विश्व व्यापार संगठन का 12वां मंत्री स्तरीय सम्मेलन :
सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्तियां विश्व व्यापार के नियम निर्धारित करती हैं

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.) का 12वां मंत्री स्तरीय सम्मेलन 12-17 जून, 2022 को संपन्न हुआ। विश्व व्यापार संगठन का निर्णय लेने वाला सर्वोच्च निकाय मंत्री स्तरीय सम्मेलन है और यह सम्मेलन आमतौर पर हर दो साल में एक बार होता है।

सोवियत संघ के पतन और दुनिया के दो-धु्रवीय विभाजन के अंत के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व में विश्व साम्राज्यवाद द्वारा विश्व व्यापार संगठन की स्थापना की गई थी। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि पेरिस चार्टर के अनुसार, अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके सहयोगियों ने उस समय यह मांग की थी कि सभी देश “मुक्त बाज़ार” के लिए खुद को प्रतिबद्ध करें। यानी उन्हें विदेशी कंपनियों, विदेशी सामानों और विदेशी पूंजी के प्रवेश पर लगे सभी प्रतिबंधों को हटाना होगा। सभी देशों पर उन नीतियों को आगे बढ़ाने का दबाव डाला गया, जो वैश्विक वित्त पूंजी को विश्व अर्थव्यवस्था पर अपना वर्चस्व स्थापित करने की अनुमति दें।

दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक इजारेदार वैश्विक व्यापार पर अपनी दादागिरी स्थापित करने के लिये विश्व व्यापार संगठन का एक साधन बतौर इस्तेमाल करते हैं। विश्व व्यापार संगठन के मंत्रीस्तरीय सम्मेलन, विभिन्न विरोधी शक्तियों के बीच मिलीभगत और विवाद का क्षेत्र रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के समय से ही अमरीका अपने नियंत्रण में एक-धु्रवीय दुनिया बनाने की अपनी तमन्ना को हासिल करने के लिए इस संगठन का इस्तेमाल करने की कोशिश करता रहा है। विश्व व्यापार संगठन ने अमरीका के इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की रक्षा की है। अन्य साम्रज्यवादी शक्तियां – यूरोपीय संघ, चीन, रूस, हिन्दोस्तान, ब्राजील आदि अपने इजारेदार पूंजीपतियों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए लड़ रही हैं। इस हक़ीक़त को याद रखने की ज़रूरत है कि इन वार्ताओं और समझौतों में दुनिया के सभी देशों के मज़दूरों, किसानों और अन्य मेहनतकश लोगों की व्यापक जनता के हितों को हमेशा पैरों तले रौंदा जाता है।

कृषि

विश्व व्यापार संगठन में कृषि सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक रहा है। अमरीका और यूरोपीय संघ कृषि व्यापार की अपनी इजारेदार कंपनियों को सब्सिडी देते हैं ताकि ये कंपनियां दूसरे देशों के बाज़ारों में अपने कृषि उत्पादों का बेहद कम क़ीमत पर ढेर लगा सकें और उन देशों के बाज़ारों पर कब्ज़ा कर सकें।

अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अमरीका और यूरोपीय संघ, दुनिया के कम विकसित देशों पर डाल रहे हैं कि वे कृषि उपज और किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी के आयात शुल्क को कम करें।

इस सम्मेलन के दौरान भी कृषि व्यापार से जुड़े विषयों पर बातचीत हुई।

हिन्दोस्तान कृषि उत्पादों के व्यापार में विश्व स्तर पर एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभर रहा है। हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपति जो कृषि व्यापार से जुड़े हैं, घरेलू बाज़ार और विश्व बाज़ार दोनों में, अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल करना चाहते हैं। विश्व व्यापार संगठन की वार्ता में हिन्दोस्तानी प्रतिनिधि के रुख़ को समझते समय इस हक़ीक़त को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

विश्व व्यापार संगठन की बातचीत के दौरान हिन्दोस्तानी प्रतिनिधि ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी सार्वजनिक ख़रीद नीति का बचाव किया, जिसे डब्ल्यू.टी.ओ. में सब्सिडी माना जाता है। वर्तमान में हिन्दोस्तान विश्व व्यापार संगठन के सब्सिडी बिल कृषि समझौते (ए.ओ.ए.) द्वारा निर्धारित की गई अधिकतम सीमा (उसके कुल उत्पादन का 10 प्रतिशत) का उल्लंघन कर रहा है। यह अमरीका और यूरोपीय संघ को स्वीकार नहीं है। अपने सार्वजनिक खाद्य भंडार (जिसे सरकार द्वारा समर्थन मूल्य देकर कृषि उत्पादों को सीधे किसानों से ख़रीदा जाता है इसलिए इसे सब्सिडी माना जाता है) से खाद्य निर्यात करने की अनुमति देने की हिन्दोस्तान की मांग को 2023 में होने वाले अगले मंत्रीस्तरीय सम्मेलन के लिए टाल दिया गया।

ई-कॉमर्स लेनदेन

हिन्दोस्तान और दक्षिण अफ्रीका ने ई-कॉमर्स लेनदेन पर सीमा शुल्क पर रोक लगाने वाले समझौते की अवधि को बढ़ाने का विरोध किया था। ई-कॉमर्स लेनदेन पर सीमा शुल्क की हिन्दोस्तान की मांग, हिन्दोस्तानी ई-कॉमर्स कंपनियों के हितों में की जाने वाली एक मांग है जो घरेलू बाज़ार पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहती हैं। हिन्दोस्तानी प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि इस समझौते के कारण 2017-2020 के बीच विकासशील देशों ने केवल 49 डिजिटल उत्पादों से ही आयात पर लगभग 4 लाख करोड़ रुपए का संभावित राजस्व खो दिया।

विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों ने पहली बार 1998 में अमरीकी ई-कॉमर्स इजारेदार कंपनियों के हित में, इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन पर कस्टम शुल्क नहीं लगाने पर सहमति व्यक्त की थी। इन ई-कॉमर्स इजारेदार कंपनियों के मुनाफे़ सुनिश्चित करने के लिए तब से आज तक, समय-समय पर इस समझौते की अवधि के समाप्त होने से पहले एक और समझौते के द्वारा इस अवधि को लगातार बढ़ाया जाता रहा है। विभिन्न देशों के काफी विरोध के बावजूद, इस सम्मेलन में यह सहमति हुई कि ई-कॉमर्स लेनदेन पर लगने वाले सीमा शुल्क पर यह रोक 2023 में होने वाले अगले सम्मेलन तक जारी रहेगी। इससे ई-कॉमर्स के दिग्गजों को फ़ायदा होगा जो आज वैश्विक ई-कॉमर्स के व्यापार पर हावी हैं। इस समय कस्टम शुल्क पर रोक लगाने के समझौते की अवधि 31 मार्च, 2024 को समाप्त होने वाली है, यदि इस समझौते का एक बार फिर से नवीनीकरण नहीं किया गया तो।

कोविड-19 वैक्सीन उत्पादन

हिन्दोस्तान और दक्षिण अफ्रीका ने अक्तूबर 2020 में एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें टीकों, दवाइयों और औषधीय उत्पादों के उत्पादन पर बौद्धिक संपदा अधिकारों (आई.पी.आर.) के कार्यान्वयन, आवेदन और प्रवर्तन से अस्थायी छूट की मांग की गई थी। प्रस्ताव में तर्क पेश किया गया था कि इस तरह के आई.पी.आर. के कारण दुनिया के आम लोग आवश्यक टीकों और दवाइयों की पहुंच से वंचित हो जायेंगे क्योंकि ये टीके और दवाइयां उनकी खरीदने की हैसियत से बाहर होंगे। इस प्रस्ताव को विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता के लगभग 2/3 सदस्यों का समर्थन प्राप्त था।

इस बैठक में हिन्दोस्तान अपने प्रस्ताव ज़रिये, हिन्दोस्तानी दवा कंपनियों और टीके बनाने वाली कंपनियों की मांगों को उठा रहा था। यह ध्यान में रखना चाहिए कि हिन्दोस्तानी दवा कंपनियों ने विशाल घरेलू बाजार के अलावा अफ्रीका और दुनिया के कुछ अन्य क्षेत्रों में अपने लिए एक बड़ा बाजार स्थापित कर लिया है। हिन्दोस्तान की टीका बनाने वाली कंपनियां, दुनिया की कुछ सबसे बड़ी टीका निर्माता बन गई हैं। उन्होंने कोविड संकट के दौरान टीकों के उत्पादन से भारी मुनाफ़ा कमाया है।

हालांकि, हिन्दोस्तानी कंपनियों के पास कोविड के टीके का या कोविड के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं का या अन्य दवा सामग्री के लिए कोई ही पेटेंट नहीं है। यह फार्मा उद्योग से जुड़े हुये हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों के हित में है कि वे कोविड से संबंधित टीकों और दवाओं पर बौद्धिक संपदा अधिकारों की छूट की मांग करें।

जैसा कि अपेक्षित था, अमरीका और यूरोपीय फार्मा इजारेदारों ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया था। इस बातचीत के दौरान अमरीका और यूरोपीय संघ के देशों के लिए गए क़दमों से यह साफ़ देखने को आया।

बहुत ही गहन चर्चा के बाद, विश्व व्यापार संगठन के सदस्य अंततः 5 साल के लिए कोविड-19 के टीकों के पेटेंट पर बौद्धिक संपदा अधिकारों को अस्थायी रूप से माफ़ करने पर सहमत हुए। यह छूट कोविड रोगियों के इलाज के लिए आवश्यक दवाओं पर लागू नहीं है। यह केवल टीकों के लिए ही लागू है।

“हानिकारक” मछली पालन सब्सिडी पर सीमाएं निर्धारित करना

विश्व व्यापार संगठन ने एक बहुपक्षीय समझौता पारित किया, यह समझौता वैश्विक मछली स्टॉक की रक्षा के लिए, अगले 4 वर्षों के लिए अवैध, असूचित और अनियमित मछली पकड़ने पर “हानिकारक” सब्सिडी पर अंकुश लगाएगा। 2001 से अत्यधिक मछली पकड़ने को बढ़ावा देने वाली सब्सिडी पर प्रतिबंध लगाने के लिए बातचीत चल रही है। ओवरफिशिंग से तात्पर्य उन मछलियों का तेज़ी से दोहन करने से है, जो अपनी संख्या को खुद को फिर से बढ़ाने में असमर्थ हैं (वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार इस संख्या की सीमा कुल संख्या का 34 प्रतिषत है)।

अमरीका, यूरोपीय संघ, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि की मछली पकड़ने वाली विशाल कंपनियां, दुनिया के महासागरों में चारों ओर घूमती हैं और विभिन्न देशों के विशेष आर्थिक क्षेत्रों में मछली पकड़ने का काम करती हैं। ये कंपनियां ओवरफिशिंग के लिए ज़िम्मेदार हैं। हालांकि ये कंपनियां खुलेआम ऐसा करने में सक्षम हैं क्योंकि उन्हें अपनी सरकारों का समर्थन प्राप्त है। हमेशा से विश्व व्यापार संगठन में “ओवरफिशिंग” के ख़िलाफ़ अभियान का पूरा लक्ष्य विभिन्न देशों के छोटे मछुआरे रहे हैं।

मछुआरों के हितों के लिए लड़ने का मुद्दा हिन्दोस्तान के लिए महत्वपूर्ण है। एक तरफ छोटे मछुआरों के हित हैं तो दूसरी तरफ मछली पकड़ने के आधुनिक तरीक़ों का इस्तेमाल करने वाली बड़ी हिन्दोस्तानी कंपनियों के हित हैं। हिन्दोस्तान ने कई अन्य देशों के साथ मिलकर प्रस्ताव के उस खंड का विरोध किया जिसमें छोटे स्तर पर मछली पकड़ने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को लेकर धमकी दी गई थी। इन देशों ने तर्क पेश किया कि अमरीका, यूरोपीय संघ, जापान और अन्य देशों को गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के लिए बड़े निगमों को दी जाने वाली सब्सिडी में कटौती करनी चाहिए।

हिन्दोस्तान ने सब्सिडी हटाने के लिए दो साल की संक्रमण अवधि को स्वीकार कर लिया है। समझौता हिन्दोस्तान को इस तरह की सब्सिडी देने की अनुमति देता है जब तक कि मछली पकड़ने का काम, उसके विशेष आर्थिक क्षेत्र (ई.ई.जेड.) में होता है।

निष्कर्ष

विश्व व्यापार संगठन के 12वें मंत्री स्तरीय सम्मेलन ने यह खुलासा किया कि कैसे दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक इजारेदारों के हित में ही विश्व व्यापार के नियम निर्धारित किये जाते हैं। अमरीका, यूरोपीय संघ के देशों, जापान, चीन आदि के प्रतिनिधियों ने अपने देशों के इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की सुरक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। हिन्दोस्तानी सरकार के प्रतिनिधिमंडल ने भी ऐसा ही किया। इन देशों के प्रतिनिधियों ने एक दूसरे के साथ मिलीभगत की और साथ ही साथ लड़ाई भी लड़ी, परन्तु इन समझौतों में सभी देशों के मज़दूरों और किसानों के हितों को नुक़सान ही है।

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू.टी.ओ.)

जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ एंड ट्रेड (जी.ए.टी.टी., जिसको गैट के नाम से जाना जाता है) को बदलने के लिए कई वार्ताओं के बाद, डब्ल्यू.टी.ओ., आधिकारिक तौर, पर 1 जनवरी, 1995 को मराक्कश समझौते के तहत शुरू हुआ, जिसे 15 अप्रैल 1994 को 123 देशों द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था।

जबकि गैट मुख्य रूप से वस्तुओं के व्यापार से संबंधित था, विश्व व्यापार संगठन और इन समझौतों में, सेवाओं और बौद्धिक संपदा में व्यापार संबंधित समझौते भी शामिल किये गये हैं। विश्व व्यापार संगठन के जन्म ने विवादों के निपटारे के लिए नई प्रक्रियाओं का भी निर्माण किया। इस समय दुनिया के 164 देश विश्व व्यापार संगठन के सदस्य हैं।

विश्व व्यापार संगठन के सभी सदस्य देशों के लिए छह समझौते बाध्यकारी हैं।

  1. विश्व व्यापार संगठन की स्थापना करने वाला समझौता
  2. माल और निवेश – गैट 1994 और व्यापार से संबंधित निवेश उपायों सहित माल के व्यापार से संबंधित बहुपक्षीय समझौते
  3. सेवाएं – सेवाओं में व्यापार पर सामान्य समझौता
  4. बौद्धिक संपदा – बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधित पहलुओं पर समझौता (ट्रिप्स)
  5. विवाद-निपटाने से संबंधित उपाय (डी.एस.यू.)
  6. सरकार की व्यापार नीतियों की समीक्षा (टी.पी.आर.एम.)

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