सेना में भर्ती के लिए अग्निपथ योजना के ख़िलाफ़ व्यापक विरोध :
बेरोज़गार युवाओं का गुस्सा बिल्कुल जायज़ है

सेना में भर्ती होने की इच्छा रखने वाले लाखों बेरोज़गार युवा, देश के कई हिस्सों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के लिये सड़कों पर उतर आए हैं। वे सेना में युवाओं की भर्ती के लिए, केंद्र सरकार द्वारा 14 जून को घोषित की गई अग्निपथ नामक एक नई योजना के खि़लाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

अब तक सेना में भर्ती किये गए नए लोगों को उनकी सेवा की अवधि पूरी हो जाने के बाद सेवानिवृत्त होने पर, उनके लिये पेंशन और अन्य सुविधायें सुनिश्चित की जाती थीं। अग्निपथ की इस नई योजना के तहत भर्ती होने वाले युवाओं को नियमित और दीर्घकालीन रोज़गार की जगह पर 4 साल की निश्चित अवधि के लिए रोज़गार दिया जाएगा। उन्हें पेंशन या अन्य सुविधाएं नहीं मिलेंगी। सरकार ने घोषणा की है कि वह 2022-23 में 46,000 अग्निवीरों की नियुक्ति करेगी। चार साल के बाद इनमें से एक चैथाई को सेना में नियमित सैनिक के रूप में भर्ती किया जाएगा, जबकि बाकी के तीनचैथाई, फिर से बेरोज़गारों की सेना में दाखिल हो जायेंगे। उन्हें एक बार दी जाने वाली राशि के रूप में, एक विच्छेदपैकेज (सेवरेंस पेकेज) दिया जाएगा जो 11 लाख रुपये तक हो सकता है। वे किसी भी पेंशन के हक़दार नहीं होंगे।

यह नई योजना 17.5 से 21 वर्ष की आयु के युवाओं की भर्ती के लिए बनाई गई है। केवल वर्तमान साल के लिए ही एक रियायत बतौर, 17.5 से 23 वर्ष की आयु के युवाओं की भर्ती की अनुमति दी गई है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि पिछले दो साल, 2020 और 2021 के दौरान लॉकडाउन लगने के कारण भर्ती रुकी हुई थी।

शासक वर्ग के प्रवक्ता दावा कर रहे हैं कि अग्निपथ योजना का उद्देश्य है सेना, नौसेना और वायु सेना को “युवा और बेहतर” बनाना। हालांकि जिस उम्र में अग्निवीरों की भर्ती की जा रही है, वह उस उम्र से अलग नहीं है जिस उम्र में 2019 तक नियमित भर्तियां हो रही थीं। नियमित भर्ती को 4 साल के अनुबंध में बदलने की क्या आवश्यकता थी? इस बदलाव का सेना की उम्र से कोई लेनादेना नहीं है। यह योजना सरकारी बजट से सैनिकों की पेंशन पर खर्च की जाने वाली राशि की बचत करने के उद्देश्य से प्रेरित है।

केंद्र सरकार वर्तमान सैनिकों को दिये जाने वाले वेतन को और सेवानिवृत्त सैनिकों को दी जाने वाली पेंशन को खर्च के एक बोझ के रूप में देखती है। यह पूंजीपतियों के दृष्टिकोण के अनुरूप है, जो अपने मुनाफ़े को अधिकतम करने के लिए काम पर रखे गये श्रमिकों को दी जाने वाली मज़दूरी को “लागत” के रूप में देखते हैं।

गौरतलब है कि जहां एक तरफ, प्रधानमंत्री और अन्य केंद्रीय मंत्री “हमारी सीमाओं की रक्षा करने वाले बहादुर जवानों” के बारे में समयसमय पर अपने मीठेशब्दों के ज़रिये उन्हें बहलाने की कोशिश करते रहते हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार ने सेवानिवृत्त सैनिकों को दी जाने वाली पेंशन के बोझ को कम करने के लिए यह योजना तैयार की है।

सेना में नियमित भर्ती की दिशा में युवाओं ने चयन के कई चरण पार लिये हैं और वे इस बात से बेहद नाराज़ हैं कि भर्ती के नियम अचानक बदल दिए गए हैं। यह उसी तरह का अनुभव है कि बहुत लंबे समय तक, लाइन में खड़े रहने के बाद, जब काउंटर पर पहुंचते हैं तो हमसे कहा जाता है कि आपको लाइन में वापस पीछे जाना है और एक बार फिर से शुरू करना है।

पूंजीपतियों और सरकार के प्रवक्ता कुछ हिंसक घटनाओं को उजागर कर रहे हैं जैसे कि बसों को जलाना और अन्य सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करना, यह सब बड़े पैमाने पर हो रहे युवाओं के विरोध प्रदर्शनों के बीच हुआ है। सेना के प्रमुखों ने घोषणा की है कि जो कोई भी इन विरोध प्रदर्शनों में भाग लेंगे, उन्हें सेना में भर्ती नहीं किया जाएगा।

राज्य के अधिकारियों की यह एक जानीमानी कार्यप्रणाली है कि विरोध करने वाले लोगों को बदनाम करने और उन्हें क्रूरता से बलपूर्वक कुचलने का औचित्य साबित करने के लिए, विरोध प्रदर्शनों में बड़े पैमाने पर अपने एजेंटों के ज़रिये हिंसा, अराजकता और उकसावा आयोजित करना। पहले बसों और ट्रेनों को जला दिया जाता है और फिर विरोध प्रदर्शनों को बदनाम करने के लिये और विरोध करने वालों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देने के लिए, इस हक़ीक़त का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह की वारदातें लोगों के ध्यान को वास्तविक समस्या से हटाने का काम भी करती हैं। इस मामले में असली समस्या युवाओं में भारी बेरोज़गारी और सीमित नौकरी के अवसरों की बिगड़ती गुणवत्ता है।

समाज की प्रगति के लिए यह आवश्यक है कि सभी युवा महिलाओं और पुरुषों को, जो कि काम करने में सक्षम हैं, उन्हें उचित नौकरियां मुहैया कराई जाएं। ताकि वे अपनी मेहनत से समाज की प्रगति में अपना योगदान दे सकें। समाज का विस्तरित पुनरुत्पादन सुनिश्चित करने के लिये, मेहनतकश लोगों को सुरक्षित रोज़गार और नियमित वेतन मिलना आवश्यक है। यह एक सामाजिक आवश्यकता है। मौजूदा व्यवस्था इस ज़रूरत की पूर्ति की गारंटी नहीं दे रही है।

सी.एम.आई.. का अनुमान है कि कोरोना वायरस के फैलने से एक साल पहले 2019-20 में कुल अतिरिक्त रोज़गार केवल 28 लाख था। यह 18-23 आयु वर्ग के लगभग दो करोड़ बेरोज़गार लोगों के केवल 14 प्रतिशत भाग के लिये ही है। रोज़गार हासिल कर पाने वालों की तुलना में, रोज़गार की तलाश करने वाले युवा महिलाओं और पुरुषों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ रही है।

2020 और 2021 में इन दो सालों के दौरान बारबार लगाए गए लॉकडाउन के कारण नई नौकरियों के सृजन की तुलना में, बड़ी संख्या में नौकरियां नष्ट हो गई हैं। सेना में लगभग 1 लाख पद खाली हैं जो सेवानिवृत्ति के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुए हैं, उन्हें इसलिये नहीं भरा गया है क्योंकि कोई नई भर्ती नहीं हुई है। अब 2022 के दौरान विभिन्न शाखाओं में नई नौकरियां पैदा हो रही हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर नौकरियां ख़राब गुणवत्ता वाली हैं, ऐसी नौकरियां जिनमें बेहद कम वेतन मिलता है और नौकरी की सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है।

काम की तलाश करने वालों को नियमित रोज़गार मुहैया कराने में व्यवस्था की नाकामी ही असली समस्या है। पेंशन सहित सामाजिक सुरक्षा के साथ नियमित नौकरी पाने के बहुत कम अवसर हैं। रोज़गार के दुर्लभ अवसरों में से एक है सेना में भर्ती होना। रोज़गार के उस अवसर को भी, बिना पेंशन के निश्चित अवधि के अनुबंध में बदलना, सुरक्षित और नियमित रोज़गार के सीमित रास्ते के एक बड़े हिस्से को बंद करने जैसा दिख रहा है।

बेरोज़गार युवाओं की बेहद नाराज़गी की यह प्रतिक्रिया, बहुत ही स्वाभाविक और पूरी तरह से जायज़ है।

सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करने की बजाय, अर्थव्यवस्था और सरकार की नीति को पूंजीपतियों के मुनाफ़े बनाने की लालच को पूरा करने की दिशा में उन्मुख करने का कोई औचित्य नहीं है। सेना में नियमित रोज़गार को बिना पेंशन के एक निश्चित अवधि के रोज़गार में बदलने का कोई औचित्य नहीं है। जिन लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि वे देश के लिए अपनी जान को जोखिम में डालें, उन्हें खर्च के बोझ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए!

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