हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच 2+2 वार्ता
अमरीकी साम्राज्यवाद ने, हिन्दोस्तान पर अपने भू-राजनीतिक उद्देश्यों के साथ कदम से कदम मिलाने के लिए दबाव बढ़ाया

हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच ‘‘2+2 वार्ता’’ का चौथा दौर 10 से 15 अप्रैल के बीच हुआ। 2+2 वार्ता में, हिन्दोस्तान के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री की अमरीका के विदेश मंत्री (जिनको सेक्रेटरी ऑफ स्टेट, राज्य सचिव कहा जाता है) और रक्षा सचिव की एक साथ बैठकें शामिल हैं। इनका मकसद है कि दोनों राज्यों की विदेश और सैन्य नीतियों में नज़दीकी से समन्वय हो। अभी तक, हिन्दोस्तान की केवल अमरीका, रूस, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ 2+2 वार्ताएं हुई हैं।

अमरीका के साथ हुई इस 2+2 बैठक का संदर्भ, इस तरह की पहले हुई वार्ताओं से अलग था। यूक्रेन में रूस के हस्तक्षेप को एक बहाने के रूप में इस्तेमाल कर, अमरीकी साम्राज्यवाद, रूस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कमज़ोर करने और उसको अलग-थलग करने के लिए, हर तरह की कोशिश कर रहा है। अभी तक, हिन्दोस्तानी राज्य ने, यूक्रेन की स्थिति पर अपनी नीति को अमरीका और उसके सहयोगियों के साथ पंक्तिबद्ध नहीं किया है।

शीत युद्ध की अवधि के दौरान, सत्त्त्तारूढ़ हिन्दोस्तानी बड़े सरमायदार ने, दो महाशक्तियों, अमरीका और सोवियत संघ के साथ अपने संबंधों को संतुलित करके अपनी शक्ति का विस्तार करने, और दोनों से जो भी हासिल किया जा सकता था उसे प्राप्त करने की कोशिश की। सोवियत संघ के पतन और दुनिया के दो-ध्रुवी विभाजन के अंत के बाद, हिन्दोस्तानी राज्य ने अमरीका के साथ और करीबी सम्बन्ध बनाएं है। साथ ही, वो अभी भी रूस के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए हुए है। उदाहरण के लिए, हिन्दोस्तान के सैन्य उपकरणों का लगभग 60 प्रतिषत हिस्सा रूस से आयात किया जाता है।

यूक्रेन की वर्तमान स्थिति पैदा होने के बाद, हिन्दोस्तान ने अभी तक, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर रूस के ख़िलाफ़ मतदान नहीं किया है। हिन्दोस्तान ने रूसी तेल की अपनी ख़रीद को भी बढ़ा दिया है और रूस के साथ लेनदेन पर अमरीका के नेतृत्व में लगाये गए प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए रुपया-रूबल भुगतान व्यवस्था विकसित करने की कोशिश की है।

इन परिस्तिथियों में, यह स्वावाभिक उम्मीद की जानी चाहिए कि अमरीका के साथ हाल में हुई 2+2 बैठक में, अमरीकी साम्राज्यवाद, हिन्दोस्तान पर अपने रुख को बदलने और कई सैन्य उपकरणों और अन्य रियायतों के बदले में, हिन्दोस्तान को, अमरीका के अपने उद्देश्यों के अनुरूप चलने के लिए हिन्दोस्तान पर दबाव बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेगा।

2+2 की बैठक के दौरान क्या हुआ?

एक अचानक आश्चर्यजनक कदम देखने में आया कि, हिन्दोस्तान के विदेश मंत्री एस. जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की, उनके अमरीकी समकक्षों एंथनी ब्लिंकेन और लॉयड ऑस्टिन के साथ बैठक की पूर्वसंध्या को, अमरीकी राष्ट्रपति जो-बिडेन ने, हिन्दोस्तानी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक अनियत ऑनलाइन शिखर वार्ता की।

यह शिखर वार्ता स्पष्ट रूप से अमरीकी साम्राज्यवाद के रणनीतिक उद्देश्यों के साथ पंक्तिबद्ध करने के लिए, उच्चतम स्तर पर, हिन्दोस्तान पर दबाव बनाने का एक प्रयास था।

हालांकि शिखर वार्ता में वास्तव में क्या हुआ, यह जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन हिन्दोस्तानी राज्य ने अभी तक रूस-यूक्रेन पर अपना रुख़ नहीं बदला है।

इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि 2+2 बैठक से उम्मीद की जाने वाली कुछ प्रमुख घोषणायें नहीं की गयीं। इसमें, हिन्दोस्तान की तीन सशस्त्र सेवाओं के लिए, अमरीका से 30 प्रडेटर आर्म्ड ड्रोन की खरीद के लिए एक समझौता शामिल था। इसके अलावा, यह भी उम्मीद की जा रही थी कि अमरीका काट्सा (सी.ए.ए.एस.टी.ए., याने कि प्रतिबंधों के माध्यम से अमरीका के विरोधियों का मुकाबला करना) के प्रावधानों को हिन्दोस्तान के ख़िलाफ़ न लगाने के अपने इरादे की घोषणा करने की भी उम्मीद की जा रही थी। इससे 2018 में रूस से, एस 400 सतह-से-हवाई मिसाइल सिस्टम्स की ख़रीद के लिए हिन्दोस्तान को अमरीका द्वारा दंडित करने से रोका जा सकता था। ऐसी किसी छूट की घोषणा नहीं की गई।

हालांकि, इन बैठकों में दोनों देशों के बीच, कुछ अन्य प्रकार के सैन्य-सहयोग पर चर्चा की गई। इसमें अंतरिक्ष स्थितिपरक जागरूकता समझौते पर एक घोषणा, विस्तारित संयुक्त सैन्य अभ्यास की योजना, और एक साइबरस्पेस वार्ता शामिल हैं। एक अभूतपूर्व कदम के रूप में, दोनों पक्षों ने, अमरीकी नौसैनिक जहाजों की मध्य-यात्रा मरम्मत के लिए अमरीका द्वारा हिन्दोस्तानी शिपयार्ड का इस्तेमाल करने के लिए समझोते पर चर्चा की।

गौरतलब है कि दोनों पक्षों ने उन्नत प्रणालियों के सह-उत्पादन, सह-विकास और सहकारी परीक्षण पर चर्चा की। अमरीका से सैन्य उपकरण खरीदने के हिन्दोस्तान के लिए प्रमुख शर्तों में से एक है-2009 में हस्ताक्षरित अंतिम उपयोग निगरानी समझौते के प्रावधान। यह हिन्दोस्तान को अमरीका से खरीदे गए सैन्य उपकरणों को रेट्रोफिटिंग या अपनी जरूरतों के अनुसार उनमें बदलाव करने से रोकता है। यह प्रावधान, हिन्दोस्तान को मूल-निर्माताओं के अलावा, किसी अन्य देश या पार्टी से स्पेयर पार्ट्स खरीदने या ऐसे उपकरणों की सर्विसिंग कराने से भी रोकता है। रूस से खरीदे गए सैन्य उपकरणों को इस तरह के प्रावधानों द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया गया है।

वर्तमान हालातों में, अमरीका रूस के सैन्य उद्योग को कमजोर करने के लिए बहुत उत्सुक है। हिन्दोस्तानी बाज़ार को खोना रूस के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। यही कारण है कि, इस बैठक में, प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के अपने वादे के साथ, सैन्य उपकरणों के सह-उत्पादन की संभावनाओं के प्रलोभन दिखाकर, अमरीकी वार्ताकारों की कोशिश थी कि हिन्दोस्तान को रूसी सैन्य उपकरणों के सप्लायरों से दूर किया जाए।

विभिन्न समीक्षा लेखों में बताया गया है कि इस 2+2 बैठक में, अमरीका और हिन्दोस्तान, रूस और यूक्रेन के मुद्दे पर ‘असहमत होने के लिए सहमत’ हुए हैं। यह एक गलत आकलन है। अमरीकी साम्राज्यवाद अपने रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए हर संभव कोशिश करेगा और रूस को कमज़ोर करके उसे अलग-थलग करना, इनमें से एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। एक बड़े देश और अमरीका के कथित ‘रणनीतिक साझेदार’ के रूप में, रूस के प्रति अपनी नीति को अमरीका और उसके सहयोगियों के साथ पंक्तिबद्ध करने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य की अनिच्छा, अमरीकी साम्राज्यवाद को मंजूर नहीं है। वे चुपचाप बैठकर इस असहमति को सहन नहीं करेंगे, बल्कि हिन्दोस्तान के ऊपर, वे अपने शस्त्रागार के सभी  राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक, हथियारों से हमला करकेयह दबाब बनाये रखेंगें। पिछले कुछ दशकों में, अमरीका के साथ और करीबी सम्बन्ध बनाने की, हिन्दंोस्तानी शासक वर्ग की खुद्गार्ज नीति ने हिन्दोस्तान की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बजाय, हिन्दोस्तान को और कमजोर बनाया है। एक ऐसी स्वतंत्र विदेश नीति जो हिन्दोस्तान के राष्ट्रीय हित में है, उसको बनाए रखने में सक्षम होने के लिए, अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ रणनीतिक संबंधों को तोड़ना अति-आवश्यक है।

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