किसान आन्दोलन: वर्तमान स्थिति और आगे की दिशा

मज़दूर एकता कमेटी द्वारा आयोजित आठवीं सभा

‘किसान आन्दोलन: वर्तमान स्थिति और आगे की दिशा’, इस विषय पर मज़दूर एकता कमेटी द्वारा 22 फरवरी, 2022 को आयोजित, इस श्रृंखला की आठवीं सभा में  मुख्य वक्ता हरपाल सिंह संघा थे। वे आजाद किसान कमेटी, दोआबा (पंजाब) के जुझारू नेता हैं। संयुक्त किसान मोर्चा (एस.के.एम.) में आजाद किसान कमेटी, दोआबा (पंजाब) एक सक्रिय सदस्य है।

हरपाल सिंह संघा जी ने अपने इलाके में तथा पूरे पंजाब में किसानों को जागृत करने के अपने काम के बारे में सभा को बताया। दिल्ली की सरहदों पर किसानों ने आंदोलन को जारी रखने में जो बहादुरी दिखाई, उसका विवरण करके सभा में जोष भरते हुये, उन्होंने ऐलान किया कि “आंदोलन में एक नयी ऊर्जा है। आत्म विश्वास है कि हम एकजुट होकर लड़ सकते हैं और बड़े से बड़े दुश्मन को हरा सकते हैं।”

हरपाल सिंह संघा के भाषण के बाद, मज़दूर एकता कमेटी की ओर से संतोष कुमार ने अपने विचार रखे। देश के अनेक इलाकों से और कई अन्य देशों से मजदूरों और किसानों के संघर्षाें में रुचि रखने वाले अनेक कार्यकर्ताओं ने सभा में भाग लिया। उनमें से कई कार्यकर्ताओं ने किसान आन्दोलन और देष की वर्तमान स्थिति पर अपने विचार रखे तथा मुख्य वक्ता से अपने सवाल पूछे।

हरपाल सिंह संघा का वक्तव्य

मैं पंजाब के होशियारपुर इलाके से हूं और आज मैं आजाद किसान कमेटी, दोआबा (पंजाब) की ओर से बात करूंगा।

मोदी सरकार की दूसरी पारी के समय से अपने देश के लोगों पर एक बड़ा हमला हो रहा है। पहले असम के लोगों पर, फिर जम्मू और कश्मीर के लोगों पर और उसके बाद पंजाब के किसानों पर।

ज्यादातर किसानों के पास छोटी जोतें हैं। सरकार ने हिन्दोस्तान के कार्पोरेट घरानों के हित में मज़दूरों और किसानों पर हमला किया है। छोटे और सबसे ग़रीब किसानों की ज़मीन कार्पोरेट घरानों के हाथों में दे दी जायेगी। परन्तु, क्योंकि पंजाब के किसान सचेत हैं, वे इन हमलों के पीछे के उद्देश्यों को समझ गये हैं। उन्होंने इसके विरोध में आंदोलन शुरू कर दिया।

मैं आपको इस इलाके (दोआबा) के बारे में बताना चाहता हूं। इस इलाके के किसानों की खेती ठीक चलती है। यहां आत्महत्याओं के मामले नहीं हैं। यहां पर किसानों का संगठन नहीं था। यहां आलू, मटर और मक्का बहुत अच्छे से उगता है। चना भी अच्छे से होता है। इस इलाके में खेती की इतनी समस्या नहीं थी।

जब मोदी साहब तीन कृषि कानून लाये, लोगों को लगने लगा कि उनकी जमीन उनके हाथों से जाने वाली है। हाल ही में पंजाब के मालवा इलाके में आंदोलन शुरू हो गया था। पंजाब के किसानों को जागृत करने के लिये हम एक गांव से दूसरे गांव जाने लगेे। हमने किसानों को उन एक्शनों में शामिल करना शुरू कर दिया, जो कमेटी तय करती थी। हम कमेटी के सभी फैसलों को लागू कर रहे थे। जब उन्हें पता चला कि होशियारपुर के इस इलाके में हमारा संगठन सक्रिय है, तब उन्होंने हमारे संगठन को भी मोर्चे में शामिल कर लिया। इसके दो महीने बाद पंजाब के संगठनों ने दिल्ली जाने का फैसला लिया। हम भी दिल्ली गये और इस कार्यक्रम में शामिल हुए।

मोदी सरकार कार्पोरेट घरानों के लिये काम कर रही है और किसानों की जमीनें कार्पोरेटों के हवाले करना चाहती है। इस मुद्दे पर पंजाब के बहुत से लोग साथ में आये और संगठित होकर संघर्ष के रास्ते पर उतरे। एक साल तक किसान दिल्ली की सरहदों पर बैठे। बारी-बारी से किसानों के जत्थे सरहदों पर आये। हमने गांवों में अपना काम जारी रखा और गांवों से और भी किसान संघर्ष से जुड़ते गये।

13 महीने तक दिल्ली की सरहदों पर संघर्ष चलता रहा। सरकार ने संघर्ष को तोड़ने का हर तरीका अपनाया। धरने के पास के इलाकों में उन्होंने निवासियों को उक्साया कि आपके लिये सड़कें बंद हो रही हैं, कि आपका धंधा ठप्प हो जायेगा। हमारे साथी, लोगों के साथ मीटिंगें करते रहे और समझाते रहे कि किसान आंदोलन हम सबका आंदोलन है। यह हम सभी के अधिकारों की रक्षा करने के लिये है। इस तरह हमारा आंदोलन जारी रहा।

उन्होंने एक किसान की हत्या भी करवाई, निहंग सिंहों को भड़काया गया और दूसरे तरह के हमले भी करवाये। सरकार ने पूरी कोशिश की कि आंदोलन को बदनाम किया जा सके और इसको ख़त्म किया जा सके। लखीमपुर खीरी कांड हुआ। किसानों को गाड़ियों से रौंदा गया, जिसमें भाजपा के मंत्री के बेटे का हाथ था। हम इस मामले में न्याय के लिये भी संघर्ष कर रहे हैं।

पंजाब के मोर्चे के 32 संगठनों के किसानों के बीच हमने अपना काम जारी रखा। उन्हें जानकारी से लैस किया। सरहदों पर और भी लोग जुड़ते गये। अंत में सरकार को झुकना पड़ा और तीनों कानूनों को वापस लेना पड़ा।

इन कानूनों को वापस लेने में मोदी सरकार की सोच थी कि विधान सभा चुनावों के दौरान अगर आंदोलन जारी रहा तो उन्हें नुकसान होगा। वे चुनाव हार जायेंगे और सत्ता खो देंगे। इसलिये उन्होंने कानूनों को वापस लिया। पर वे इन्हें इस या उस रूप में लागू करने वाले हैं। इसलिये किसान आंदोलन ने इस बात पर जोर दिया है कि इन कानूनों के पीछे बड़े कार्पोरेटों के हित हैं। हमने लोगों को कार्पोरेट घरानों और उनके हाकिमों के खि़लाफ़ लामबंद किया है। हम कह रहे हैं कि देश हमारा है, पर अपने देश पर राज कर रहे हैं बड़े सरमायदार और कार्पोरेट।

वर्तमान व्यवस्था में किसानों के लिये कुछ नहीं है। साल दर साल खेती और मुश्किल होती जा रही है। किसानों को उत्पादों की कीमत नहीं मिलती है। लागत वस्तुओं की कीमतें बढ़ती जा रही हैं। पंजाब के किसानों को पता चल गया है कि सरकार सोच रही है कि संसद में इतने बड़े बहुमत के साथ वह किसानों की जमीनों को कार्पोरेट घरानों के सुपर्द कर सकेगी और किसानों को मज़दूरों में तब्दील कर देगी।

दिल्ली की सरहदों पर 13 महीने तक यह संघर्ष चला और पंजाब में उससे दो महीने पहले से चल रहा था। किसान अपने गांवों और सरहदों के बीच आते-जाते रहे। अपनी फ़सलों की देखभाल भी की और संघर्ष में भी हिस्सा लिया। लगातार संघर्ष करने का यही तरीका है जिससे फतह मिल सकती है। आने वाले दिनों में संघर्ष और तेज़ होगा। मज़दूरों और किसानों को एकजुट होकर लड़ना होगा और बड़े सरमायदारों और कार्पोरेट घरानों को हराना होगा। हम उनको पीछे हटने को मजबूर कर सकते हैं।

आंदोलन पंजाब से शुरू हुआ। पहले-पहले हरियाणा में कोई आंदोलन नहीं था। पर जब हमने शंभू बार्डर को पार किया तब हरियाणा के नौजवान अपने ट्रैक्टरों के साथ हमसे जुड़ गये। हमारे संघर्ष ने हरियाणा, उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों तथा देश के विभिन्न इलाकों के संगठनों को एकजुट किया है। आंदोलन में एक नयी ऊर्जा है। आत्म विश्वास है कि हम एकजुट होकर लड़ सकते हैं और बड़े से बड़े दुश्मन को हरा सकते हैं। यही एक रास्ता है। अपने अधिकारों की रक्षा का कुछ और शोर्टकट नहीं है।

सभी किसान संगठन एक साथ बैठकें कर रहे हैं, एक दूसरे से सलाह-परामर्श कर रहे हैं और संघर्ष की लाइन तय कर रहे हैं। हम कार्पोरेट घरानों और उनके हाकिम, मोदी के अजेंडे को रोक पाये हैं।

आंदोलन का एक हिस्सा वोटों के पीछे चला गया है। इससे हमारा संघर्ष कुछ हद तक कमजोर हुआ है। परन्तु यह साफ़ है कि हम कार्पोरेट घरानों और उनके हाकिम को हरा सकते हैं बशर्ते हम एकजुट होकर संघर्ष करें। हमारे संघर्ष ने सभी मेहनतकशों के संघर्ष के रास्ते पर प्रकाश डाला है। एक प्रांत से शुरू हुआ एक आंदोलन देशभर और दुनिया के दूसरे देशों में भी फैल सकता है, कि लोगों को जागृत किया जा सकता है, उन्हेें अपने अधिकारों की रक्षा के लिये और बड़े सरमायदारों व कार्पोरेट घरानों को हराने के लिये एकजुट और लामबंध किया जा सकता है।

सभा के अंत में हरपाल सिंह संघा ने सहभागियों के विचारों और सवालों को संबोधित किया।

उन्होंने कहा कि सभी सभागियों के अनुभवों और विचारों से हमारे संघर्ष को मजबूती मिलती है। हमारा संघर्ष अभी पूरा नहीं हुआ है। हुक्मारान बड़े चालाक हैं। वे किसी न किसी तरह हमें गुमराह करके, अपना एजेंडा लागू करने की पूरी कोषिष करेंगे। हमें संघर्ष को जारी रखना होगा क्योंकि अभी भी हमारे सामने बहुत सारे ऐसे मुद्दे हैं जिनका समाधान नहीं हुआ है।

तीन किसान कानूनों के वापस लिये जाने के बाद, अब हमारे सामने कई और मुद्दे हैं। एम.एस.पी. का मुद्दा है, बिजली कानून 2021 का मुद्दा है, आंदोलन में शहीद हुये किसानों के परिवारों को मुआवजा देने का मुद्दा है और आंदोलन के दौरान हमारे कई किसानों पर लगाये पुलिस केस को वापस करवाने का मुद्दा है।

संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है। हम एकजुट होकर ही अपने लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं। हमारे बीच में इस बात पर कोई दो राय नहीं है कि अपने मकसदों को पूरा करने के लिये संघर्ष ही एक रास्ता है। हम अपने संघर्ष में अवष्य जीत हासिल करेंगे।

मैं इस चर्चा में भाग लेने वाले सभी साथियों को शुक्रिया अदा करता हूं कि उन्होंने अपने कीमती विचारों और प्रस्तावों से हमें उत्साह और ताकत दी है।

मैं मज़दूर एकता कमेटी को इस जूम मीटिंग को आयोजित करने के लिये एक बार फिर धन्यवाद देता हूं।

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