राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की 47वीं बरसी पर:
जब हिन्दोस्तान के लोकतंत्र का असली चेहरा सामने आया

26 जून, 1975 वह दिन था जब देश के राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की थी। वह घोषणा “अंदरूनी अशांति” पर काबू पाने के नाम पर, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के उपदेश के अनुसार की गयी थी।

आपातकाल के 19 महीनों के दौरान, संविधान में बताये गए सभी मौलिक अधिकारों से लोगों को वंचित किया गया। मज़दूरों की हड़तालों पर रोक लगा दी गयी। ट्रेड यूनियन नेताओं और छात्र कार्यकर्ताओं को जेल में बंद कर दिया गया। समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लगा दी गयी, ताकि सरकार की किसी भी प्रकार की आलोचना प्रकाशित न हो सके। लोकसभा के चुनावों को अनिश्चितकाल तक के लिये स्थगित कर दिया गया। गुजरात और तमिलनाडु में वहां की निर्वाचित सरकारों को बर्ख़ास्त कर दिया गया।

राज्य ने लोगों के खि़लाफ़ आतंक की अप्रत्याशित मुहिम फैला दी। आबादीनियंत्रण के नाम पर, लाखोंलाखों मज़दूरों, किसानों और नौजवानों का ज़बरदस्ती से नसबंदी कराया गया। कई शहरों में झुग्गीवासियों को बलपूर्वक हटा दिया गया और उनके घरबार उजाड़े गए।

आपातकाल घोषित करने का फ़ैसला किसने लिया था और क्यों?

आज तक यही सतही विचार फैलाया जाता रहा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री, इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करने का निर्णय इसलिए लिया था क्योंकि अदालत के फ़ैसलों की वजह से उनका राजनीति में आगे बढ़ने का रास्ता ख़तरे में था।

सच्चाई तो यह है कि राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा करने का फ़ैसला हुक्मरान वर्ग के सबसे प्रभावशाली और अगुवा तबके ने किया था। सबसे बड़े इजारेदार पूंजीवादी घरानों के प्रधानों ने आपातकाल को लागू करने का समर्थन किया था।

टाटा समूह के अध्यक्ष, जे.आर.डी. टाटा ने 4 अप्रैल, 1976 में, न्यू यॉर्क टाइम्स अख़बार को दिए गए एक साक्षात्कार में कहा था कि “हालत बहुत ज्यादा बिगड़ गई थी। आप यह सोच भी नहीं सकते कि हमें हड़ताल, बॉयकॉट, प्रदर्शन न जाने क्याक्या झेलना पड़ता था। क्यों, ऐसे भी कुछ दिन थे जब मैं अपने दफ्तर से सड़क पर निकल नहीं सकता था।”

वह ऐसा समय था जब मज़दूरों और किसानों के जन आंदोलन चरम सीमा तक पहुंच गए थे। 1974 में लाखोंलाखों रेल मज़दूरों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की थी, जिसकी वजह से पूरी अर्थव्यवस्था ठप्प हो गई थी। देश के अलगअलग इलाकों में किसान संगठनों ने लागत की क़ीमतों को कम करने और राज्य द्वारा लाभदायक क़ीमत पर फ़सलों की ख़रीदी की गारंटी के लिए आंदोलन शुरू कर रखा था। देश के कई भागों में बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और नौजवानों के अंधकारमय भविष्य के खि़लाफ़, छात्रों के बड़ेबड़े प्रदर्शन हो रहे थे।

1960 के दशक के अंत तक, नेहरू की कांग्रेस सरकार ने जिस समाजवादी नमूने के समाज का वादा किया था, वह पूरी तरह बदनाम हो गया था। दो दशकों तक आर्थिक विकास के बाद, टाटाबिरला की अगुवाई में सिर्फ कुछ मुट्ठीभर घराने ही बहुत अमीर हो चुके थे। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादीलेनिनवादी), जिसकी 1969 में स्थापना हुई थी, जिसने मौजूदा राज्य का तख़्तापलट करने और एक लोक जनवादी राज्य की स्थापना करने का आह्वान किया था। नौजवानों ने भारी संख्या में आगे आकर उस आह्वान को स्वीकार किया था। हुक्मरान वर्ग ने उसके जवाब में, 1971 में मेंटेनेंस ऑफ़ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट (मीसा) अधिनियम को लागू किया और सभी संदिग्ध क्रांतिकारियों को मात्र शक के आधार पर ही जेल में बंद कर देने को वैध ठहरा दिया।

आपातकाल की घोषणा का मुख्य मक़सद था क्रांति के ख़तरे को टालना और हर प्रकार के जनविरोध को कुचलकर, इजारेदार पूंजीवादी घरानों की हुक्मशाही को और मजबूत करना। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर मज़दूरों, किसानों, सभी क्रांतिकारियों और सरकार की आलोचना करने वाले सभी लोगों का व्यापक तौर पर दमन किया गया।

लोकतंत्र की पुनस्र्थापना का फरेब

आपातकाल की घोषणा होने पर बहुत सारे हिन्दोस्तानी बुद्धिजीवी और बड़ी संख्या में नौजवान तथा छात्र हिन्दोस्तानी राज्य और इसके लोकतंत्र के असली चरित्र को समझने लगे, जिसे दुनिया का सबसे ज्यादा आबाद लोकतंत्र कहा जाता है। उस राजनीतिक जागृति के साथ, बड़ी संख्या में लोग न सिर्फ देश के अंदर बल्कि विदेशों में भी हिन्दोस्तानी मज़दूर और छात्र क्रांति के लक्ष्य को अपनाने के लिये प्रेरित हुए।

इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में हुक्मरान वर्ग ने यह समझ लिया कि सिर्फ वहशी दमन के ज़रिए क्रांति के ख़तरे को नहीं मिटाया जा सकता है। अपनी हकूमत और अपने शोषण की व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए, हुक्मरानों को एक ऐसा राजनीतिक विकल्प विकसित करने की ज़रूरत थी, जो लोगों को धोखा दे सके। उन्होंने “लोकतंत्र की पुनस्र्थापना” के आंदोलन को बढ़ावा दिया। उस आंदोलन का उद्देश्य था वर्तमान व्यवस्था के बारे में भ्रम फैलाना और लोगों को क्रांति के रास्ते से भटका देना।

संसदीय विपक्ष की पार्टियों के कई नेताओं को जेल में बंदकर दिया गया, इसलिए नहीं कि वे इजारेदार पूंजीपतियों के शासन के लिए ख़तरा थे। उन्हें जेल में इसलिए बंद किया गया ताकि उन्हें “लोकतंत्र के योद्धाओं”, “कुचले जा रहे जनाधिकारों के योद्धाओं” के रूप में बढ़ावा दिया जा सके। जब आपातकाल समाप्त हो गया, तब वही नेता जनता पार्टी के नाम से बनाई गई, एक नई पार्टी के नेता बनकर आगे आए। उस नई पार्टी ने 1977 में लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर ली और मोरारजी देसाई की अगुवाई में सरकार बनाई।

जनता पार्टी की सरकार अपने पूरे कार्यकाल तक नहीं टिक पाई। उसने अर्थव्यवस्था की दिशा या राजनीतिक सत्ता के वर्ग चरित्र में कोई अहम परिवर्तन नहीं किया। इजारेदार पूंजीपति देश का एजेंडा तय करते रहे और लोगों पर अपनी हुक्मशाही थोपते रहे। क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए संघर्ष को पूरी तरह गुमराह कर दिया गया।

जब जनता पार्टी टूट गई और लोकसभा में अपना बहुमत खो बैठी, तब 1980 में फिर से चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस पार्टी, इंदिरा गांधी की अगुवाई में सत्ता में वापस आ गई। भूतपूर्व जनता पार्टी का एक घटक दल आगे चलकर, भारतीय जनता पार्टी के रूप में उभर कर आया। इजारेदार पूंजीपतियों ने बड़े सुनियोजित तरीक़े से भाजपा को कांग्रेस पार्टी के मुख्य विपक्ष के तौर पर विकसित किया।

बीते समय की गतिविधियों को देखते हुए, यह स्पष्ट हो जाता है कि आपातकाल की घोषणा और “लोकतंत्र की स्थापना” का आंदोलन ये दोनों इजारेदार पूंजीवादी घरानों की योजना का हिस्सा थे। इन दोनों के ज़रिए लोगों को कुचलने, गुमराह करने और बांटने का इजारेदार पूंजीपतियों का उद्देश्य हासिल किया गया, ताकि क्रांति को रोका जा सके और मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखा जा सके। उन दोनों ने कांग्रेस पार्टी के एक भरोसेमंद विकल्प को विकसित करने के इजारेदार पूंजीपतियों के उद्देश्य को हासिल करने का काम किया।

अधिकारों की कोई गारंटी नहीं

अधिकार’ की अवधारणा के साथसाथ यह मांग भी शामिल है कि उसका हनन नहीं होना चाहिए। परन्तु आपातकाल के अनुभव और उसके बाद की गतिविधियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दोस्तानी गणराज्य जनता के किसी भी अधिकार की गारंटी नहीं देता है। संविधान लोकतांत्रिक अधिकारों का खुलेआम हनन करने की पूरी छूट देता है।

आपातकाल की घोषणा संविधान का उल्लंघन नहीं थी। संविधान की धारा 352 मंत्रिमंडल को यह इज़ाज़त देती है कि वह राष्ट्रपति को आपातकाल की घोषणा करके लोगों के सभी अधिकारों को छीन लेने की सलाह दे सकता है। यह प्रावधान हिन्दोस्तान के असली हुक्मरानों, यानी इजारेदार पूंजीपतियों के लिए उपलब्ध है। जबजब वे अपनी हुकूमत के लिए ख़तरा महसूस करते हैं, तबतब वे इसे ‘हिन्दोस्तान के लिए ख़तरा’ बताकर, आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं और लोगों के सभी अधिकारों को छीन सकते हैं।

अगर हम 1977 से आज तक, बीते 45 वर्षों की पूरी अवधि को देखें तो हमें यह साफ दिखता है कि राजकीय आतंकवाद और लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बढ़ता ही जा रहा है। सरमायदार वर्ग की अगुवाई करने वाले इजारेदार पूंजीपति अपनी हुक्मशाही को लागू करने के लिए, ज्यादा से ज्यादा हद तक क्रूर बल प्रयोग पर भरोसा कर रहे हैं। उन्होंने मनमानी से लोगों को गिरफ़्तार करने और जेल में बंद रखने के लिए, एक के बाद दूसरा कठोर लोकतंत्रविरोधी क़ानून लागू किया है। ये क़ानून “सिख आतंकवादियों”, “इस्लामी आतंकवादियों”, “माओवादियों” आदि का मुक़ाबला करने के बहाने लागू किये गए हैं। राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा हमेशा ही लोगों को बांटने, भटकाने और जन संघर्षों को खून में बहाने का हुक्मरानों का पसंदीदा तरीक़ा रहा है।

लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों को कुचलने के लिए तरहतरह के दमनकारी क़ानून लागू किये गए हैं, जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका), आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां अधिनियम (टाडा), आतंकवाद निरोधक क़ानून (पोटा) और गैरक़ानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम (यूएपीए)। इनका असली इरादा हर प्रकार के जनविरोध को अपराधी ठहराना और मनमानी से की गई गिरफ़्तारी को और अनिश्चित काल तक जेल में बंदी बनाकर रखने को वैध ठहराना है।

आज तक, हिन्दोस्तान पर राज करने वाले लगातार ज्यादा से ज्यादा हद तक, दमन और काले क़ानूनों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। उन्होंने आपातकाल की घोषणा किए बिना ही, लोगों के अधिकारों को कुचलने के तरहतरह के तौरतरीक़ों को बड़ी कुशलता के साथ अपना लिया है। इस तथाकथित लोकतांत्रिक गणराज्य में अधिकारों का हनन बद से बदतर होता जा रहा है।

निष्कर्ष

आपातकाल की घोषणा सामान्य स्थिति से कोई विचलन वाली बात नहीं थी। यह ऐसा क़दम था जिससे हिन्दोस्तानी गणराज्य का असली चेहरा सामने आ गया। लोकतंत्र का नक़ाब हट गया। यह साफ़ हो गया कि राज्य सरमायदारों की वहशी हुक्मशाही है, जिसकी अगुवाई इजारेदार पूंजीपति करते हैं।

आपातकाल की अवधि का पूरा अनुभव और उसके बाद की सारी गतिविधियां यह साफ़साफ़ दिखाती हैं कि चुनावों के ज़रिये सरकार को बदलने से राज्य के वर्ग चरित्र में कोई परिवर्तन नहीं होता। वर्तमान राज्य और उसके संविधान की हिफ़ाज़त करके, मज़दूरों और किसानों के हितों की रक्षा नहीं की जा सकती। यह एक बहुत बड़ा भ्रम फैलाया जाता है कि संविधान हमारे अधिकारों की रक्षा करता है।

सरमायदारों की हुक्मशाही के वर्तमान राज्य की जगह पर, मज़दूरों और किसानों की हुकूमत के एक नए राज्य की स्थापना करने की ज़रूरत है। मेहनतकश बहुसंख्या को देश का क़ानून बनाना होगा। उन्हें एक ऐसा संविधान अपनाना होगा जो लोगों के हाथ में राज्य सत्ता सुनिश्चित करेगा और मानव अधिकारों तथा राष्ट्रीय अधिकारों समेत सभी जनतांत्रिक अधिकारों की गारंटी देगा। राजनीतिक व्यवस्था में ऐसा परिवर्तन लाना होगा ताकि फ़ैसला लेने की ताक़त लोगों के हाथ में हो। जब मज़दूरों और किसानों के हाथ में राज्य सत्ता होगी, तब वे अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिला सकेंगे, ताकि समाज की निरंतर बढ़ती ज़रूरतों को पूरा किया जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को।

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