पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ गिने-चुने इलाकों से आफ्सपा को हटाया गया :
सशस्त्र बलों का निरंकुश आतंक अनवरत जारी है

31 मार्च को केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ गिने-चुने इलाकों से सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, यानी आफ्सपा, को हटाने का अपना फ़ैसला घोषित किया। सरकारी घोषणा के अनुसार, “असम के 23 पूरे जिलों, एक जिले के कुछ अंश, नगालैंड के 6 जिलों और मणिपुर के 6 जिलों से आफ्सपा को हटाया जाएगा”।

दिसंबर 2021 में नगालैंड के मोन जिले के ओटिंग गांव में सेना ने 13 कोयला खदान मज़दूरों पर गोली चला कर, बेरहमी से उनकी हत्या कर दी थी। नगालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्य में लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर कर, इसका विरोध करने लगे। लोग यह मांग करने लगे कि गुनहगारों को सज़ा दी जानी चाहिए और आफ्सपा को रद्द करना चाहिए। इसकी प्रतिक्रिया में सरकार द्वारा यह घोषणा की गई।

इस घोषणा के ठीक बाद, सरकार ने मीडिया के ज़रिए यह झूठा प्रचार करने की कोशिश की कि वह पूर्वोत्तर राज्यों में आफ्सपा के तहत चल रही सैन्य आतंक की मुहिम को ख़त्म करने की लोगों की मांग को पूरा करने जा रही है। हक़ीक़त तो यह है कि लोगों की यह मांग पूरी नहीं की गयी है। गुनहगारों को सज़ा नहीं दी गई है और आफ्सपा को रद्द नहीं किया गया है। कुछ गिने-चुने इलाकों से आफ्सपा के हटाए जाने से पूर्वोत्तर राज्यों में सशस्त्र बलों का निरंकुश आतंक ख़त्म नहीं होगा।

सरकार की घोषणा के ठीक एक दिन बाद, दो नौजवान जो अरुणाचल प्रदेश के तिरप जिले में मछली पकड़ने के बाद घर वापस जा रहे थे, असम राइफल्स के सिपाही की गोलियों के शिकार बनकर मारे गए। सिपाही ने उन्हें “संदिग्ध आतंकवादी” समझकर, उन पर गोली चलाई थी। अरुणाचल प्रदेश के तिरप जिले में आफ्सपा अभी भी लागू है।

लगभग एक महीने पहले, 28 फरवरी, 2022 को संपूर्ण असम राज्य पर आफ्सपा को अगले 6 महीने के लिए लागू किया गया था। इससे पहले, 28 अगस्त, 2021 को 6 महीने के लिए आफ्सपा को असम में लागू किया गया था। नवंबर 1990 से असम में आफ्सपा लागू किया गया था और हर 6 महीने के बाद, उसे फिर से लागू किया जाता है।  सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने पहले तो पूरे असम राज्य पर आफ्सपा को लागू कर दिया और फिर एक महीने बाद उसको कुछ गिने-चुने जिलों से हटा दिया। इससे साफ जाहिर होता है कि इन जिलों में आफ्सपा को लागू करने का कोई औचित्य ही नहीं था!

सरकार की हाल की घोषणा के बाद भी असम के कई जिलों, जैसे कि – तिनसुखिया, कारबी आंगलोंग, गोलाघाट, डिब्रूगढ़, चराई देओ, शिवसागर, जोरहाट, पश्चिमी कारबी आंगलोंग और दीमा हसाओ – इन सारे जिलों में आफ्सपा  अभी भी लागू रहेगा।

मणिपुर के पूरे राज्य में आफ्सपा लागू रहेगा। सिर्फ 15 पुलिस थाने जो घाटी के इलाके में, 6 जिलों में फैले हुए हैं, उन पर आफ्सपा लागू नहीं होगा। ये पुलिस थाने मुख्यत: पूर्वी और पश्चिमी इम्फाल जिलों में आते हैं। आफ्सपा को इनमें से  पहले ही हटा दिया गया था, जब 2006 में मणिपुर के लोगों ने आफ्सपा के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर विरोध किया था। मणिपुर के सभी पर्वतीय जिलों में आफ्सपा अभी भी लागू रहेगा।

31 मार्च के बाद भी, नगालैंड के सभी जिलों में आफ्सपा लागू रहेगा। इनमें वह जिला भी शामिल है जहां दिसंबर 2021 में सेना ने गोली मारकर लोगों की हत्या की थी। अरुणाचल में आफ्सपा वैसे का वैसा ही लागू रहेगा।

आफ्सपा एक ऐसे क़ानून पर आधारित है जिसे अंग्रेज बस्तीवादियों में अगस्त 1942 में पहली बार, हमारे लोगों के बढ़ते बस्तीवाद-विरोधी आज़ादी के संघर्ष को कुचलने के इरादे से लागू किया था। 1958 में केंद्र सरकार ने सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (1958) को पास किया था, ताकि उस समय अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे नगा लोगों के ख़िलाफ़ बल प्रयोग को ज़ायज़ ठहराया जा सके। उस समय के बाद, एक के बाद दूसरी, जो भी केंद्र सरकार बनी है, उसने मणिपुर, असम, मिज़ोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, पंजाब और कश्मीर में जन संघर्षों को कुचलने के लिए, आफ्सपा को लागू किया है। इन सभी जगहों पर हिन्दोस्तानी राज्य में राजनीतिक समस्याओं को हल करने से इनकार किया है और उसके बजाय, राजनीतिक समस्याओं को “क़ानून और व्यवस्था की समस्या” में बदलकर, लोगों के ख़िलाफ़ निरंकुश राजकीय आतंक का इस्तेमाल किया।

आफ्सपा  सशस्त्र बलों को पूरी छूट देता है, कि वे किसी भी समय, किसी भी जगह पर, बिना वारंट के, किसी की भी तलाशी ले सकते हैं और किसी को भी गिरफ्तार कर सकते हैं। इस क़ानून के तहत, सशस्त्र बलों को पूरा अधिकार दिया गया है कि वे सिर्फ शक के आधार पर, बेकसूर, निहत्थे लोगों को गोली मारकर उनकी जान ले सकते हैं, फ़र्जी मुठभेड़ कर सकते हैं, लोगों को प्रताड़ित कर सकते हैं, बलात्कार कर सकते हैं और पूरी तबाही मचा सकते हैं। आफ्सपा सशस्त्र बलों को किसी भी अदालत में किसी भी प्रकार के क़ानूनी मुक़दमे से पूरा बचाव दिलाता है।

केंद्र सरकार ने पूरी मनमानी के साथ, आफ्सपा को कभी इस इलाके में तो कभी उस इलाके में, लागू किया है या उसे हटाया है। पूर्वोत्तर राज्यों के पूरे-पूरे इलाकों को “अशांत” घोषित किया जाता है और वहां आफ्सपा को लागू करना ज़ायज़ ठहराया जाता है, जिसके चलते वहां के लोगों के सभी मानव अधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों को बेरहमी से कुचल दिया जाता है।

जब भी कहीं सेना की हत्या के ख़िलाफ़ जन-विरोध बढ़ जाता है, तब सुप्रीम कोर्ट “चिंता” का बड़ा नाटक करता है और कुछ गिने-चुने इलाकों से आफ्सपा को हटाने की घोषणा की जाती है। कुछ समय बाद, फिर से आफ्सपा को वहां वापस लागू कर दिया जाता है। जब मणिपुर और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों की विधानसभाओं ने भी आफ्सपा को हटाने के पक्ष में प्रस्ताव पास किया, तब भी केंद्र सरकार ने आफ्सपा को हटाने से इनकार किया।

यह याद रखा जाए कि जुलाई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने आफ्सपा के तहत सशस्त्र बलों को दिए गए क़ानूनी कवच के ख़िलाफ़ एक आदेश जारी किया था। सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश 2012 में जारी की गई एक याचिका की प्रतिक्रिया था। वह याचिका मणिपुर में फ़र्जी मुठभेड़ों में सशस्त्र बलों द्वारा मारे गए लोगों के परिजनों के संगठन – एक्स्ट्रा-ज्यूडिशल एग्जीक्यूशन विक्टिम फैमिली एसोसिएशन – द्वारा दर्ज की गई थी। उस याचिका में 1970 के दशक से मणिपुर में फ़र्जी मुठभेड़ों में 1,528 लोगों की मौत के रिकॉर्ड पेश किए गए थे और यह बताया गया था कि उनमें से किसी एक मामले में भी, दोषी सैनिकों के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं की गई है। केंद्र सरकार ने उन अपराधों के लिए गुनहगार सैनिकों को सज़ा देने के लिए कोई कार्यवाही नहीं की है।

1990 से जम्मू और कश्मीर में आफ्सपा लागू है। आफ्सपा के चलते, वहां के लोगों के लिए, भयानक उत्पीड़न, लोगों का लापता हो जाना या सेना के हाथों फ़र्जी मुठभेड़ में लोगों की हत्या, यह सब जीवन की निरंतरता बन गई है।

आफ्सपा को रद्द करने की मांग, पूर्वोत्तर राज्यों और कश्मीर के लोगों तथा देश के सभी लोकतांत्रिक ताक़तों की अनवरत तथा लंबे समय से चली आ रही मांग है। लेकिन केंद्र में जो भी सरकार आती रही है, चाहे किसी भी राजनीतिक पार्टी की हो, उसने बार-बार इस ज़ायज़ मांग को पूरा करने से इनकार किया है। हिन्दोस्तानी राज्य ने बार-बार, आफ्सपा के तहत सेना द्वारा बेकसूर लोगों के बलात्कार, उत्पीड़न और हत्या को ज़ायज़ ठहराया है, यह बहाना देकर कि यह “राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा” के लिए ज़रूरी है और “सेना की मनोभावना को बनाए रखने” के लिए ज़रूरी है।

सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को लागू करने का कोई औचित्य नहीं हो सकता है। हिन्दोस्तान के विभिन्न राज्यों के लोगों की राजनीतिक समस्याओं का राजनीतिक समाधान होना ज़रूरी है। हमारे देश के विभिन्न इलाकों के लोगों के, अपने मानव-अधिकारों, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों के लिए संघर्ष, पूरी तरह ज़ायज़ हैं। आफ्सपा को रद्द किया जाना चाहिए और सशस्त्र बलों को अपने बैरक में वापस भेज दिया जाना चाहिए। पूर्वोत्तर राज्यों और कश्मीर के लोगों की समस्याओं के स्थाई समाधान के लिए यह आवश्यक, पहला क़दम है।

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