इराक पर बेरहम हमले और कब्ज़े की 19वीं सालगिरह :
अमरीकी साम्राज्यवाद की हुक्मशाही के तले एक-ध्रुवीय दुनिया स्थापित करने के अजेंडे को परास्त करना होगा

20 मार्च, 2003 को अमरीकी साम्राज्यवादियों ने इराक पर कब्ज़ा करने और उसे नष्ट करने का दूसरा जंग शुरू किया था। इसकी शुरुआत उन्होंने “अचानक चौकानेवाले” (शॉक एंड आव),  बम बरसाने के अभियान के साथ की थी। इराक पर बम बरसाने के इस अभियान को अमरीका और सारी दुनिया के लोगों को टेलीविजन के ज़रिए दिखाया गया था। उस वहशी सैनिक ताक़त को दर्शा कर, अमरीकी साम्राज्यवादी दुनिया के सभी लोगों और देशों को यह संदेश देना चाहते थे कि अगर वे पूरी दुनिया पर हावी होने की अमरीकी रणनीति का विरोध करते हैं, तो उनका भी वही हश्र होगा जो इराक के लोगों और सरकार का हुआ था।

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ईराक पर हमले के विरोध में 15 सितंबर, 2007 को अमरीकी संसद (कैपीटोल) की ओर जाता विरोध प्रदर्शन

आज अमरीकी साम्राज्यवादियों का पाखण्ड साफ़ दिखता है जब वे “क़ानून पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था” की बात कर रहे हैं और यह इल्जाम लगा रहे हैं कि रूस यूक्रेन में चल रहे युद्ध में इस व्यवस्था का हनन कर रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादी चाहते हैं कि दुनिया के देश और लोग यह भूल जाएं कि किस तरह अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुमति के बिना इराक पर बम बरसाए थे और उसके बाद, इराक पर हमला करके उस देश पर कब्ज़ा कर लिया था। उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के तीन स्थाई सदस्य – रूस, चीन और फ्रांस – इराक पर कब्ज़े की अनुमति देने को तैयार नहीं थे। दुनिया के अधिकतम देश और लोग भी उसके ख़िलाफ़ थे। अमरीका ने ब्रिटेन के समर्थन के साथ, तथा संयुक्त राष्ट्र संघ और पूरी दुनिया के जनमत के खीख़िलाफ़, इराक की संप्रभुता का हनन किया था। यह दिखावा करने के लिए कि इस बेहद नाज़ायज़ जंग को अंतरराष्ट्रीय अनुमति प्राप्त थी, अमरीका  ने एक तथाकथित “रजामंद देशों का गठबंधन” गठित किया, जिसमें अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और पोलैंड सदस्य थे। उस गठबंधन के झंडे तले इराक पर जंग को अंजाम दिया गया था।

संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुसार, सभी सदस्य देशों को अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में, किसी अन्य देश की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के ख़िलाफ़, धमकी या सैन्य बल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इंटरनेशनल कमिशन ऑफ जुरिस्ट्स (आई.सी.जे) ने ऐलान किया था कि इराक पर हमला सैन्य बल प्रयोग पर लगाए गए प्रतिबंधों का खुलेआम हनन था। उन्होंने कहा था कि  “हमें इस बात पर गहरा खेद है कि कुछ थोड़े से राज्य इराक पर सीधा हमला करने जा रहे हैं, जो कि हमलावर जंग के बराबर है”। संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव, कोफी अन्नान, ने सितंबर 2004 में कहा था कि “मैंने साफ़ कह दिया है कि यह संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुसार नहीं है। हमारे अनुसार और संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर के अनुसार, यह जंग अवैध है”

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ईराक पर हमले के विरोध में 15 फरवरी, 2003 को लोगों ने बड़ी संख्या में अमरीका के न्यूयार्क शहर में प्रदर्शन किया

अपने अवैध क़दम को ज़ायज़ ठहराने के लिए अमरीकी सरकार ने यह बहुत बड़ा झूठ फैलाया कि इराक में जनसंहार के हथियारों का भंडार है, यानी रासायनिक, जैविक और परमाणु हथियारों का भंडार है। बाद में यह पता चला कि न सिर्फ इराक में ऐसे कोई हथियार नहीं थे, बल्कि अमरीका और ब्रिटेन को भी यह बात, इराक पर हमला करने से पहले से ही, अच्छी तरह मालूम था। ब्रिटेन के मंत्रिमंडल की 26 जुलाई, 2002 की एक बैठक द्वारा जारी एक पत्र के अनुसार, ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी (एम.आई.-6) के अध्यक्ष ने वाशिंगटन की यात्रा के बाद, यह रिपोर्ट दी थी कि “बुश सैनिक हमले के ज़रिये सद्दाम को हटाना चाहता है और इसे ज़ायज़ ठहराने के लिए आतंकवाद और जनसंहार के हथियारों का मनगढ़ंत बहाना पेश कर रहा है। सारी ख़ुफ़िया सूचनाएं और तथ्य उसी नीति के इर्द-गिर्द रचे जा रहे हैं”। इससे साफ़ पता चलता है कि अमरीका ने इराक पर सैनिक हमला करने और सद्दाम हुसैन की सरकार को गिराने का फ़ैसला कर लिया है। इराक पर जो इल्जाम लगाया गया था कि वह आतंकवाद का समर्थन कर रहा था और उसने जनसंहार के हथियारों का भंडार बना रखा था, वह अमरीका के उस जंग को जायज ठहराने के लिए, सरासर मनगढ़ंत झूठ था।

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ईराक पर हमले के विरोध में 15 फरवरी, 2003 को लाखों लोगों ने लंदन के हाइड पार्क में प्रदर्शन किया

अमरीकी साम्राज्यवाद ने इराक के लोगों के ख़िलाफ़ भयानक अपराध किए। उस जंग में लाखों-लाखों इराकी लोग मारे गए। कई और लाखों लोग इराक के अंदर और सीरिया जैसे पड़ोसी देशों में शरणार्थी शिविरों में जाकर रहने को मजबूर हुए। इराक की स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया गया था। उस प्राचीन सभ्यता का पोषण करने वाली नदियों के जल को प्रदूषित कर दिया गया। कब्ज़ाकारी ताक़तों ने सुनियोजित तरीक़े से वहां की धरती को रेडियो एक्टिव पदार्थों के द्वारा प्रदूषित कर दिया। लाखों-लाखों बच्चे कुपोषण और बीमारी से मर गए. लाखों-लाखों महिलाएं विधवा हो गयीं। इराक के पुस्तकालय और संग्रहालय, जिनमें किसी समय उस प्राचीन सभ्यता के अनमोल संपदा संग्रहीत करके रखे जाते थे, उन्हें लूटा गया और तहस-नहस कर दिया गया।

अमरीकी क़ब्ज़ाकारी ताक़तों ने इराक के अंदर सैकड़ों कैदखाने स्थापित किए, जिनमें आज़ादी के लिए लड़ने वाले दसों-हजारों देशभक्तों और मुक्ति-योद्धाओं को बेमिसाल यातनाओं का शिकार बनाया गया और बाद में उनका क़त्ल भी कर दिया गया। अमरीकी क़ब्ज़ाकारी ताक़तों ने फ़र्जी मुक़दमे के बाद सद्दाम हुसैन को अपने क़ब्ज़े में कर लिया और उनकी हत्या कर दी। जब इराक के लोगों ने उस क़ब्ज़ाकारी जंग का डटकर विरोध किया, तो अमरीकी साम्राज्यवादियों ने इराक के लोगों के बीच में गुटवादी जंग को भड़काया और पश्चिम एशिया के नक्शे को अपने मंसूबों के अनुसार, फिर से बनाने की अपनी योजना को लागू किया। उन्होंने आई.एस.आई.एस. जैसे आतंकवादी गिरोहों को स्थापित किया, धन और हथियार देकर लामबंध किया, और उनके सहारे लोगों की एकता को चकनाचूर करने की कोशिश की और अलग-अलग देशों व लोगों पर अमरीकी साम्राज्यवाद के अपराधों को ज़ायज़ ठहराने का प्रयास किया।

इराक पर हमला करने और सद्दाम हुसैन की सरकार को गिराने के पीछे अमेरिका की एक मुख्य वजह यह थी, कि नवंबर 2000 में इराक ने डॉलर के बजाय यूरो में तेल का व्यापार करने का फ़ैसला किया था। उससे एक साल पहले,1999 में जर्मनी और फ्रांस की अगुवाई में यूरोपीय संघ ने यूरो को यूरोपीय संघ की सांझी मुद्रा के रूप में स्थापित किया था। यूरो का विस्तार होने से, अंतरराष्ट्रीय विनिमय की मुद्रा के रूप में अमरीकी डॉलर का जो प्रधान रूतबा था, उसको ख़तरा पहुंच रहा था। यूरो को व्यापार की मुद्रा बनाकर इराक की सरकार, एक तरफ जर्मनी और फ्रांस तथा दूसरी तरफ अमरीका और ब्रिटेन, उनके बीच में प्रतिबंधों के मुद्दे पर बंटवारा करने की कोशिश कर रही थी। असलियत में, जर्मनी और फ्रांस इराक पर अमरीकी हमले का समर्थन नहीं कर रहे थे। यह याद रखना चाहिए कि प्रथम खाड़ी युद्ध, जो 1991 में समाप्त हुआ था, उसके बाद अमरीकी साम्राज्यवादियों ने इराक पर बड़ी बेरहमी से आर्थिक प्रतिबंध लागू किए थे, जिनकी वजह से इराक के लोगों को बहुत कष्ट झेलने पड़े थे।

दुनिया में कई स्वतंत्र न्याय आयोगों ने एक के बाद दूसरी अमरीकी सरकारों को, इराकी लोगों के ख़िलाफ़ युद्ध अपराधों के लिए दोषी ठहराया है। परंतु बुश, चेनी और उनके बाद आए युद्ध अपराधियों को कोई सज़ा नहीं दी गई है। इराक पर हमला करके उसका विनाश करने के बाद, अमरीकी साम्राज्यवादियों और उनके मित्रों ने लीबिया पर बम बरसा कर उस देश को नष्ट किया तथा लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी की बेरहमी से हत्या की। अमरीकी साम्राज्यवादियों और उनके मित्रों ने सीरिया, वेनेजुएला, यूक्रेन, जॉर्जिया और कई अन्य देशों में शासन परिवर्तन करने के लिए, तरह-तरह के आतंकवादी और फासीवादी गिरोहों तथा विपक्षी बलों को हथियार और धन दिए हैं। इन सभी बातों को, अमरीकी साम्राज्यवाद की अपनी हुक्मशाही के तले एक-ध्रुवीय दुनिया स्थापित करने की कोशिशों के संदर्भ में समझना होगा।

आज अमरीकी साम्राज्यवादी और उनके मित्र, जिनका न सिर्फ इराक बल्कि कई अन्य देशों में मौत और तबाही फैलाने का घिनौना इतिहास है, यह दिखावा करने की कोशिश कर रहे हैं कि वे यूक्रेन के लोगों के अधिकारों के हिमायती हैं। अमरीका नाटो को पूर्व की तरफ, रूस की सरहदों तक विस्तृत करने की कोशिश कर रहा है, रूस को धमकाने और रूस का विनाश करने की कोशिश कर रहा है। अमरीका रूस के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर, जंग फरोशी की मुहिम चला रहा है। अमरीका ने रूसी लोगों पर बहुत ही कठोर प्रतिबंध लगा रखे हैं और यूरोपीय तथा अन्य मित्रों को उसके क़दम से क़दम मिलाने को मजबूर कर रहा है। अमरीका जर्मनी और यूरोपीय संघ को मजबूर करने की कोशिश कर रहा है कि वे रूस से गैस ख़रीदना बंद कर दें, जिससे जर्मनी और रूस, दोनों कमजोर हो जाएंगे। अमरीका बड़े सोचे-समझे तरीक़े से यूक्रेन को रूस के ख़िलाफ़ भड़का रहा है और रूस व यूक्रेन के बीच की समस्याओं का राजनीतिक समाधान करने की रूस की सभी कोशिशों को रोकने का प्रयास कर रहा है। अमरीका दुनिया के कई देशों की सरकारों पर दबाव डाल रहा है और उन्हें धमकी दे रहा है, ताकि वे अमरीका के रूस-विरोधी अभियान के साथ, क़दम से क़दम मिलाकर चलें।

अमरीकी साम्राज्यवाद सारी दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने की कोशिश कर रहा है जिसकी वजह से, बड़े पैमाने पर मौत व तबाही के फैलने का ख़तरा बढ़ रहा है। सारी दुनिया के लोगों को, जो मानव अधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों की हिफ़ाज़त करते हैं, जो राष्ट्रों के आत्म-निर्धारण के अधिकार की हिफ़ाज़त करते हैं, एकजुट होकर इस तबाहकारी रास्ते का पर्दाफाश करना चाहिए और इसका जमकर विरोध करना चाहिए।

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