पुणे में निजीकरण के ख़िलाफ़ सभा

निजीकरण की मज़दूर-विरोधी, जन-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी नीति का संयुक्त रूप से विरोध करने के लिए, विभिन्न क्षेत्रों की यूनियनों और जन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने पुणे में एक बहुत ही सफल सभा का आयोजन किया।

1991 में जब से निजीकरण और उदारीकरण के ज़रिये वैश्वीकरण का कार्यक्रम अपनाया गया है, तबसे केंद्र और कई राज्यों की विभिन्न सरकारों ने इसे लागू करने की पूरी कोशिश की है। मज़दूरों की यूनियनों के साथ-साथ, जन संगठन भी इसके खि़लाफ़ ज़ोरदार लड़ाई लड़ते आये हैं और कई मामलों में सरकारों की योजना को रोकने में क़ामयाब भी हुये हैं।

जब निजीकरण के कार्यक्रम पर सरकार ध्यान केंद्रित कर रही है, तो उसके खि़लाफ़ एक मजबूत और एकजुट विरोध तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है। निजीकरण के खि़लाफ़ एक संयुक्त कार्य योजना विकसित करने के लिए 12 जून, 2022 को पुणे में एक संयुक्त सभा आयोजित की गई जिससे इस लड़ाई को एक स्वागत योग्य बढ़ावा मिलेगा।

सभा का आयोजन ऑल इंडिया पंजाब नेशनल बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन (ए.आई.पी.एन.बी.ओ.ए.), ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन (ए.आई.एस.एम.ए.), सेंट्रल रेलवे ट्रैक मेनटेनर्स यूनियन (सी.आर.टी.यू.), कामगार एकता कमेटी (के.ई.सी.), महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी वर्कर्स फेडरेशन (एम.एस.ई.डब्ल्यू.एफ.), पुणे डिस्ट्रिक्ट बैंक इम्प्लोईज एसोसियेशन (पी.डी.बी.ई.ए.) और सबोर्डिनेट इंजीनियर्स एसोसियेशन (एम.एस.ई.बी.) ने किया था। कई अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने भी इस सभा में भाग लिया।

कामगार एकता कमेटी (के.ई.सी.) के पुणे सचिव श्री प्रदीप ने उपस्थित सभी लोगों का स्वागत किया। सभा का संचालन के.ई.सी. के संयुक्त सचिव श्री गिरीश भावे ने किया। पी.डी.बी.ए. के महासचिव श्री शैलेश टिलेकर; सी.आर.टी.यू. के पुणे मंडल के अध्यक्ष श्री दशरथ नागराले; एम.एस.ई.डब्ल्यू.एफ. के महासचिव और ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लॉइज (ए.आई.एफ.ई.ई.) के राष्ट्रीय सचिव कामरेड कृष्णा भोयर; ऑल इंडिया पंजाब नेशनल बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन (ए.आई.पी.एन.बी.ओ.ए.) के अध्यक्ष और ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कांफेडरेशन (आई.बी.ओ.सी., महाराष्ट्र और गोवा) के संगठन सचिव श्री विट्ठल माने और ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (ए.आई.पी.ई.एफ.) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री सुनील जगताप ने सभा को संबोधित किया। ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसिएशन (ए.आई.एस.एम.ए.) के नेता सभा में शामिल नहीं हो सके, इसलिए उन्होंने शुभकामनाएं भेजी थीं।

के.ई.सी. के संयुक्त सचिव श्री अशोक कुमार द्वारा अंग्रेजी और हिंदी की गई पावरपॉइंट प्रस्तुति के माध्यम से इस मुद्दे का एक सिंहावलोकन प्रस्तुत किया गया था। इस बात पर ज़ोर दिया गया कि निजीकरण पूंजीपति वर्ग का एजेंडा है। यह देशी और विदेशी बड़े इजारेदार पूंजीपतियों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है और केंद्र तथा कई राज्यों में विभिन्न पार्टियों की सरकारों के द्वारा इसे लागू किया गया है।

हम मज़दूरों के पास जबरदस्त ताक़त है, जैसा कि बिजली और रेलवे क्षेत्रों में श्रमिकों के हाल के सफल संघर्षों से पता चलता है। हमें अपनी ताक़त का एहसास करना होगा तथा उस ताक़त का इस्तेमाल पूरे देश के लोगों के लाभ के लिए करना होगा।

सार्वजनिक क्षेत्र के श्रमिकों को अन्य श्रमिकों द्वारा किए गए सफल संघर्षों और परिस्थितियों के बारे में वाकिफ कराना महत्वपूर्ण है। आखिरकार, वे अन्य सभी क्षेत्रों के उपयोगकर्ता और उपभोक्ता हैं। इसी तरह, हमें बड़े पैमाने पर लोगों को सचेत करना होगा और अपने उद्देश्यों के लिए संगठित करना होगा। जबकि हम श्रमिक लाखों में हैं, वे करोड़ों में हैं। जहां मज़दूर यूनियन, पार्टी और अन्य संबद्धता और विचारधाराओं की बाधाओं को पार करते हुए एकजुट हुए हैं और लोगों को उनके उद्देश्य के लिए लामबंध किया है, वहां निजीकरण के विशेष प्रयासों के खि़लाफ़ सफलतापूर्वक संघर्ष छेड़े गये हैं।

”एक पर हमला सब पर हमला!” इस सिद्धांत के आधार पर हमें एक मजबूत एकता का निर्माण करना होगा।

बैंकों के नेताओं ने बताया कि कॉरपोरेट मुनाफ़े को बढ़ाने के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को जानबूझकर कमज़ोर किया जा रहा है, खासकर एन.पी.ए. (गैर-निष्पादित संपत्ति, जिसका सीधा मतलब है लिये गये कर्ज़ जो वापस नहीं लिया जाएगा) को राइट ऑफ करके और विलय के माध्यम से। सिर्फ पिछले 10 वर्षों में कुल कॉर्पोरेट क़र्ज़ाें का 82 प्रतिशत एन.पी.ए. घोषित किया गया है। बैंकों के घाटे का कारण बनने के बाद, अब कॉरपोरेट खुद बैंकों को ख़रीदना चाहते हैं, और सरकारें उन्हें सुविधा देती रही हैं!

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ज़ीरो बैलेंस खातों को खोलते हैं, शिक्षा के लिये क़र्ज़ और मुद्रा क़र्ज़ प्रदान करते हैं और यहां तक कि कुछ हजार रुपये की छोटी राशि के क़र्ज़ भी प्रदान करते हैं, जबकि निजी बैंक यह सब नहीं करते हैं। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा जो कृषि का काम करता है, उसका एक हिस्सा छोटे क़र्ज़ पर निर्भर है। बैंकों का निजीकरण उन्हें बैंकिंग सेवाओं से वंचित करेगा और किसानों की आत्महत्याएं बढ़ेंगी। बैंक में विलय के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की लगभग 6,000 शाखाएं बंद हो गई हैं।

बिजली कर्मचारियों के नेताओं ने बताया कि टाटा, बिड़ला और अन्य पूंजीपतियों ने नेहरू सरकार को सड़कों, बिजली और पानी जैसे क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण करने की सलाह दी थी, क्योंकि इन क्षेत्रों को बनाने में बहुत अधिक पूंजी की आवश्यकता थी। आज यही पूंजीपति इतने बड़े हो गए हैं कि वे सार्वजनिक क्षेत्र के लाभ कमाने वाले हिस्सों पर कब्ज़ा करना चाहते हैं।

सरकारी प्रचार पूरी तरह से ग़लत है कि निजीकरण उपभोक्ताओं को अपनी बिजली वितरण कंपनी चुनने में सक्षम बनायेगा। वास्तव में, मामला इसके बिलकुल उल्टा है – निजी खिलाड़ी उपभोक्ताओं को चुनेंगे! पुणे जैसे शहरी क्षेत्रों का निजीकरण किया जाएगा क्योंकि वे लाभदायक हैं। बिजली वितरण के निजीकरण से शुल्क बढ़ेगा। ग्रामीण और आदिवासी लोग इसे वहन नहीं कर पाएंगे।

रेलवे के नेताओं ने निजी ट्रेन तेजस एक्सप्रेस में जबरन वसूले जाने वाले किराए का उदाहरण दिया। भारतीय रेल विभिन्न प्रकार की 100 से अधिक रियायतें प्रदान करता है। कौन सा पूंजीपति ऐसा करेगा? सभी यात्रियों को परेशानी होगी।

रेलवे में जोखिम भरे कार्यों को ठेके पर दिया जा रहा है और इन कार्याें को अप्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा करवाया जा रहा है। यह एक अन्य प्रकार का निजीकरण है, जो यात्रियों के लिए ख़तरनाक है और इस प्रकार काम पर रखे गए श्रमिकों के लिए बहुत शोषक है।

रक्षा कर्मचारियों के नेता ने बताया कि अगर बंदूक, गोलियां, गोला-बारूद, पैराशूट, वर्दी और अन्य उपकरणों सहित रक्षा उत्पादन को निजी खिलाड़ियों को उनके मुनाफ़े अधिकतम करने के लिए सौंप दिया जाता है, तो देश की सुरक्षा कितनी गंभीर रूप से प्रभावित होगी। ऑर्डनेंस फैक्ट्रीज बोर्ड (ओ.एफ.बी.) के निगमीकरण के प्रयासों के खि़लाफ़ अक्तूबर 2020 में जब श्रमिक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए थे, तब सरकार ने उन पर आवश्यक रक्षा सेवा अधिनियम (ई.डी.एस.ए.) लागू कर दिया और 2021 में ओ.एफ.बी. को निगमित करके उन्हें विफल कर दिया। अधिकतम मुनाफ़े भूखे कारपोरेटों घरानों को आवश्यक सेवाएं सौंप देना, कैसे न्यायोचित हो सकता है?

शिक्षकों के नेता ने बताया कि शिक्षा क्षेत्र अन्य सभी क्षेत्रों के लिए बुनियाद है और शिक्षक भी श्रमिक हैं। सरकारी संस्थानों की गुणवत्ता को कम करके सार्वजनिक शिक्षा को नष्ट किया जा रहा है। सरकार नई शिक्षा नीति (एन.ई.पी.) के माध्यम से निजीकरण को और आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। वास्तव में अच्छी सार्वजनिक शिक्षा एक मूलभूत आवश्यकता है और सभी के लिए मुनासिब दाम पर उपलब्ध होनी चाहिए।

जब और वक्ताओं के लिए मंच खोला गया, तब कामरेड सुनील बाजारे (अध्यक्ष, पुणे मंडल, नेशनल रेलवे मज़दूर यूनियन-एन.आर.एम.यू.), डा. गीता शिंदे (पुणे विश्वविद्यालय के सावित्रीबाई फुले टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्षा), कामरेड मोहन होल (ऑल इंडिया डिफेन्स एम्प्लोईज़ फेडरेशन, ए.आई.डी.ई.एफ.) और सुश्री शीना (राष्ट्रीय प्रवक्ता, पुरोगामी महिला संगठन और सदस्या के.ई.सी., पुणे) को अपने विचार व्यक्त करने के लिए बुलाया गया।

कई वक्ताओं ने कहा कि इतिहास से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि महिलाओं और युवाओं को शामिल करना हमारी सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। मुख्यधारा का मीडिया इजारेदार पूंजीपतियों के स्वामित्व में है या सरकार द्वारा नियंत्रित है और वह पूंजीपतियों को संतुष्ट करने के लिये बाध्य है। परन्तु, युवा सोशल मीडिया का उपयोग करने और श्रमिकों और अन्य मेहनतकश लोगों के लिए वैकल्पिक मीडिया बनाने में हमारी मदद कर सकते हैं।

आयोजकों की ओर से बोलते हुए श्री भावे ने प्रस्ताव का प्रारूप पढ़कर सुनाया। इसे सर्वसम्मति से पारित किया गया। (बाक्स देखें)

मज़दूर एकता लहर इस महत्वपूर्ण पहल के लिए आयोजकों और प्रतिभागियों को बधाई देते हैं और हमें विश्वास है कि यह हम सभी को हमारे सांझे उद्देश्य की लड़ाई को मजबूत करने के लिए प्रेरित करेगा।

मज़दूर-विरोधी, जन-विरोधी, राष्ट्र विरोधी निजीकरण की नीति के खि़लाफ़ एकजुट हों” विषय पर 12 जून को पत्रकार भवन, पुणे में आयोजित सभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया प्रस्ताव

प्रस्ताव

1991 में उदारीकरण और निजीकरण के माध्यम से वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीति की शुरुआत के बाद से, केंद्र और अधिकांश राज्यों में विभिन्न सरकारें इसे लागू करने की पूरी कोशिश कर रही हैं। इस नीति से दोनों, हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़े पूंजीपतियों और कारपोरेटों को फ़ायदा होता है, क्योंकि यह उनके मुनाफ़े को अधिकतम करने में मदद करता है। सरकारें इसे निगमीकरण, विनिवेश, आउटसोर्सिंग, संविदाकरण, सार्वजनिक-निजी भागीदारी, संपत्ति का मुद्रीकरण, भूमि मुद्रीकरण और राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (एन.एम.पी.) जैसे विभिन्न नामों से आगे बढ़ा रही हैं।

दूसरी ओर निजीकरण सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में लाखों श्रमिकों के हितों के खि़लाफ़ है। यह हमारे देश के करोड़ों लोगों के हितों के खि़लाफ़ भी है, जिन्हें निजीकृत वस्तुओं और सेवाओं के लिए अधिक क़ीमत चुकानी पड़ रही है। इसका परिणाम हमारे देश के प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ लोगों के धन और श्रम से बनी संपत्ति को पूंजीपतियों को सौंपना होगा।

विभिन्न क्षेत्रों के श्रमिकों के विभिन्न संगठन शुरू से ही निजीकरण के एजेंडे के खि़लाफ़ लड़ते रहे हैं। वे कई मामलों में निजीकरण को रोकने में क़ामयाब रहे हैं, ख़ासकर जहां उन्होंने उपभोक्ताओं और उपयोगकर्ताओं को शिक्षित किया है और उन्हें अपने संघर्ष में शामिल होने के लिए प्रेरित किया है।

आज देश में सभी क्षेत्रों में निजीकरण के खि़लाफ़ यूनियनें, पार्टी और वैचारिक संबद्धताओं को परे करके एक बहुत ही स्वागत योग्य एकता विकसित कर रही हैं।

हम, जो आज यहां रविवार, 12 जून, 2022 को पुणे में पत्रकार भवन में एकत्र हुए हैं, पुणे में अपने संघर्ष को और विकसित करके इस एकता में योगदान देने का संकल्प लेते हैं।

ऐसा करने के लिए हम अन्य संगठनों तक अपनी पहुंच बढ़ाएंगे जो हमारे संघर्ष में शामिल होना चाहते हैं।

हम एक क्षेत्र के श्रमिकों को दूसरे क्षेत्रों के निजीकरण के हानिकारक प्रभावों से अवगत कराएंगे।

नागरिकों को इस संघर्ष में शामिल करने के लिए हम संयुक्त रूप से जागरुकता अभियान चलाएंगे।

हम निजीकरण का विरोध करने के लिए चर्चायें, बैठकें, कार्यशालाएं और प्रदर्शन आयोजित करेंगे।

हम सार्वजनिक संपत्ति के निजीकरण के खि़लाफ़ एक अडिग संघर्ष जारी रखेंगे, जो हमारे पैसे, हमारे खून और पसीने से बनी है और शासक वर्ग के नापाक मंसूबों को हराने के लिए जो कुछ भी करना होगा वह करेंगे।

 

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