मैड्रिड में नाटो का शिखर सम्मेलन:
एक विस्तारवादी जंग-भड़काऊ एजेंडे की घोषणा

अमरीका के नेतृत्व वाले उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का एक शिखर सम्मेलन 28-30 जून के बीच मैड्रिड, स्पेन में आयोजित किया गया। मैड्रिड में नाटो का शिखर सम्मेलन, स्पेन के इस अंतरराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन में शामिल होने की 40वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया गया था जिसमें यूरोप और उत्तरी अमरीका के 30 सदस्य देश शामिल हैं। नाटो की स्थापना, द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद, 4 अप्रैल 1949 को, उत्तरी अटलांटिक संधि पर हस्ताक्षर करने के साथ हुई थी। यह संगठन, अमरीकी साम्राज्यवाद के हाथ में, एक हथियार के रूप में, यूरोप पर अपना सैन्य प्रभुत्व स्थापित करने और सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के पीपुल्स डेमोक्रेसी के देशों को आतंकित करने के लिए बनाया गया था।

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1990 के दशक के बाद नाटो का विस्तार

मैड्रिड शिखर सम्मेलन में, स्पष्ट रूप से, अमरीकी साम्राज्यवादियों और नाटो के सदस्य देशों के इस गठबंधन की हमलावर गतिविधियों के दायरे को और व्यापक बनाने की रणनीति प्रस्तुत की गयी। नाटो के नेता, अपनी पूर्वी सीमाओं पर जंग-समूहों को मजबूत करने और बढ़ाने के लिए सहमत हुए। जंग-समूह, एक प्रकार से, जंग के लिए तैयार बटालियन है जिन्हें युद्ध के लिए किसी भी समय तैनात किया जा सकता है। इन बटालियनों में, नाटो के कई सदस्य देशों के सैनिक हैं। नाटो के शिखर सम्मेलन ने, जंग के लिए तैयार सुरक्षा-बलों की संख्या 40,000 से बढ़ाकर 3,00,000 से अधिक करने का भी निर्णय लिया। ये सैनिक, अपने-अपने देशों में तैनात होंगे। वे पूर्वी यूरोप के कुछ चुने हुए देशों में जाने के लिए तैयार रहेंगे, जिन देशों में, नाटो की योजना, जंग के हथियारों और गोला-बारूद के भंडार निर्माण करने की है। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि नाटो, तेजी से यह सुनिश्चित कर रहा है कि यूक्रेन में विवाद, अनिश्चित काल तक जारी रहे और इसका समाधान न हो।

मैड्रिड शिखर सम्मेलन के दौरान, रूस और चीन का मुकाबला करने के लिए नाटो को एक हमलावर-गुट के रूप में तैयार करने पर ज़ोर दिया गया। इस दिशा में, नाटो ने, पहली बार, अपने शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के नेताओं को भी आमंत्रित किया। इसके अलावा, शिखर सम्मेलन ने नाटो के, ‘‘न्यू स्ट्रेटजिक कॉन्सेप्ट (नई रणनीतिक धारणा)’’ को भी मंजूरी दी, जो अगले दशक के लिए, उनकी रणनीति का एक खाका है। यह खाका, नाटो की सुरक्षा के लिए ‘‘सबसे महत्वपूर्ण और प्रत्यक्ष ख़तरे’’ के रूप में, रूस को हराने के लिए, एक योजनाबद्ध तरीके से नाटो को तैयार करने का आहवान करता है। यह न्यू स्ट्रेटेजिक कॉन्सेप्ट, चीन पर भी ‘‘व्यवस्थागत चुनौतियां’’ खड़ी करने का आरोप लगाता है।

पूर्वी यूरोप में नाटो का विस्तार न करने के, रूस के साथ पहले किये गए समझौतों का उल्लंघन करते हुए, अमरीका एक योजनाबद्ध तरीके से नाटो का पूर्वी यूरोप के देशों में विस्तार कर रहा है। रूस की पश्चिमी सीमा पर, हजारों नाटो के सैनिक तैनात हैं, जिससे रूस की अपनी सुरक्षा के लिए, गंभीर ख़तरा पैदा हो गया है। नाटो ने यह भी स्पष्ट किया कि वह फिनलैंड और स्वीडन को गठबंधन में शामिल होने के लिए आमंत्रित करके इस विस्तार करने की योजना को जारी रखना चाहता है। यह रूस की सुरक्षा के लिए एक और भड़काऊ कदम है।

शिखर सम्मेलन ने, नाटो नवाचार कोष को भी लॉन्च किया, जो सैन्य उपयोग के लिए एक अरब यूरो (105 करोड़ अमरीकी डॉलर) का निवेश करेगा। यूक्रेन में जारी युद्ध के बाद, इन देशों के लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध के बावजूद, नाटो सदस्य देशों द्वारा, सेना पर और अधिक खर्च करने की प्रतिबद्धता बढ़ रही है। लोग मांग कर रहे हैं कि भोजन, ईंधन और स्वास्थ्य के लिए जरूरी सार्वजनिक धन को सैन्य-खर्च के लिए न लगाया जाए। हालांकि, अमरीका और अन्य नाटो सदस्य देशों के नेताओं ने, यूरोप के लोगों की सुरक्षा बढ़ाने के बहाने, सेना पर और भी अधिक खर्च करने के लिए अपना इरादा स्पष्ट किया है। राष्ट्रपति जो बाइडन ने, यूरोप में अमरीका की सैन्य-उपस्थिति में भारी वृद्धि की घोषणा की, जिसमें पोलैंड में एक स्थायी अमरीकी बेस, रोटा, स्पेन में स्थित दो और नौसेना विध्वंसक युद्धपोत और ब्रिटेन में दो और एफ-35 स्क्वाड्रन तैनात करने की योजनायें शामिल हैं।

इस हक़ीक़त पर गौर करने की जरूरत है कि अप्रैल 2022 में, अमरीकी संसद (हाऊस ऑफ रिप्रेसेन्टेटिव्स) ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें राष्ट्रपति जो बाइडन को ‘‘नाटो के सदस्य, भागीदार और इच्छुक देशों में, लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करने’’ पर जोर देने के लिए कहा गया था। इस प्रस्ताव ने, अमरीका की, यूरोप पर अपना प्रभुत्व और नियंत्रण मज़बूत करने की दिशा को स्पष्ट किया। ‘‘लोकतांत्रिक सिद्धांतों’’ की बातों के बहाने, नाटो को राजनीतिक और सैन्य रूप से और अधिक हमलावर बनाया जायगा। ‘‘सांझे लोकतांत्रिक मूल्यों’’ को मजबूत करने के दावे को रूस, चीन और एशिया के अन्य देशों पर अमरीकी दादागिरी को थोपने के सभी क़दमों को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। इसका इस्तेमाल, सदस्य देशों के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी के लिए भी किया जाएगा।

मैड्रिड शिखर सम्मेलन का समापन करते हुए, नाटो ने एक और चेतावनी भी जारी की कि दुनिया ‘‘बड़ी शक्तियों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा और असंख्य खतरों के एक तबाहकारी चरण’’ में पहुंच गई है। लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि इस नाटो गठबंधन के, लगातार, जंग को बढ़ावा देने वाली हमलावर कोशिशों ने ही, इन ख़तरनाक हालातों को जन्म दिया है। नाटो और उसकी गतिविधियां, दुनिया में शांति के खि़लाफ़ ख़तरे को और भी बढ़ावा देती हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी और उनके नाटो सहयोगी, यह चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि राष्ट्रों के आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए वे कैसे वचनबद्ध हैं, और वे कैसे अन्य देशों और लोगों की संप्रभुता का सम्मान करते हैं। यह एक साफ़ सफेद झूठ है। अमरीका और उसके नाटो सहयोगियों ने, लगातार उन देशों और लोगों की संप्रभुता को बेरहमी से कुचला है जो अपने पसंद के आर्थिक और राजनीतिक रास्ते पर आगे बढ़ना चाहते हैं।

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