभाजन से तेल-समृद्ध पश्चिम-एशिया और पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के क्षेत्रों में ब्रिटेन के रणनीतिक हितों की हिफाज़त होगी।

फरवरी 1946 में, रॉयल इंडियन नेवी के नाविकों ने बगावत कर दी। कम्युनिस्टों के नेतृत्व में मुंबई, कराची और कोलकाता के मज़दूर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए और नाविकों के समर्थन में सड़कों पर उतर आए। रॉयल इंडियन आर्मी के सैनिकों ने, नौसेना में अपने भाइयों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया। नौसेना से लेकर थल सेना और वायु सेना में भी विद्रोह फैलने लगा। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने उपमहाद्वीप से जाने से पहले हिन्दोस्तान के विभाजन की तैयारी तेज़ कर दी।

सितंबर 1946 में, ब्रिटिश चीफ ऑफ स्टाफ ने ”ब्रिटिश राष्ट्रमंडल (कॉमनवेल्थ) के लिये हिन्दोस्तान का रणनीतिक महत्व“ नाम की एक रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में फिर से एक बार दोहराया गया कि ब्रिटिश साम्राज्यवादी हितों की हिफाज़त के लिए हिन्दोस्तान की जनशक्ति और क्षेत्र बहुत ही जरूरी थे। रिपोर्ट के कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

  • हिंद महासागर क्षेत्र में किसी भी संभावित-शत्रुतापूर्ण शक्ति को अपने सैनिक अड्डे स्थापित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
  • फारस की खाड़ी से, ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के लिए आवश्यक तेल और इसके यातायात के लिए एक सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • यदि एक शक्तिशाली वायु सेना के साथ रूस, हिन्दोस्तान पर हावी हो गया … तो ब्रिटेन फ़ारस की खाड़ी और उत्तरी हिंद महासागर के समुद्री मार्गों पर अपना नियंत्रण खो देगा।
  • हिन्दोस्तान हमारी साम्राज्यवादी रणनीतिक योजना की एक अनिवार्य कड़ी है।
  • हिन्दोस्तान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि परमाणु युद्ध की संभावनाओं से खुली जगह की आवश्यकता बढ़ गई है और हिन्दोस्तान के पास यह जगह है।
  • सुदूर-पूर्व में बड़े पैमाने पर राष्ट्रमंडल द्वारा सैन्य अभियान चलाने के लिए हिन्दोस्तान ही एकमात्र उपयुक्त सैन्य अड्डा है।
  • सैन्य रणनीति के दृष्टिकोण से, हिन्दोस्तान की सबसे महत्वपूर्ण संपत्तियों में से एक उसकी अपार जनशक्ति है।

(द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियास पार्टीशन – नरेंद्र सिंह सरिला, पृष्ठ 239-240)

उनके सामने सबसे अच्छे विकल्प के रूप में, ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने इस क्षेत्र में अपने सैन्य-दबदबे को स्थापित करने के लिए हिन्दोस्तान के विभाजन के साथ, एक सांप्रदायिक कत्लेआम आयोजित करने का फ़ैसला किया। अगस्त 1946 में कलकत्ता में सांप्रदायिक नरसंहार के आयोजन के बाद, इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक, एन.पी.ए. स्मिथ, ने वायसराय को लिखा :

गंभीर साम्प्रदायिक अव्यवस्था की हालातों में, हमें ऐसी कार्रवाई कतई नहीं करनी चाहिए जो ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन को फिर से शुरू कर दे। ऐसा आन्दोलन हमारे लिए एक बेहद ख़तरनाक स्थिति पैदा कर सकता है और हमारे लिए सभी रास्ते बंद करने की हालातें पैदा कर सकता है। सांप्रदायिक अव्यवस्था की हालातें एक तरह से स्वाभाविक हालांकि एक भयानक प्रक्रिया है, और ऐसी हालातें हिन्दोस्तान की समस्या के समाधान के लिए एक उचित तरीका भी हैं।

ब्रिटिश खुफिया प्रमुख ने जिस ख़तरनाक स्थिति का जिक्र किया था, वह थी – हिन्दोस्तान के मज़दूरों और किसानों द्वारा क्रांति की संभावना। जिसका ”समाधान“ सांप्रदायिक-आधार पर हिन्दोस्तान का विभाजन था।

हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपति और बड़े जमींदार, ब्रिटिश साम्राज्यवाद की तुलना में, मज़दूरों और किसानों की क्रांति के और भी अधिक विरोधी थे। उन्होंने नौसेना के सैनिकों के विद्रोह की निंदा की। वे सत्ता को अपने हाथों में स्थानांतरित करने के लिए अंग्रेजों के साथ एक समझौता करने के लिए बहुत उत्सुक थे।

साम्प्रदायिक विभाजन के लिए परिस्थितियां बनाने के लिए ब्रिटिश शासकों ने कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग के नेताओं के साथ अलग-अलग बातचीत की। उन्होंने यह सुनिश्चित करने के लिए कि ये दोनों पार्टियां उनकी साम्राज्यवादी विभाजन की योजना का, एक साथ मिल कर विरोध न करें, उनके बीच आपसी-संदेह को और भी बढ़ाने का काम किया। एक पार्टी को दूसरे के ख़िलाफ़ उकसाते हुए, ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने बहुत ही चालाकी से, सांप्रदायिक विभाजन को एक एकमात्र-विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। क्रांति की संभावनाओं को रोकने और अपने हाथों में सत्ता हासिल करने की उत्सुकता में, हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों के प्रतिद्वंदी गुट ब्रिटिश साम्राज्यवादी विभाजन की योजना के साथ सहमत हुए।

हिन्दोस्तान के विभाजन ने, हिन्दोस्तान के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में पाकिस्तान के रूप में एक विश्वसनीय सैन्य अड्डा प्रदान करके, ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रणनीति को सफल बनाया।

शीत युद्ध की अवधि के दौरान, अपने खुदगर्ज़ हितों की हिफाज़त के लिए, एंग्लो-अमरीकी साम्राज्यवादियों ने यह सुनिश्चित करने के लिए काम किया कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान हमेशा एक-दूसरे के दुश्मन बने रहे।

शीत युद्ध की अवधि के दौरान, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने सोवियत संघ के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए, जिसमें 1971 में एक सैन्य संधि पर हस्ताक्षर करना भी शामिल है। अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने, अमरीका और सोवियत संघ के बीच टकराव का फायदा उठाया। पाकिस्तान के शासक वर्ग ने, ब्रिटिश और अमरीकी साम्राज्यवादियों को अपने देश में सैन्य-अड्डे प्रदान किए। सेंट्रल ट्रीटि आर्गेनाइजेशन (सी.ई.एन.टी.ओ.) और साउथ एशिया ट्रीटि आर्गेनाइजेशन (एस.ई.ए.टी.ओ.) के अमरीकी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन में पाकिस्तान शामिल हो गया। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत सेना के ख़िलाफ़ पाकिस्तान को एक पड़ाव के रूप में इस्तेमाल किया।

सोवियत संघ के पतन के बाद, अमरीकी साम्राज्यवादियों ने पाकिस्तान का इस्तेमाल आतंकवादी गुटों के एक प्रजनन-स्थल (ब्रीडिंग ग्राउंड) के रूप में किया जिन्हें दुनियाभर में तैनात किया जा सके। उन्होंने पाकिस्तान पर आतंकवाद का स्रोत होने का आरोप लगाया – इस सच्चाई को छिपाते हुए कि यह अमरीका ही था जिसने इन आतंकवादी-गुटों को बनाया था। दशकों से चले आ रहे पाकिस्तान द्वारा अपनाए गए रास्ते ने, उसके अपने देश के अंदरूनी मामलों में अमरीकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप को बढ़ावा दिया है, जिसके विनाशकारी परिणाम पाकिस्तान के लोग भुगत रहे हैं।

शीत युद्ध के बाद की अवधि में, अमरीका सुनियोजित रूप से हिन्दोस्तान के साथ रणनीतिक-सैन्य गठबंधन बना रहा है और मजबूत कर रहा है। चीन सहित अन्य एशियाई देशों के लोगों के ख़िलाफ़, अमरीका, हिन्दोस्तान की धरती और यहां रहने वाले लोगों का इस्तेमाल करना चाहता है, ताकि पूरे एशिया को अपने प्रभुत्व में लाने के अपने लक्ष्य को हासिल कर सके।

निष्कर्ष

ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने हिन्दोस्तान के स्वतंत्र होने के बाद, एशिया में अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए हिन्दोस्तान के विभाजन की योजना बनाई थी और उसे अंजाम दिया था। क्रांति के लिए मज़दूरों, किसानों और बग़ावत कर रहे सैनिकों के डर से, हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग देश के विभाजन के लिए राज़ी हो गया।

हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने 1947 में ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा किए गए विभाजन से कोई सबक नहीं सीखा है। अपने संकीर्ण खुदगर्ज़ साम्राज्यवादी उद्देश्यों को हासिल करने के लिए, हमारे देश का शासक वर्ग हिन्दोस्तान की संप्रभुता और इस पूरे क्षेत्र में शांति को ख़तरे में डाल रहा है। यह अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ एक ख़तरनाक रणनीतिक-सैन्य साझेदारी कायम करने के इरादे से काम कर रहा है। यह एक ऐसा रास्ता है जो हमारे लोगों को एक विनाशकारी युद्ध में फंसा सकता है।

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