मज़दूरों और किसानों के शोषण को ख़त्म करने के लिए संघर्ष को आगे बढाएं!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, मई दिवस, 2022

मज़दूर साथियों,

आज मई दिवस है, सभी देशों के मज़दूरों के लिए जश्न मनाने का दिवस है। हमारे देश के कोने-कोने में मज़दूर जुझारू रैलियों, मीटिगों और जुलूसों में हिस्सा ले रहे हैं। हम अब तक हासिल हुई जीतों पर खुशियां मना रहे हैं और अपनी असफलताओं से सबक लेकर, उन पर चर्चा कर रहे हैं।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सभी देशों के मज़दूरों को सलाम करती है, जो पूंजीवादी शोषण के खि़लाफ़, राष्ट्रीय दमन, नस्लवाद, फासीवाद और साम्राज्यवादी जंग के खि़लाफ़, अपने अधिकारों के लिए तथा क्रांति और समाजवाद की फतह के लिए, बड़ी बहादुरी के साथ संघर्ष कर रहे हैं।

हम फिर से प्रण लें कि हम मज़दूर बतौर और मानव बतौर, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष को, बिना कोई समझौता किए, निरंतर आगे बढ़ाएंगे। आइए, हम वादा करें कि हम सभी प्रकार के शोषण से मुक्त समाज का निर्माण करने के लिए संघर्ष करेंगे, एक ऐसा समाज जिसमें मेहनत करने वालों को अपने सामूहिक श्रम का फल मिलेगा और जहां कोई भी दूसरों के श्रम के शोषण करके अपनी खुद की दौलत को नहीं बढ़ा पाएगा।

बीते वर्ष के दौरान हमने अपने अधिकारों के लिए, बड़े ज़ोरदार एकजुट संघर्ष किए हैं। 20 करोड़ से अधिक मज़दूरों ने 28 और 29 मार्च को हुई, दो दिवसीय सर्व हिन्द आम हड़ताल में भाग लिया था। कोयले की खदानों, इस्पात के कारखानों, पैट्रोलियम रिफायनरी, बिजली वितरण कंपनियों, रेलवे और सड़क परिवहन, बैंकिंग और बीमा, रक्षा क्षेत्र, आदि के मज़दूर, विनिर्माण मज़दूर और सेवा क्षेत्र के मज़दूर, टीचर, डॉक्टर, नर्स, कृषि क्षेत्र में खेत मज़दूर, आंगनवाड़ी और आशा कर्मी – सभी ने मिलकर बड़ी कठिन हालतों में, बहुत सारे बहादुर संघर्ष किए हैं।

हम मज़दूरों ने बड़ी सक्रियता के साथ किसानों के संघर्ष का समर्थन किया। किसान आंदोलन ने मज़दूरों की यूनियनों के मांगपत्र का समर्थन किया है। मज़दूरों और किसानों की एकता पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई है।

हम चार लेबर कोड को को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, जो पूंजीपति वर्ग के हित के लिए मज़दूरों के अधिकारों को पांव तले कुचल देते हैं। हम जीने लायक वेतन के लिए, 8 घंटे काम के दिन के लिए और ठेका मज़दूरी को ख़त्म करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हम सभी मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

हम उदारीकरण और निजीकरण के सरमायदारों के मज़दूर-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम को रोकने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरमायदारों ने बड़े घमंड के साथ ऐलान कर दिया है कि वे सार्वजनिक क्षेत्र के सभी उद्योगों को हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के हाथों सौंप देंगे। सभी सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों – बैंकिंग, बीमा, बिजली, रेलवे, सड़क परिवहन, कोयला, इस्पात, पेट्रोलियम और रक्षा उत्पादन – सभी क्षेत्रों में मज़दूर पूरी ताक़त के साथ सड़कों पर उतरकर, समाज के इन अनमोल संसाधनों को निजी इजारेदार कंपनियों के हाथों बेच देने के इन प्रयासों का विरोध कर रहे हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आवास, बिजली, पानी, शौच प्रबंधन, रेल और सड़क परिवहन, बैंकिंग और बीमा – ये सभी आधुनिक जीवन की आवश्यकताएं हैं। हम अधिकार बतौर इन सबके लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन सभी सेवाओं और समाज की दूसरी ज़रूरतों को पूंजीपतियों के मुनाफे़ का स्रोत बनाया जा रहा है, जिसका हम विरोध कर रहे हैं।

हिन्दोस्तान को सभी कृषि उत्पादों की खरीदी के लिए एक सर्वव्यापक सार्वजनिक ख़रीदी व्यवस्था की ज़रूरत है, जिसके ज़रिए किसानों को अपनी उपज के लिए लाभदायक दाम सुनिश्चित हो सके। हिन्दोस्तान को एक सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था की सख़्त ज़रूरत है, जिसमें सभी मेहनतकश लोगों को सस्ते दामों पर पर्याप्त मात्रा में सभी आवश्यक वस्तुयें प्राप्त हो सकें। ये शहरों और गांवों के सभी मेहनतकश लोगों के लिए, आधुनिक मानव जीवन को सुनिश्चित करने की ज़रूरी शर्तें हैं। ये मज़दूरों और किसानों की लंबे समय से चली आ रही मांगें हैं।

मेहनतकश बहुसंख्या की इन लंबित मांगों को पूरा करना अवश्य मुमकिन है। लेकिन ये मांगें इसलिए पूरी नहीं की जाती हैं क्योंकि अधिकतम मुनाफ़ा हड़पने की इजारेदार पूंजीपतियों की लालच इन्हें पूरा होने से रोक देती है। इजारेदार पूंजीपति मज़दूरों के शोषण और किसानों की लूट को खूब तेज़ करके, जल्दी से जल्दी, हर क्षेत्र में खुद को और अमीर बनाना चाहते हैं। सरमायदारों की हुकूमत समाज की प्रगति के लिए एक रुकावट बन गयी है।

हमारे लोगों की सभी समस्याओं का स्रोत पूंजीवाद की आर्थिक व्यवस्था और मज़दूरों व किसानों पर सरमायदारों की हुकूमत की हिफ़ाज़त करने वाला राज्य है। हिन्दोस्तानी गणराज्य और उसके सभी संस्थान – सरकार चलाने वाली पार्टी और मंत्रिमंडल, और उसके साथ-साथ, संसदीय विपक्ष, पुलिस, सेना, न्यायपालिका, न्यूज़ मीडिया – ये सब मज़दूरों और किसानों पर सरमायादारों की हुकूमशाही को क़ायम करने के साधन हैं।

बहु पार्टीवादी, प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि मज़दूरों, किसानों और सभी मेहनतकश लोगों को हमेशा ही सत्ता से बाहर रखा जाये। फ़ैसले लेने की ताक़त मंत्रीमंडल के हाथों में संकेंद्रित है और इस मंत्रीमंडल को संसद में बहुमत-प्राप्त पार्टी द्वारा गठित किया जाता है। सरमायदार यह फै़सला करते हैं कि उनकी भरोसेमंद पार्टियों में से किस पार्टी को किसी खास समय पर, सरकार चलाने की ज़िम्मेदारी दी जाएगी। सरमायदार चुनावों के ज़़रिए अपनी हकूमत को वैधता देते हैं।

मज़दूर साथियों,

बीते साल में, अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने के दौरान अपनी एकता को काफी मजबूत किया है। हम मज़दूर अपनी पार्टी और ट्रेड यूनियन के संबंधों को एक तरफ करके, संघर्ष के एक सांझे झंडे तले एकजुट हो रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के सभी उद्योगों के मज़दूर एकजुट होकर, निजीकरण के कार्यक्रम के खि़लाफ़ संघर्ष करने के लिए आगे आ रहे हैं। मेहनतकश लोग ज्यादा से ज्यादा हद तक यह समझ रहे हैं कि “एक पर हमला सब पर हमला है”।

सरमायदारों को मज़दूरों और किसानों की इस बढ़ती एकता से बहुत डर है। सरमायदारों ने हमारी एकता को तोड़ने की अपनी कोशिशों को और तेज़ कर दिया है। वे इसके लिए तरह-तरह के पैशाचिक तौर-तरीक़े अपना रहे हैं। देश के कई इलाकों में राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा फैलाई जा रही है, जिसका उद्देश्य है धर्म के आधार पर हमें बांटना।

देश के कई इलाकों में जो हिंसा फैलाई जा रही है, जैसे कि उत्तर-पश्चिम दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में, उसे अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच टकराव के रूप में दर्शाया जा रहा है। यह सरासर झूठ है। राज्य के समर्थन के साथ हथियारबंद गुंडे इन इलाकों में रहने वाले लोगों पर हिंसक हमले कर रहे हैं।

कई दशकों से अमन-शांति के साथ, आपस में मिलकर और दुख-दर्द बांटकर साथ जीते हुए लोग, इन हालातों में एक दूसरे की हिफ़ाज़त करने के लिए बाहर निकल कर आए हैं।

राजकीय आतंकवाद और राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा हुक्मरान वर्ग का पसंदीदा हथकंडा है, जिसका वह बार-बार इस्तेमाल करता है। हुक्मरान वर्ग मज़दूरों और किसानों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर हो रहे सब-तरफा हमलों के खि़लाफ़ एकजुट संघर्ष में हमारी एकता को तोड़ने के लिए बार-बार इसका इस्तेमाल करता है।

दिल्ली और देश के कई इलाकों में अधिकारियों ने फिर से झुग्गी-बस्तियों और मेहनतकशों की बस्तियों को तोड़ने का अभियान शुरू कर दिया है। उन स्थानों पर रहने वाले मेहनतकशों पर ‘अपराधी और राष्ट्र-विरोधी’ होने का आरोप लगाया जा रहा है।

हक़ीक़त तो यह है कि झुग्गी-बस्तियों से ही पूंजीपतियों की फैक्ट्रियों के लिए सस्ते श्रम की बेरोक सप्लाई सुनिश्चित होती है। ये बस्तियां कई दशकों से बसी हुई हैं। यहां के निवासियों के पास वोटर आई.डी. कार्ड, आधार कार्ड, बिजली का कनेक्शन, आदि सब कुछ है। बड़े पूंजीपति राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल करके उस ज़मीन को हड़पने की कोशिश कर रहे हैं, जिन पर इन मज़दूरों ने अपना आशियाना बनाया है, ताकि पूंजीपति ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा कमाने की अपनी लालच को पूरा कर सकें। सरमायदार और उनकी मीडिया बड़े सोचे-समझे तरीके़ से, लोगों के घरों की तोड़फोड़ को सांप्रदायिक रंगों में पेश कर रहे हैं, ताकि हम मज़दूर अपने भाइयों और बहनों पर हो रहे हमले का एकजुट होकर विरोध न करें।

मज़दूर साथियों,

हमारे देश में अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोगों के बीच में संघर्ष नहीं है। यह संघर्ष मुट्ठीभर शोषकों और शोषित बहुसंख्या के बीच में है। यह इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में सरमायदारों तथा दूसरी तरफ, मज़दूरों, किसानों और अन्य मेहनतकश लोगों के बीच में संघर्ष है।

सरमायदार देश को हमारे हितों के ख़िलाफ़, एक बहुत ही ख़तरनाक रास्ते पर आगे ले जा रहे हैं। वे देश के अनमोल संसाधनों और प्राकृतिक संपत्ति को देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हाथों बेच रहे हैं। हमारे सरमायदार मानव जाति के सबसे बड़े दुश्मन और शांति के लिए सबसे बड़े ख़तरे, अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहे हैं। वे हमारे लोगों तथा पड़ोसी देशों के लोगों के बीच में दुश्मनी को उकसाते रहते हैं। वे देश के मज़दूरों और किसानों को अपने असली दुश्मनों, यानि हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग और अमरीकी साम्राज्यवाद के खि़लाफ़ लड़ने के रास्ते से हटाना चाहते हैं। वे हमारे देश के मज़दूरों और किसानों को दूसरे देशों के मज़दूरों और किसानों के ख़िलाफ़ लड़ाना चाहते हैं।

हमें अपनी एकता को तोड़ने और अपने संघर्ष को ख़त्म करने के सरमायदारों के प्रयासों से सतर्क रहना होगा। हमें अपनी जुझारू एकता, सभी मज़दूरों की एकता तथा मज़दूरों और किसानों की एकता को बनाना तथा और मजबूत करना होगा। हमें खुद को एक ऐसी राजनीतिक ताक़त बनाना होगा, जो देश की बागडोर को संभालने का दायित्व उठाने के क़ाबिल हो और सरमायदारों तथा उनकी पार्टियों को उस स्थान से हटाने में क़ामयाब हो।

हम मज़दूर और किसान समाज की बहुसंख्या हैं। हम हिन्दोस्तान की दौलत को पैदा करते हैं। हमें हिन्दोस्तान के मालिक बनना होगा। ऐसा करके ही हम पूरी अर्थव्यवस्था को सभी को सुख और सुरक्षा दिलाने की नई दिशा में आगे बढ़ा सकेंगे। ऐसा करके ही हम हिन्दोस्तान को दक्षिण एशिया और पूरी दुनिया में शांति का कारक बना सकेंगे।

मज़दूर साथियों,

आज से 132 वर्ष पहले, 1 मई, 1890 को यूरोप के सभी देशों के मज़दूरों ने 8 घंटे के काम के दिन की मांग को लेकर, रैलियां और हड़तालें आयोजित करके, संयुक्त रूप से मई दिवस का जश्न मनाया था। 1889 में स्थापित सोशलिस्ट इंटरनेशनल के आह्वान पर, मज़दूरों ने ऐसा किया था। उस समय से लेकर आज तक सारी दुनिया में मई दिवस का आंदोलन फैल गया है। सभी देशों के मज़दूर अपने अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष कर रहे हैं और पूंजीवादी शोषण से मुक्त, साम्राज्यवादी वर्चस्व तथा गुलामी और साम्राज्यवादी जंग से मुक्त दुनिया की स्थापना करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

आइए, हम सभी मज़दूरों के अधिकारों के लिए, ज़मीन को जोतकर पूरे समाज का पेट भरने वालों के अधिकारों के लिए, अपने एकजुट संघर्ष को और तेज़ कर दें। आइए, हम इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में हमारे शोषकों के खि़लाफ़, अपनी जुझारू एकता को और मजबूत करें।

आइए, हमें बांटने के हुक्मरान वर्ग के सभी प्रयासों को नाक़ामयाब करें। आइए, सरमायदारों की हकूमत की जगह पर मज़दूरों और किसानों की हुकूमत स्थापित करने के लक्ष्य के साथ, देश के सभी शोषित और पीड़ित लोगों को लामबंध करें।

हमारा उद्देश्य जायज़ है। हम बहुसंख्यक लोगों के हितों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारी जीत अवश्य होगी।

मज़दूर एकता ज़िंदाबाद!
मज़दूर किसान एकता ज़िंदाबाद!
इंक़लाब ज़िंदाबाद!

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