विश्वव्यापी खाद्य-संकट के लिए क्या और कौन ज़िम्मेदार है?

2022 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा खाद्यसंकट पर प्रकाशित हुई इस वैश्विकरिपोर्ट (जी.आर.एफ.सी.) के अनुसार, 2021 में 53 देशों के लगभग 20 करोड़ लोगों को खाना भी नसीब नहीं हो पाया। वे भूखे मरने को मजबूर थे। पिछले साल की तुलना में, इन दर्दनाक हालतों से जूझने वालों की श्रेणी में लगभग 4 करोड़ लोग और शामिल हो गये हैं। इसका मतलब है कि पिछले साल दुनियाभर में भूखा रहने वाले लोगों की संख्या में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

सितंबर 2021 में वैश्विक खाद्यक़ीमतें, उससे एक साल पहले की तुलना में, लगभग 33 प्रतिशत बढ़ गई। खाद्य और कृषि संगठन (एफ...) के खाद्यमूल्य सूचकांक के अनुसार, तब से अब तक खाद्यक़ीमतों में 40 प्रतिशत की और बढ़ोतरी हुई है।

लगभग सभी देशों में ग़रीब और बेरोज़गार मज़दूरों का दैनिक भोजन उनकी पहुंच से बाहर हो गया है और कई ग़रीब देशों में बहुसंख्य आबादी के लिए दैनिक भोजन जुटाना उनकी हैसियत से बाहर हो गया है।

बढ़ती भुखमरी के मूलभूत कारण क्या हैं?

खाद्यसंकट के लिए ज़िम्मेदार बताये जा रहे कारण हैं कोरोना वायरस के चलते लगाये गये लॉकडाउन, ग्लोबल वार्मिंग और यूक्रेन में चल रहा युद्ध। सबसे महत्वपूर्ण और अंतर्निहित कारण है विशाल इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों का खाद्यआपूर्ति के तरीक़ों पर पूरा वर्चस्व और नियंत्रण। इस तथ्य को संयुक्त राष्ट्र संघ या अंतरराष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग की अन्य संस्थाओं के किसी भी दस्तावेज़ में जानबूझकर उजागर नहीं किया गया है।

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चित्र ए : गेंहू की अंतराष्ट्रीय कीमतें (अमरीकी डॉलर प्रति बुशेल )

गेहूं का उदाहरण हमारे सामने है। गेहूं की अंतरराष्ट्रीय क़ीमत में तेज़ी से बढ़ोतरी 2020 में ही होनी शुरू हो गई थी (चित्र ए)। युद्ध शुरू होने से पहले ही, यूक्रेन और रूस से निर्यात होने वाले गेहूं के परिवहन में रुकावट पैदा होने लगी थी और गेहूं की क़ीमतें बढ़नी शुरू हो गयी थीं।

हालांकि 2021 में कुछ देशों में प्रतिकूल मौसम की हालतों के कारण गेहूं का उत्पादन प्रभावित हुआ था, लेकिन उस वर्ष आपूर्ति की गंभीर कमी नहीं हुई। फिर भी गेहूं की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ती रहीं। इस अजीब पहेली की कुंजी दुनिया की इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों की मुनाफ़ाखोरी की गतिविधियों में निहित है, जो खाद्य बाज़ार पर हावी हैं।

हर बार, जब किसी भी कारण, ख़राब मौसम के झटके के कारण या महामारी के कारण या युद्ध की वजह से आपूर्ति में बाधा के कारण, खाद्य फ़सल की क़ीमत बढ़ती है, तब निजी कंपनियां इसका फ़ायदा उठाकर, अपने मुनाफ़े को अधिकतम करने के लिए जमाखोरी करके उस कमी को और भी बढ़ा देती हैं।

पिछले तीन से चार दशकों में, वैश्विकखाद्य बाज़ार में केवल कुछ मुटठीभर बहुअरब डॉलर वाली कंपनियां हावी हो गई हैं।

1990 के दशक में, संयुक्त राज्य अमरीका में खाद्य आपूर्ति सहित खुदराव्यापार में संकेंद्रीकरण और इजारेदारी की हद, एक अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई थी। मज़दूर वर्ग के परिवारों द्वारा नियमित रूप से ख़रीदी जाने वाली लगभग सभी किराने की वस्तुओं के बाज़ार पर, मुट्ठीभर शक्तिशाली इजारेदार कंपनियों ने अपना नियंत्रण हासिल कर लिया था। वॉलमार्ट जैसी खुदरा व्यापार की विशाल कंपनियों ने अपनी मनमानी से, किसी भी आपूर्तिकर्ता से सामान ख़रीदने की क़ीमतों को तय करना शुरू कर दिया। खुदरा व्यापार की इन विशाल कंपनियों की हैसियत, शक्ति और मुनाफ़े का अभूतपूर्व विस्तार 1980 और 1990 के दशकों में हुआ। उन्होंने विश्व स्तर पर अपनी ताक़त का विस्तार किया, उन्होंने विभिन्न देशों में अपनी खुद की आपूर्तिश्रृंखला की स्थापना की। यूरोपीय देशों की बड़ी इजारेदार, कृषिव्यवसाय से जुड़ी कंपनियां और खुदरा व्यापार की विशाल कंपनियां भी विश्व खाद्य स्टॉक और बिक्री पर, अपना नियंत्रण हासिल करने की इजारेदार कंपनियों की होड़ में शामिल हो गईं।

1995 में कृषि के विषय को विश्व व्यापार संगठन की वार्ता में शामिल किया गया था। एक “मुक्त बाज़ार” को बढ़ावा देने की आड़ में, अमरीकी नेतृत्व वाले साम्राज्यवादी राज्यों के गुट ने अन्य सभी सदस्य राज्यों के लिए नियम निर्धारित किए। उन्होंने किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी की राशि की एक सीमा की घोषणा की (हालांकि इस सीमा का अमरीका ने खुद खुलेआम उल्लंघन किया)। खाद्य पदार्थों पर आयात शुल्क की दर पर भी एक सीमा लगाई गई थी। यहां तक कि विश्व व्यापार संगठन ने सदस्य राज्यों की सरकारों द्वारा रखे जा रहे खाद्य भंडार की मात्रा पर भी प्रतिबंध लगा दिया।

विश्व के अधिकांश देशों के लोगों के भारी विरोध के बावजूद, विश्व व्यापार संगठन और दुनियाभर की अधिकांश सरकारों ने कृषि व्यापारउदारीकरण के एजेंडे को लागू किया। इसके चलते, विशाल इजारेदार पूंजीवादी निगमों के विस्तार का मार्ग खुल गया, न केवल बीज, कीटनाशकों और कृषि से जुड़ी अन्य लागत की वस्तुओं की आपूर्ति में, बल्कि विश्व स्तर पर खाद्य और पैकेज्ड खाद्य उत्पादों की ख़रीद, भंडारण और बिक्री में भी इन इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों का वर्चस्व क़ायम किया गया।

कृषि व्यापार के उदारीकरण ने सट्टामुनाफ़ाखोरी या कृषि व्यापार में ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़े बनाने के लिए सट्टा बाज़ारी करने की संभावनाओं का भी विस्तार किया है। अंतरराष्ट्रीय उपयोगीवस्तुओं के बाज़ारों, हाजिर बाज़ार (स्पॉट मार्किट) और वायदाबाज़ार दोनों में, अनाज, तिलहन और चीनी की सट्टा बाज़ारी, सट्टामुनाफ़ा कमाने के लिए किया जाता है। इस तरह के सट्टामुनाफ़ा कमाने के लिए इन इजारेदार कंपनियों को सभी उपाय मुहैया कराये जाने की वजह से, खाद्यवस्तुओं की क़ीमतों में उतारचढ़ाव और भी बढ़ रहा है।

जहां करोड़ों लोग भूख से मर रहे हैं, वहीं बड़ी इजारेदार पूंजीवादी कंपनियां और वित्तीय सट्टेबाजों की संस्थाएं भारी मुनाफ़ा कमा रही हैं। यूक्रेन में युद्ध के बहाने, उर्वरक, बीज और रसायनों की क़ीमतों की वृद्धि को जायज़ ठहराया गया है। अंतर्राष्ट्रीय तेल कंपनियों ने, रूसी तेल पर अमरीकी और नाटो प्रतिबंधों का इस्तेमाल करके, तेल की क़ीमतों में भारी बढ़ोतरी को सही ठहराया है, भले ही रूसी तेल का निर्यात जारी है।

हिन्दोस्तान में भुखमरी

हिन्दोस्तान उन देशों में से एक है जहां सबसे ज्यादा भूखे और कुपोषित लोग रहते हैं।

अधिकांश हिन्दोस्तानी एक स्वस्थ इंसान के लायक पर्याप्त भोजन जुटा पाने का खर्च नहीं उठा सकते हैं। हर साल लाखों लोग सीधे तौर पर अपोषितभोजन से जुड़ी बीमारियों के कारण मर जाते हैं। “स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2022: इन फिगर्स” (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट द्वारा प्रकाशित एक सांख्यिकीय संग्रह) की रिपोर्ट के अनुसार, 71 प्रतिशत हिन्दोस्तानी एक स्वस्थ इंसान के लायक पर्याप्त भोजन जुटा पाने का खर्च नहीं उठा सकते हैं। पूरे विश्व की भुखमरी से त्रस्त जनसंख्या के 42 प्रतिशत के आंकड़े से यह बहुत अधिक है।

उपयुक्त आहार के आम लोगों की पहुंच से बाहर होने की हक़ीक़त के लिए, हाल के वर्षों में अभूतपूर्व खाद्यमूल्यमुद्रास्फीति को मुख्य रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। पिछले एक साल में अनाज, खाद्य तेल, सब्जियां, मांस और अंडे की क़ीमतें आसमान छू गई हैं। ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में अधिक से अधिक लोग आवश्यक पोषण हासिल करने में असमर्थ हैं।

पिछले तीन दशकों में, सरकारों ने लगातार, अंदरूनी और विदेश व्यापार के उदारीकरण के कार्यक्रम को लागू किया है। यह हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों का एजेंडा है, जो हिन्दोस्तानी कृषि और खाद्य भंडार में अपनी और अधिक पैठ और नियंत्रण हासिल करने के लिए बेहद उत्सुक हैं।

1960 और 1970 के दशक में निर्मित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पी.डी.एस.), कम से कम उन लोगों के लिए जो भूख से पीड़ित थे, खाद्यान्न की अधिकांश आवश्यकता को पूरा करती थी। उदारीकरण के एजेंडा के लागू होने के बाद, पी.डी.एस. को जानबूझकर उपेक्षित और बर्बाद कर दिया गया है। ग़रीब लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है, उनमें से अनेकों को भुखमरी और कम आयु में मृत्यु की ओर धकेला जा रहा है।

निष्कर्ष

इस 21वीं सदी में विश्व में खाद्य संकट को रोकने में मानव समाज के असमर्थ होने का मुख्य कारण यह है कि इजारेदार पूंजीपति, जो भोजन को अपने अधिकतम मुनाफ़े बनाने का स्रोत मानते हैं, उन्होंने इसके भंडारण और वितरण पर अपना नियंत्रण हासिल कर लिया है। इजारेदार पूंजीपति, मज़दूरों के अत्यधिक शोषण, किसानों और अन्य छोटे उत्पादकों की लूट, प्राकृतिक संसाधनों की लूट और उपभोक्ता ऋण, निजी बीमा और अन्य माध्यमों से सभी मेहनतकश लोगों की जबरन वसूली के ज़रिये, भारी मुनाफा कमाते हैं। वे खाद्य पदार्थों की हर अस्थायी कमी का फ़ायदा उठाते हैं ताकि इस कमी को एक विश्वसंकट में बदल दिया जा सके और उनके मुनाफ़ों में अत्यधिक वृद्धि हो सके ।

पूंजीवादीसाम्राज्यवादी व्यवस्था को ख़त्म करके ही, भूख और भुखमरी को ख़त्म किया जा सकता है। हमारे देश में हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के आधिपत्य और नियंत्रण की बजाय, खाद्यपदार्थों की ख़रीद, भंडारण और वितरण पर देश के मज़दूरों और किसानों का नियंत्रण होना चाहिए। हम जो मेहनत करते हैं और समाज की सारी दौलत पैदा करते हैं, हमें हिन्दोस्तान के भविष्य को अपने हाथों में लेने की सख्त ज़रूरत है। हमें अपने देश को अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवादी व्यवस्था से बाहर निकालने की ज़रूरत है और उसे सही मायने में आत्मनिर्भर, समाजवादी अर्थव्यवस्था के निर्माण के रास्ते पर ले जाने की सख़्त ज़रूरत है। तभी हम भूख और कुपोषण से स्थायी रूप से मुक्त हो सकते हैं।

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