बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों का बिजली (संशोधन) विधेयक, 2022 के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन

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हैदराबाद

बिजली (संशोधन) विधेयक 2022 को 8 अगस्त, 2022 को लोकसभा में पेश किया गया। इस विधेयक को संसद के मानसून सत्र के लिए, पहले सूचीबद्ध नहीं किया गया था, इसे अंतिम समय पर जल्दबाजी में पेश किया गया। संसद में कई विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध किया। इसके बाद और अधिक परामर्श के लिए, इसे ऊर्जा से संबंधित संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया।

विद्युत संशोधन विधेयक का उद्देश्य है, निजी कंपनियों को राज्य डिस्कॉम के वितरण नेटवर्क का इस्तेमाल करके बिजली वितरण से मुनाफा कमाने के लिए सक्षम बनाना। इजारेदार पूंजीपति चाहते हैं कि विधेयक को पारित किया जाए, ताकि पूरे देश में बिजली वितरण के ज़रिये भारी मुनाफा बनाने की उनकी योजना को सुनिश्चित हो सके।

बिजली क्षेत्र के श्रमिकों ने सरकार को बार-बार चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने बिजली संशोधन विधेयक 2022 को पारित करने का प्रयास किया, तो पूरे देश के बिजली कर्मचारी करके इसका विरोध करेंगे। साथ ही साथ बिजली-आपूर्ति को बाधित करने वाली अनिश्चितकालीन हड़ताल भी करेंगे। इस फै़सले के अनुसार, जिस दिन बिजली (संशोधन) विधेयक 2022 को संसद में पेश किया गया उस दिन बिजली क्षेत्र के श्रमिकों ने पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किये।

एन.सी.सी.ओ.ई.ई.ई. द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, नेशनल कोर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी इंप्लाईज एंड इंजीनियर्स (एन.सी.सी.ओ.ई.ई.ई.) द्वारा दिये गये “कार्य विराम” के आह्वान पर, 27 लाख श्रमिकों में से लगभग 10 लाख श्रमिकों ने विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। हैदराबाद, चेन्नई, त्रिवेंद्रम, बैंगलोर, विजयवाड़ा, लखनऊ, पटियाला, देहरादून, शिमला, जम्मू, श्रीनगर, चंडीगढ़, मुंबई, कोलकाता, पुणे, वडोदरा, रायपुर, जबलपुर, भोपाल, रांची, गुवाहाटी, शिलांग, पटना, भुवनेश्वर, जयपुर और अन्य शहरों में विरोध प्रदर्शनों को आयोजित किये जाने की रिपोर्टें मिली हैं।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी बिजली (संशोधन) विधेयक 2022 के ख़िलाफ़ इस जुझारू विरोध के लिए बिजली क्षेत्र के श्रमिकों को बधाई देती है।

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जम्मू-कश्मीर

बिजली संशोधन विधेयक, 2022 का उद्देश्य बिजली वितरण का निजीकरण करना है। राज्य के स्वामित्व वाली वितरण कंपनियों द्वारा चलाये जा रहे वितरण नेटवर्क के लाभदायक हिस्सों को निजी वितरण इजारेदारों को सौंपकर यह निजीकरण किया जा रहा है। इसका नतीजा होगा कि राज्य के स्वामित्व वाली वितरण कंपनियां दिवालिया हो जायेंगी और फिर उन्हें बंद कर दिया जाएगा। एक बार जब निजी इजारेदारों ने बिजली के वितरण पर अपना वर्चस्व जमा लिया, तो वे बिजली की दरों को अधिकतम स्तर तक बढ़ा देंगे। नतीजन मज़दूरों, किसानों और मेहनतकशों की आबादी और भी ग़रीब होगी।

बिजली संशोधन अधिनियम को केवल बिजली श्रमिकों के विरोध का ही सामना नहीं करना पड़ रहा है बल्कि देश के किसानों के व्यापक विरोध का सामना भी करना पड़ा रहा है। देश के कई राज्यों में उपभोक्ता फोरम भी बनाये गये हैं, जो बिजली वितरण के निजीकरण के विनाशकारी परिणामों के बारे में लोगों को समझाने के लिए बिजली कर्मचारी यूनियनों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

लोगों के सभी वर्गों के व्यापक विरोध के बावजूद, सरकार ने बिजली संशोधन विधेयक 2022 को संसद में पेश किया है। इससे एक बार फिर साफ़ पता चलता है कि कैसे हर सरकार का एजेंडा, इजारेदार पूंजीपतियों के हितों को सुनिश्चित करने के लिए तय किया जाता है, न कि लोगों के हितों की सुरक्षा के लिये।

जब कोई नया विधेयक संसद में पेश किया जाता है, ख़ासकर जब उस पर परस्पर-विरोधी विचारों की अपेक्षा की जाती है, तो उसे स्थायी संसदीय समिति को भेजना एक आम बात है। ऐसी समितियों में आमतौर पर सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों पार्टियों के सांसद होते हैं। ये समितियां हिन्दोस्तानी और विदेशी दोनों पूंजीपतियों के विशेषज्ञों, थिंक-टैंकों और सलाहकारों के साथ बंद कमरे में बैठ कर प्रस्तावित क़ानून की समीक्षा करती हैं।

इस प्रथा का “अभ्यास में वास्तविक संसदीय लोकतंत्र” के रूप में प्रचार किया जाता है, क्योंकि विपक्षी पार्टियों और कई बुर्जुआ-विशेषज्ञों के विचारों को, विधेयक का मसौदा तैयार करने में शामिल किया गया है। हालांकि, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस समीक्षा में मज़दूरों और किसानों के विचारों के लिए कोई जगह नहीं है।

बिजली कर्मचारियों और बिजली वितरण के निजीकरण का विरोध कर रहे लोगों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि विधेयक को संसद की स्थायी समिति के पास भेजने से इजारेदार पूंजीवादी घरानों का एजेंडा नहीं चलेगा। लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान समय में सरकार का विरोध करने वाली कई पार्टियां, बिजली वितरण के निजीकरण के इजारेदार पूंजीपतियों के एजेंडे के लिए प्रतिबद्ध हैं। जब भी वे पार्टियों सत्ता में रही हैं, उन्होंने निजीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाया है।

बिजली क्षेत्र के श्रमिकों को बहुत सतर्क रहना चाहिए, और सभी श्रमिकों और किसानों के साथ अपनी एकता को और भी मजबूत करना चाहिए। उन्हें बिजली वितरण के निजीकरण के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष को और भी अधिक तेज़ करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

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त्रिपुरा

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काठगोदाम तेलंगाना

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मेघालय

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पुणे, महाराष्ट्र

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जम्मू

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नलगोंडा, आंध्रप्रदेश

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