कामरेड लाल सिंह का संदेश :
हम जस्टिस अजीत सिंह बैंस के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हैं

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जस्टिस अजीत सिंह बैंस (1922 – 2022)

मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक अधिकारों के जुझारू सेनानी जस्टिस अजीत सिंह बैंस का 11 फरवरी, 2022 को 99 वर्ष की आयु में चंडीगढ़ में अपने घर में निधन हो गया। सभी प्रकार के शोषण, दमन और अन्याय से समाज की मुक्ति के लिये संघर्ष को, उनके निधन से, बड़ा नुक़सान हुआ है। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, इस साहसी और प्रगतिशील शख़्सियत की याद में, अपना झंडा झुकाती है।

14 मई 1922 को पंजाब के बडापिंड में जन्मे अजीत सिंह बैंस, अपने सक्रिय जीवन में लोगों और उनकी चिंताओं के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे। उनके पिता एक कम्युनिस्ट थे जिन्होंने अपने बच्चों के मन में, मानवता की सेवा करने का आदर्श  विकसित किया। अजीत सिंह ने लखनऊ में अपनी कानून की डिग्री पूरी की और कुछ समय तक पंजाब के शिक्षा विभाग में काम किया। 1953 में उन्होंने कानून को एक पेशे के रूप में अपनाया। अक्टूबर 1974 से, मई 1984 में अपनी सेवानिवृत्ति तक, वे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। उन्होंने अपने जीवन काल में, सभी मेहनतकशों और उत्पीड़ित बहुसंख्यक लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक निडर सिपाही होने की प्रतिष्ठा अर्जित की।

1984 में जब जस्टिस बैंस, सक्रिय सेवा से सेवानिवृत्त्त्त हुए, तब पंजाब में उथल-पुथल मची हुई थी। जून में स्वर्ण मंदिर पर सेना के हमले और नवंबर में सिखों के नरसंहार के बाद, पंजाब में सेना के शासन के तहत, आम लोगों पर राजकीय आतंकवाद बढ़ाया गया। ऐसी परिस्थितियों में, जब लोगो के अधिकारों पर हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा एक जबरदस्त हमला किया जा रहा था, जस्टिस बैंस, लोगों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले एक साहसी और दृढ़ सिपाही के रूप में उभरे।

जस्टिस अजीत सिंह बैंस ने पंजाब मानवाधिकार संगठन (पी.एच.आर.ओ.) की स्थापना की और उसका नेतृत्व किया। पी.एच.आर.ओ. ने आधिकारिक सुरक्षा बलों के लोक-विरोधी और मानव-विरोधी कृत्यों का पर्दाफाश करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। पंजाब मानवाधिकार संगठन ने इस सच को उजागर किया कि कैसे हज़ारों बेकसूर युवाओं को उनके गांवों से गिरफ़्तार किया गया था, उनको यातनाएं दी गई थीं और हिरासत में उनकी हत्या करके उनके शवों को नहरों में फेंक दिया गया था।

अप्रैल 1992 में, पंजाब और चंडीगढ़ पुलिस ने जस्टिस बैंस को कुख्यात टाडा याने कि आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरफ़्तार किया और हथकड़ियां लगाईं। उन पर आतंकवाद का समर्थन करने का इलज़ाम सिर्फ इसलिए लगाया गया क्योंकि उन्होंने पंजाब में हिंसा और आतंक फैलाने के लिए केंद्रीय एजेंसियों की निंदा की थी। जस्टिस बैंस के विचार, जिसके लिए उन्हें गिरफ़्तार किया गया था, उनके द्वारा लिखी गई दो महत्वपूर्ण पुस्तकों में अभिव्यक्त हैंः सिखों की घेराबंदी (अगस्त 1988) और राजकीय आतंकवाद और मानवाधिकार (जुलाई 1992 में लिखी गयी पुस्तक, जब वे जेल में कैद थे)।

अपने विचार व्यक्त करने के जस्टिस बैंस के मौलिक अधिकार के समर्थन में, हिन्दोस्तान और विदेशों में, प्रगतिशील ताक़तों ने अपनी आवाज़ बुलंद की थी। उन्होंने जस्टिस बैंस की गिरफ़्तारी की सख़्त निंदा की थी और उनकी तत्काल रिहाई की मांग की थी। अत्यंत ही प्रतिकूल अंतरराष्ट्रीय जनमत के दबाव में, हिन्दोस्तानी सरकार ने जस्टिस बैंस के ख़िलाफ़ सभी आरोपों को वापस लेने का फैसला किया। चार महीने जेल में रखने के बाद उनको रिहा कर दिया गया था।

बाबरी मस्जिद के विध्वंस और संसद में मौजूद प्रमुख राजनीतिक पार्टियों द्वारा सांप्रदायिक हिंसा की शुरुआत के बाद, जस्टिस अजीत सिंह बैंस ने अप्रैल 1993 में लोगो को सत्ता में लाने के लिए समिति (प्रेपरेट्री कमेटी फाॅर पीपल्स  एम्पावरमेंट) की स्थापना के लिए, अन्य मानवाधिकार-कार्यकर्ताओं, मज़दूरों और महिलाओं के संगठनों के साथ मिलकर काम किया। जब यह समिति आगे चलकर लोक राज संगठन के रूप में स्थापित हुई तब जस्टिस बैंस ने इसके उपाध्यक्ष बतौर अपना योगदान दिया।

जस्टिस अजीत सिंह बैंस का निधन हमारी पार्टी के लिए और उन सभी लिए एक बहुत बड़ी क्षति है, जो लोगों के अधिकारों और उनको सत्ता में लाने के लिए संघर्षरत हैं। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति की ओर से, मैं उनके शोक संतप्त परिवार – उनकी पत्नी रचपाल कौर, उनके चार बच्चों और अनेक पोते-पोतियों, उनके भाइयों और बहनों और उनके परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं।

हार्दिक संवेदनाओं और सम्मान के साथ

लाल सिंह,
महासचिव, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी

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