किसान आंदोलन – वर्तमान स्थिति और आगे की दिशा

मज़दूर एकता कमेटी द्वारा आयोजित पांचवीं सभा

11 जनवरी, 2022 को मज़दूर एकता कमेटी (एम.ई.सी.) ने ‘किसान आंदोलन – वर्तमान स्थिति और आगे की दिशा’ विषय पर पांचवीं सभा आयोजित की।

सभा में मुख्य वक्ता थे डा. दर्शनपाल, क्रांतिकारी किसान यूनियन, पंजाब। क्रांतिकारी किसान यूनियन, पंजाब संयुक्त किसान मोर्चा (एस.के.एम.) का एक संस्थापक सदस्य है। इस मोर्चे में 500 से अधिक किसान संगठन शामिल हैं और यह देशभर के किसानों के संघर्ष को अगुवाई दे रहा है। एक महीने पहले, 11 दिसंबर, 2021 को संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली की सरहदों पर अपने सालभर के आंदोलन को स्थगित करने की घोषणा की थी। एस.के.एम. ने यह फैसला तब लिया था जब तीनों किसान-विरोधी कानून, जो 2020 में ससंद में पास किये गये थे, वापस लिये गये और केन्द्र सरकार ने किसानों की बाकी मांगों पर लिखित आश्वासन दिया।

बिरजू नायक ने एम.ई.सी. की ओर से सभा का संचालन किया। उन्होंने क्रांतिकारी किसान यूनियन, पंजाब के काम का संक्षेप परिचय दिया। इसके बाद उन्होंने डा. दर्शनपाल को सभा को संबोधित करने का आह्वान किया। डा. दर्शनपाल के भाषण के बाद एम.ई.सी. की ओर से संतोष कुमार ने अपना वक्तव्य पेश किया। उसके बाद बहुत ही उत्साहपूर्ण चर्चा हुई, जिसमें देश के अलग-अलग इलाकों से तथा ब्रिटेन, कनाडा और आस्ट्रेलिया से अनेक कार्यकर्ताओं ने किसान आंदोलन की आगे की दिशा पर अपने विचार दिये।

मज़दूर एकता कमेटी द्वारा आयोजित इस सभा में डा. दर्शनपाल की प्रस्तुति को हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं।

डा. दर्शनपाल, क्रांतिकारी किसान यूनियन, पंजाब की प्रस्तुति

साथियों,

किसान आन्दोलन आज किस परिस्थिति में है और इसका भविष्य क्या है? – यही है आज की मीटिंग का अजेंडा।

आज की परिस्थिति क्या है? मैं यह बात कहना चाहता हूं कि आन्दोलन ने पिछले साल 2020 से लेकर 2021 तक जो एक माहौल बनाया था, उस लम्बे आन्दोलन के चलते ऐसा लगने लगा था कि शायद यह आन्दोलन अपने देश में कोई राजनीतिक बदलाव की तरफ ले जायेगा। क्योंकि इसमें केवल किसान ही नहीं, किसानों के अलावा, बाकी तबके के लोग थे। उनमें भी एक इस तरह की फिलिंग आ रही थी या आन्दोलन करने की जिज्ञासा उठ रही थी और उठी भी। ऐसा लगने लगा कि देश में एक बड़े जन आन्दोलन का उभार बन सकता है।

लेकिन हुआ यह कि मोदी जी ने अचानक 19 नवंबर को तीन कानून वापस लिए और आन्दोलन को एक तरह से सस्पेंड करने के लिए हमें मजबूर होना पड़ा। बाकी मुद्दों पर भी बीजेपी/एनडीए की सरकार ने हमसे कुछ वादे किए और हम ने 11 दिसंबर को आंदोलन को स्थगित किया।

उसके बाद की परिस्थिति में जाने से पहले, मैं सबसे पहले वहां से शुरू करूंगा, जो आन्दोलन की वास्तविकता है। आन्दोलन को उन सब मुद्दों को उठाना पड़ा, जिन मुद्दों पर किसानों ने कभी नहीं सोचा था, जैसे कि सीधे कारपोरेट के साथ संघर्ष में जायेंगे, या सीधे केन्द्र सरकार के साथ इस तरह का टकराव होगा। जो इस आन्दोलन में हुआ।

इसके बारे में, मैं बहुत पहले, बहुत जगहों पर अपनी बातें रख भी चुका हूं। आज भी यहां रखने की कोशिश करूंगा। क्या-क्या ख़ासियतें इस आन्दोलन में थीं, जबसे आन्दोलन शुरू हुआ, 11 दिसंबर तक। आन्दोलन में क्या-क्या चीजें थीं, जो इस आन्दोलन को इस तरह का बना पाईं। वह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि आगे जो भी आन्दोलन होने हैं, उन्हें इन सब चीजों का ज़रूर ध्यान रखना होगा, उसके तर्जेुबे से, सबकों सीखकर, उनको अपने आंदोलनों में जोड़ना होगा।

किसान आन्दोलन का विश्लेषण करने के लिये, हमें यह बात जानना बहुत ज़रूरी है कि मध्य प्रदेश के मंदसौर में 6 किसान शहीद हुए। उस शहादत के बाद भारत के किसान संगठनों में एक साथ आने की एक आकांक्षा उठी। 6 जून (2017- संपादक) को मंदसौर की घटना हुई। मुझे लगता है कि 13 या 14 जून को एक बड़ी मीटिंग गांधी पीस फाऊंडेशन दिल्ली में हुई। मैं पहले भी किसान संगठनों की बैठकों में जाता रहता था। लेकिन पहली बार, मैं देखता हूं कि विभिन्न विचार, राजनीति, विश्वास वाले किसान संगठनों के नेता उस मीटिंग में एक मंच पर आए थे। उस मीटिंग में बहुत सारे मुद्दों को लेकर चर्चा हुई। मीटिंग में दो मुद्दों को लेकर सहमति हुई। किसान की संपूर्ण कर्ज़ मुक्ति और एम.एस.पी. की गारंटी इन दोनों मुद्दों को लेकर किसानों को एकताबद्ध करने का फ़ैसला हो गया। इस मीटिंग में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (ए.आई.के.एस.सी.सी.) बनी। उसके बाद इसी मंच से पूरे देश में यात्राएं निकली, दिल्ली में किसान संसद लगी। दिल्ली में बड़ी-बड़ी रैलियां भी हुईं। दो-ढाई साल तक यह प्रक्रिया चली। उसके बाद हम देखते हैं कि 20 मार्च, 2020 को देश में लॉकडाउन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। लॉकडाउन के दौरान भी अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की तरफ से कुछ न कुछ गतिविधि जारी रही।

4 जून (2020 संपादक) को खेती के तीन कानून का अध्यादेश आया। उन अध्यादेशों के मुद्दे को पंजाब के संगठनों ने गंभीरतापूर्वक नहीं उठाया। इस मुद्दे को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की अगुवाई में पंजाब के संगठनों ने उठाया।

मैं यह कहना चाहता हूं कि उस समय भी सामूहिक समझ और नेतृत्व थी। मुझे यह याद है कि जिस दिन ये तीन अध्यादेश आए, व्यक्तिगत तौर पर मैंने तुरंत उन तीन अध्यादेशों के मूलपाठ को बैंगलोर में अपने एक साथी के पास भेजा, जो ए.आई.के.एस.सी.सी. की वर्किंग ग्रुप मेम्बर थीं। तत्काल उसके साथ पूरी चर्चा की और हमने उन अध्यादेशों का खुलासा पंजाब में करना शुरू कर दिया। यह प्रक्रिया पंजाब में थोड़ी ज्यादा सक्रियता, तेज़ी और व्यापकता से चली। यह उसकी ख़ास विशेषता है। क्योंकि अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने फ़ैसला करके दो-तीन तरह का बुलावा दिया था कि पहला, प्रधानमंत्री को पत्र लिखेंगे। दूसरा, पंजाब में, पूरे देश में एन.डी.ए. सहयोगियों के घरों या उनके दफ़्तरों के सामने धरना करेंगे। यह बुलावा हमने बार-बार दिया था। उसकी व्यवहारिक लामबंदी थी। उन दिनों की मीडिया में आप देखेंगे कि पंजाब में लामबंदी फिजिकल हो रही थी। बाकी प्रांतों में कोरोना- लॉकडाउन की वजह से बहुत ही प्रतीकात्मक/टोकन भागीदारी होती थी। लेकिन पंजाब में काफी बड़े पैमाने पर लामबंदी हो रही थी। मैं एक घटना बताना चाहता हूं। पंजाब के 10 संगठन, ऑफ अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के पंजाब चैप्टर ने अपनी तरफ से स्वतंत्र बुलावा भी दिया। हमने बुलावा दिया कि पंजाब के सभी जिलों में, एन.डी.ए. सहयोगियों के दफ्तरों और घरों के सामने एक डिमांड चार्टर लेकर किसान जायेंगे। इस चार्टर को हम लोगों ने बनाया था। इसकी गाइड लाइन्स अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति से आयी थी, जिसको पंजाब में उसको पूरा लागू किया गया। शायद जुलाई महीने के अंत से अगस्त के पहले हफ्ते तक, पंजाब में ट्रैक्टर मार्च हुआ।

पहली बार हमने महसूस किया कि ट्रैक्टर मार्च में पंजाब का नौजवान आ रहा है जो  मार्च में 65-75 फीसद है। पहले किसान संगठनों में बुजुर्ग 50-55 वर्ष के ऊपर के लोग आते थे। ये नौजवान ट्रैक्टर मार्च में बहुत ही ऊंचे स्वर में गाने लगाकर बहुत ही तेज स्पीड में ट्रैक्टर को चलाकर शहरों में मार्च करते हुए, बीजेपी और अकाली दल के प्रतिनिधियों के घरों की तरफ गए। ऐसा दुबारा किया गया, फिर बड़े पैमाने पर नौजवान आये पंजाब में यह जो आंदोलन बना, इसमें पंजाब के नौजवानों द्वारा इतना दबाव बढ़ गया कि पंजाब की अकाली दल, जो एन.डी.ए. की सहयोगी थी उसे एन.डी.ए. से अपना रिश्ता तोड़ना पड़ा। उसकी एकमात्र सेंट्रल मिनिस्टर हरसिमरत कौर को मिनिस्टरी छोड़नी पड़ी। मैं कहना यह चाहता हूं कि पंजाब की पूरी सोसाइटी जिसमें नौजवान, धार्मिक संगठन, राजनीतिक दल, उनके साथ आ मिले, जो पूरे किसान आन्दोलन के साथ तीन क़ानून और बाकी मुद्दे उठा रहे थे। यह सब अगस्त के महीने तक हो गया। इसके बाद हम देखते हैं।

पूरे पंजाब में आन्दोलन में 10 किसान संगठनों के अलावा और भी संगठन थे। सभी किसान संगठनों ने आपस में बैठकर, मिलकर काम करने का फ़ैसला किया और 28 संगठनों का एक मोर्चा बन गया।

इस मोर्चे की ओर से 25 सितम्बर (2020 संपादक) को पंजाब बंद का बुलावा दिया गया। यह बंद पूरी तरह से सफल रहा, आप कह सकते हैं कि एक परिंदा भी सड़क पर नहीं था। पूरे पंजाब में नौजवान अपनी गाड़ियां लेकर, कार लेकर, मोटरसाईकल लेकर, जीप लेकर जश्न मनाते हुए घूम रहे थे बंद को सफल बनाने के लिए।

ट्रैक्टर मार्च के दिन और बंद वाले दिन ऐसा लग रहा था कि पंजाब, दिल्ली के साथ एक बड़ी लड़ाई लड़ने जा रहा है। इस माहौल में पंजाब के और किसान संगठन भी आ मिले। उन्होंने प्लान किया कि अब इसकी दिशा को केंद्र सरकार की तरफ मोड़ा जाए। उस दिशा के लिये बी.के.यू. एकता उगराहां और किसान मजदूर संघर्ष समिति ने बोल दिया कि हम भी आपके साथ (वो पंजाब किसान6 संगठनों के साथ शामिल नहीं हुए बाहर से समर्थन दे रहे थे) हैं। और बाकी संगठनों का एक मोर्चा बनाया गया और जो भी छोटे-छोटे संगठन बाहर थे, उनका भी यह संदेश आया कि आप जो फ़ैसला लेंगे, हम आपके साथ रहेंगे। फिर शुरू होता है वह जंग जो सीधे दिल्ली के साथ।

फिर क्या था, पहला, पूरे पंजाब में सभी रेलवे ट्रैकों को जाम कर दिया। दूसरा, पूरे पंजाब के टोल प्लाजा को फ्री कर दिया गया। तीसरा, फ़ैसला लिया गया कि पंजाब में अडानी और अंबानी के जो भी उत्पाद और सर्विस थे, उनका बायकाट कर दिया जाये, उनके पेट्रोल पंप को सीज किया जाए, उनके माल्स के सामने धरना लगाकर बैठा जाये। अकाली दल बीजेपी से उस समय अलग हो चुका था। पहले हम घोषणा कर चुके थे कि बीजेपी और अकाली दल के लोग गांव में आयेंगे तो हम गांव में घुसने नहीं देंगे। उसी डर की वजह से और दबाव के चलते अकाली दल एनडीए से बाहर आ चुका था। इसके बाद बीजेपी के जो भी प्रतिनिधि हैं, उनके दफ्तरों और घरों के सामने धरने लगाकर बैठा गये। मैं इसे चार पॉइंट पैकेज कहूंगा। बीजेपी का विरोध, टोल प्लाजा को फ्री कर देना, रेल ट्रैक को बंद करना और पेट्रोल पंप, माल्स को बंद करना। इसके बारे में अख़बारों ने भी लिखा है। बाद में यह स्थापित हुआ, जिसे हम पंजाब मॉडल ऑफ स्ट्रगल कह सकते हैं। यह मॉडल काफी क़ामयाब हुआ। पंजाब सरकार और केन्द्र सरकार, दोनों हिल गए। शायद 19 अक्तूबर (2020 संपादक) का दिन था। कैसे पंजाब सरकार ने पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर प्रस्ताव पास किया, जिसमें हर पार्टी के विधायकों ने जुलूस के रूप में राज्यपाल को प्रस्ताव देकर आए जिसमें दो बीजेपी विधायक को छोड़कर बाकी सभी विधायक एक साथ थे। मतलब सब राजनीतिक पार्टियां किसानों के पक्ष में अपनी आवाज़ उठाने को मजबूर हो गई थीं। जिसमें पंजाब की सरकार भी शामिल थी।

इस दबाव में आकर केन्द्र सरकार ने 8 तारीख को हमें बैठक में आने का न्यौता दिया। हमारी बातचीत चली तो एस.एस. अग्रवाल कृषि सचिव ने कहा कि हम आपको समझायेंगे-बुझायेंगे, क्या क़ानून है, कैसे किसानों के पक्ष में है, आप आइए बैठिए, अगर आप चाहोगे तो हम मंत्री जी से मिला देंगे। हम पंजाब के संगठनों ने मीटिंग करके तय किया और उनको जवाब दे दिया कि हम आपकी मीटिंग में नहीं आयेंगे। हमने उस मीटिंग का बॉयकाट किया। रेल ट्रैक पर जाम जारी रहा। पूरा संघर्ष चल रहा था। बीजेपी के लोगों को बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा था। फिर से केन्द्र सरकार ने 14 अक्तूबर को दिल्ली बुलाकर बोला कि हम कृषि मंत्री से भी मिलवायेंगे। हम यहां से गए। बकायदा मीटिंग रखी गई लेकिन जैसे ही हम ऑफिस में घुसे, सचिव एस.एस. अग्रवाल ने परिचय देना शुरू किया। हमने बोला कि मंत्री जी कहां हैं? वे बहानेबाजी करने लगे। हमने बोला कि आपके एक मंत्री पंजाब में गए हुए हैं और दूसरे आप बोल रहे हैं कि दूसरी मीटिंग में हैं और प्रेस कांफ्रेंस कर रहे हैं। हमने उनको अपनी बात सुनाई और उस मीटिंग का बायकाट करके चले आए। उस बायकाट को लेकर पूरी दिल्ली की प्रेस मीडिया में आ गया कि पंजाब के किसान मीटिंग का बायकाट करके चले गए। यह अक्तूबर के महीने की बात है, जो अगस्त के महीने में पंजाब में आंदोलन शुरू हुआ था। उसके बाद चीजें केन्द्र सरकार के साथ आगे बढ़ती है। फिर दूसरी मीटिंग भी फेल कर जाती है, जो तीन मंत्रियों के साथ होती है।

इससे पहले, मैं फिर आपको याद कराना चाहता हूं कि अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने 26 और 27 नवबंर को ‘दिल्ली चलो’ का बुलावा दिया था। उधर पंजाब के संगठन पंजाब में संघर्ष कर रहे थे। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के उस फ़ैसले को मैंने उस समय कार्यकारी समूह सदस्य के बतौर, पंजाब के किसान संगठनों को बताया और दिल्ली में 26 अक्तूबर की मीटिंग के लिए आमंत्रित किया, जिसमें देशभर से किसान संगठनों को बुलाया गया। उस मीटिंग में और 27 अक्तूबर को जो दूसरे दिन मीटिंग चली, उसमें सभी किसान संगठन, पंजाब के सभी किसान संगठन, दक्षिण भारत के किसान संगठन शामिल हुए, इसमें बीकेयू के राकेश टिकैत नहीं थे।

उस मीटिंग में तय हो गया कि 26-27 नवम्बर को, जो आंदोलन है, उसको केवल ए.आई.के.एस.सी.सी. नहीं बल्कि पूरे देश के बाकी किसान संगठन भी एक साथ लड़ेंगे। उसके लिये पांच लोगों की कमेटी भी बना दी गई। अभी कुछ संगठन थे, वे उस मोर्चे में नहीं आये, उस समय तक भी बीकेयू एकता उग्रहां एक ओबजरवर थे, उस समय भी वे मोर्चा में शामिल नहीं हुये। लेकिन उसके बाद हमने एक और चांस लिया। पंजाब में आंदोलन चल रहा है, 7 नवम्बर को दिल्ली के गुरूद्वारा रकाबगंज में एक और बड़े संगठनों की मीटिंग होती है। वहां फाइनल किया जाता है कि 26-27 नवम्बर का, जो हमने एक साथ आने का फ़ैसला किया है, पूरे देश में, केवल पंजाब के संगठन नहीं, पूरे देश के संगठन आ रहे हैं। 7 लोगों की कमेटी बन जाती है। इसका नाम संयुक्त किसान मोर्चा (एस.के.एम.) दिया जाता है। 7 नवम्बर, 7 लोगों की कमेटी, जिसमें देश के पूरे संगठन शामिल हैं। राकेश टिकैत साहब इसमें शामिल नहीं थे। उत्तर प्रदेश के कुछ किसान संगठन शामिल नहीं थे। पंजाब के दो संगठन इसमें शामिल नहीं हैं – बीकेयू एकता उग्रहां और किसान मजदूर संघर्ष समिति पंजाब। लेकिन बाकी देश के किसान संगठन उसमें आ गए।

तो फिर शुरू होती है, अगली तैयारी, ख़ासकर पंजाब से। एक हद तक हरियाणा से शुरू होता है। पंजाब के किसान संगठनों का 14 नवम्बर, 2020 को रेलवे मंत्री, कृषि मंत्री और हमारे पंजाब के एक मिनिस्टर से बातचीत फेल हो जाती है। देखिये, उस दिन के बारे में, मैं आपसे शेयर करना चाहता हूं। 14 नवम्बर, 2020 को अगर केन्द्र सरकार थोड़ी सी भी लचीली होती तो हमारा एक समझौता हो जाना था। पंजाब के किसान संगठन तैयार थे। लेकिन रेलवे मिनिस्टर इतने जिद्दी थे कि उन्होंने पंजाब के संगठनों की इस बात को भी नहीं माना कि हम जो गुड्स ट्रेन हैं, उसको अलाउ कर देते हैं, पैसेंजर ट्रेन को नहीं। हमने दोनों ट्रेन को रोका हुआ था। लेकिन पंजाब में उन दिनों गेहूं की बुवाई का सीजन चरम पर था। खाद की ज़रूरत थी, बिजली संयंत्रों के लिए कोयले की ज़रूरत थी, डीजल की ज़रूरत थी। उधर सरकार शोर मचा रही थी कि जम्मू में मिलट्री की बहुत सारी सप्लाई रुकी हुई है। लेकिन हम जिद पर रहे कि गुड्स ट्रेन तो चलाओ पंजाब के लिये लेकिन हम पैसेंजर ट्रेन नहीं चलने देंगे। लेकिन वह मंत्री जिद्दी था, बातचीत टूट गयी।

उसके बाद तैयारी शुरू होती है दिल्ली मार्च की। तो पंजाब में, मैं फिर यह दोहरा दूं कि पंजाब के सब राजनीतिक दल, पंजाब के सब धार्मिक संगठन, पूरे पंजाब की धार्मिक शख़्शियतें – ये सब आंदोलन के पक्ष में आ गए। जैसे मैंने पहले बताया कि पहले ट्रैक्टर मार्च के बाद, पंजाब के नौजवान और सारी राजनीतिक पार्टियां एक साथ आ गयीं, उनसे जुड़े नौजवान भी किसान आंदोलन के पक्ष में आ गए। पूरे पंजाब में आंदोलन की जो आग थी, उसमें किसान दिल्ली की ओर आगे बढ़ने के लिए अंगडाई ले रहे थे। दिल्ली की तरफ बढ़ने के लिये, किसानों ने हर घर में ट्रैक्टर को सजा लिया। ट्रोली को घर बना लिया, म्यूजिक सिस्टम लगा लिया। किसानों ने बड़े पैमाने पर तैयारी की, उसमें ख़ासकर नौजवानों का हिस्सा ज्यादा था। पंजाब के नौजवानों को जो हौसला मिल रहा था, वह थी युनिटी ऑफ़ द पीपल ऑफ़ द पंजाब। ख़ासकर उसमें भी मैं कहना चाहता हूं कि पंजाब का जो बैग्राउंड सिख, धार्मिक इतिहास बलिदान का है, सिखों का योगदान पूरे समाज को है। मुगलों के खि़लाफ़ लड़ाई लड़ी। बस्तीवाद के खि़लाफ़ लड़ाई लड़ी है। उसमें जो योगदान पंजाबियों ने और खासकर जो सिखों ने दिया है, वह भी एक प्रेरणा का स्रोत बन रहा था। पंजाब के लोगों की लड़ाई दिल्ली के साथ थी। दिल्ली उनको औरंगजेब लगता है, दिल्ली उनको ब्रिटिश लगता है, दिल्ली उनको पंजाबियों का दुश्मन जैसा लगता है। यह एहसास था लोगों में और इसमें हर एक आत्मिक, रूहानी, शारीरिक, संगठनात्मक, राजनीतिक, हर प्रकार की जो ऊर्जा थी, शक्ति थी, वह इकट्ठी, एक साथ आ गयी थी।

26 नवम्बर से पहले, जब हमने पंजाब के किसान संगठनों की मीटिंग की थी और संयुक्त किसान मोर्चा की जिस दिन स्थापना हुई थी (7 नवम्बर, 2020, संपादक), उस दिन किसान संगठनों का यहां तक कहना था कि हमें दिल्ली जाना है, पर दिल्ली में हमें घुसने नहीं देंगे। और दिल्ली के बाहर जहां भी हमें रोका जायेगा, वहां हम बैठेंगे और वहीं हम धरना देंगे, दो दिन, तीन दिन अगर ट्रैफिक रुकेगा, फिर तय करेंगे। 7 लोगों की कमेटी बनायी गयी, जो बाकी संगठनों के साथ सलाह-मशवरा करके आगे क्या करना, उसका फ़ैसला करेगी। लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। 26 नवम्बर को जो ऊर्जा, ताक़त, पंजाब के लोगों में आयी, उस दिन हरियाणा-पंजाब के बार्डर पर कोई चार या पांच जगह बैरिकेड लगे हुये थे। किसान संगठन के नेताओं का फ़ैसला था कि बैरिकेड पर रोका जायेगा तो रुखकर वहीं बड़े पंडाल लगा लिया जायें, वहीं बड़ी रैली कर दी जाये, वहीं सड़क को रोक लिया जाये। लेकिन जिस सोच से पंजाब के लोग आए थे, ख़ासकर नौजवान, उनकी ऐतिहासिक दुश्मनी दिल्ली से थी, उनको लग रहा था कि हमें दिल्ली जाना है।

मैं खुद का अनुभव बताता हूं, कि अगर उस दिन कोई भी किसान नेता, वह थोड़ा सा भी विरोध करता या नौजवानों को रोकता, तो किसान नौजवान, उनके खि़लाफ़ हो जाते। लेकिन किसान संगठनों के नेताओं ने दूर दृष्टि दिखाई। 26 नवंबर को और 27 नवंबर को केवल पंजाब नहीं बल्कि मैं तो यह भी कहना चाहता हूं कि पूरा देश, पूरी दुनिया ने पंजाब के लोगों, सिखों के इस रिहरसल को रियल में होते देख रहे थे। दिल्ली की तरफ मार्च हो रहा था। पूरी दुनिया में, न्यूयॉर्क से, लंदन से, ऑस्ट्रेलिया से, बैंगलोर से, बोम्बे से, कलकत्ता से, हर जगह से, टीवी और मोबाइल के स्क्रीन पर देख रहे थे। देख ही नहीं रहे थे, चिंतित थे, चिंतित ही नहीं थे, वे उनके साथ थे। जैसे ही ट्रैक्टरों ने यात्रा शुरू की, ये पूरी दुनिया के लोग, उनके साथ-साथ दिल्ली के बॉर्डर तक चले। दो रात और 1 दिन की यात्रा करके पंजाब के किसान और लोग जैसे ही टिकरी बॉर्डर और सिंघु बॉर्डर पर पहुंचे तो उसके साथ-साथ अन्य संस्थाएं, धार्मिक शख्सियतें, हमारे लंगरों के लोग, पानी देने वाले लोग, कपड़े देने वाले लोग, दवाई देने वाले लोग, साथ-साथ वहां आए। उन्हें ऐसा लगा कि केवल किसान नहीं पूरा पंजाबी समाज आया है। एक तरह का ऐसे लगने लगा कि कोसमोपोलिटन सोसाइटी है जो दिल्ली के बाहर आकर बैठ गई है। उधर हरियाणा पुलिस और दिल्ली पुलिस ने रोकने का बहुत ही यत्न किया। आंसू गैस के गोले छोड़े। पानी की बौछारें की। सड़क पर बड़ी-बड़ी 10-10 फुट 15-25 फुट गहरी खाइयां खोद डालीं, बड़े-बड़े पत्थरों से रास्ते रोके गए। हर चीज को रोकते हुए, खाइयों को मिट्टी से पाटते हुए, ट्रैक्टर निकले, सभी गाड़ियां निकलीं। वहां बैठने के बाद भी सरकार की तरफ से, दिल्ली सरकार की तरफ से, किसान आंदोलन के खि़लाफ़ बहुत तरह की साजिशें रची गयीं। नेताओं को बहुत तरह के विशेषणों से नवाजा – कभी बोला ये खालिस्तानी हैं, ये तो अलगाववादी हैं, ये तो माओवादी हैं, ये फला हैं, बहुत कुछ बोला गया। लेकिन सरकार ने और भी कोशिश की कि कहीं इनको रोक कर दिल्ली के अंदर एक बड़ा ग्राउंड तक का रास्ता दे दें। उन्होंने बड़ा पैकेज दिया कि आपको रास्ता दे देते हैं। एक खुला ग्राउंड है बुराड़ी ग्राउंड वहां जाकर बैठ जाओ। अधिकांश किसान संगठनों ने इस प्रस्ताव को खारिज़ कर दिया, वहीं बॉर्डर पर बैठने का ही फ़ैसला किया। उस आंदोलन के दो बड़े सेंटर – सिंघु बॉर्डर और टिकरी बॉर्डर थे। वहां पंजाब से ही लोग गए थे। पर गाजीपुर बॉर्डर, पलवल बॉर्डर, शाहजहांपुर बॉर्डर, ये तीन बॉर्डर जहां ब्लॉकेड हुआ, वहां भी पंजाबियों की कंट्रीब्यूशन काफी बड़ी थी। उदाहरण के रूप में, गाजीपुर बॉर्डर में भी टिकैत जी, रोड के हाईवे के नीचे थे। वहां धरना लगाकर 100 के क़रीब किसानों के साथ बैठे थे। लेकिन उस हाईवे को दिल्ली में जाने से ब्लॉक किया तो उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के तराई एरिया से आए हुए विस्थापित पंजाबी किसानों ने। राजस्थान बॉर्डर पर भी सबसे पहले, सबसे ज्यादा गिनती में जो लोग आए, वह भी हनुमानगढ़ और गंगानगर के किसान, जो विस्थापित पंजाबी बैकग्राउंड के थे।

मैं कहना यह चाहता हूं कि पूरी दुनिया में देश और पंजाब का किसान केन्द्र में था। पंजाबी लोग और सिख लोग उसकी धुरी थे। देश में एक ताक़त और ऊर्जा इस तरह से बन गई थी, जिसके चेत और अचेत मन में था कि हम लड़ाई लड़ने चले हैं दिल्ली के साथ। यही कारण है कि इस तरह के मुहावरे बहुत जल्दी बन गए – दिल्ली बॉर्डर पर या हम जीत के जाएंगे या हमारी लाश जाएगी, क़ानून वापसी या घर वापसी। एक तरह से किसानों की प्रतीज्ञा थी कि कृषि क्षेत्र में कॉर्पाेरेट को नहीं घुसने देंगे, दिल्ली सरकार यानी केन्द्र सरकार को यह सब लागू नहीं करने देंगे, हम किसान को उसका एम.एस.पी. दिलवा कर रहेंगे। किसानों की यही प्रतीज्ञा (कमिटमेंट) किसान नेताओं की प्रतीज्ञा में दृढ़ता लाने वाली चीज थी। उसमें आम लोगों का किसान संगठनों के साथ आ मिलना भी था।

किसान आंदोलन बॉर्डर पर बैठा तो 1 साल में हम देखते हैं कि उस आंदोलन का सिंघु बॉर्डर पर एक ऐसा केन्द्र बन गया, जहां से पूरे देश में एक आवाज़ जाने लगी। शुरू में जो संयुक्त किसान मोर्चा बना था, वह बाल्यवस्था में था। बॉर्डर पर वह जवान हुआ और प्रौढ़ता के साथ आगे बढ़ा। इसकी लगातार यहां मीटिंग हुई। फ़ैसले होने लगे। सरकार के साथ मीटिंग फेल हुई। 22 जनवरी (2021 संपादक) के बाद कोई मीटिंग नहीं हुई। उसके बाद पूरे किसान आंदोलन का प्रतीक सिंघु बॉर्डर और एस.के.एम., यानी संयुक्त किसान मोर्चा, बन गए। संयुक्त किसान मोर्चे में जितने भी संगठन थे, वे देश के अपने-अपने प्रांतों में संयुक्त किसान मोर्चे का बैनर लेकर सीधा आंदोलन में उतरे। टिकरी बॉर्डर या सिंघु बॉर्डर के साथ सॉलिडेरिटी में नहीं, बल्कि आंदोलन में सीधी भागीदारी की।

मैं फिर से यह बात दोहराना चाहता हूं कि आंदोलन में पंजाब के मज़दूरों, महिलाओं, दलितों, नौजवानों, छात्रों, कर्मचारियों, हर तबके ने योगदान दिया है। हर एक धार्मिक संस्थान ने, खासकर गुरूद्वारों ने, वह चाहे एस.जी.पी.सी, यानी शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के साथ थी या नहीं थी, सभी ने इस आंदोलन में योगदान दिया है। किसानों के मुद्दों के लिए किसानों की अगुवाई में यह आंदोलन सर्वव्यापी बन गया। इस आंदोलन ने पहली बार कारपोरेट के खि़लाफ़, उसका बायकाट करके यह बताया कि कारपोरेट कैसे दुश्मन है। इस आंदोलन ने मोदी जी के फासीवाद को चुनौती दी। पहली बार सीएए, एनआरसी, कश्मीर में इन्होंने जो किया या इस तरह के जो काम करके सांप्रदायिक माहौल बनाने की कोशिश की, अपना केन्द्रीय क़ानून बनाने की कोशिश की, इस आंदोलन ने उसे चुनौती दी और उसे रोका। वे चाहते तो इस आंदोलन को भी बिखेर सकते थे, लेकिन उनकी कोई हिम्मत नहीं हुई। उसके बहुत सारे कारण हैं, विस्तार में हम नहीं जाएंगे।

यह बात सही है कि इस आंदोलन ने किसानों को एकजुट किया है। किसानों के मुद्दों को फोकस किया है। किसानों के साथ-साथ पूरे देश के लोगों को एकजुट किया है। देश में बीजेपी के खि़लाफ़ जो नफ़रत थी, वह बढ़ने लगी। जो पंजाब से होती हुई हरियाणा में, हरियाणा से होती हुई यूपी में, और पूरे देश में फैल रही थी। यही आज उत्तर प्रदेश में प्री-इलेक्शन फेज़ में हम देख रहे हैं। पंजाब में मोदी जी का काफिला रुकने के रूप में दिख रहा है। मुझे लगता है कि एंटी-बीजेपी की यह वेव किसी न किसी रूप में जारी है। और इसका स्रोत, शुरुआत किसान आंदोलन थी। किसान आंदोलन में बीजेपी की कोशिश थी कि मुसलमानों और जाटों को और गुर्जरों को, मीणा को फाड़ के रखा जाए। उसको जवाब दिया गया। जब हम दिल्ली में गए, उसके बाद, लोग हमें बोलने लगे कि मोदी मुर्दाबाद के नारे मत लगाना प्लीज, यह नारे मत लगाना। लेकिन आंदोलन के चलते-चलते, यह सब एकदम तोड़ दिया, मरोड़ दिया। अमित शाह और मोदी के राज से देखने से लगता था कि शायद आंदोलन को किसी न किसी तरीक़े से तोड़ देंगे। लेकिन यह भी संभव नहीं था। क्योंकि पंजाब में आंदोलन मैदान पर था। ऊपर से, पंजाब एक सीमा राज्य है। यहां सिख बहुसंख्यक हैं। सिख हिन्दोस्तान में अल्पसंख्यक हैं। पंजाब की सीमा कश्मीर के साथ भी लगी हुई है। इस डर से भाजपा सरकार रुक गयी कि अगर हम यहां पर दमन करेंगे, तो उसके बाद, मोदी जी की सरकार को और बहुत कुछ चुकाना पड़ता। वह न दमन कर सकते थे, न ही तीन क़ानून को वापस लेने वाले थे, क्योंकि कारपोरेट का दबाव था। लेकिन अंततः उनको 19 नवंबर को बहाना बनाते हुए तीन क़ानूनों को वापस लेना पड़ा।

मुझे लगता है कि इस आंदोलन ने भारतवर्ष के लोगों के लिए कुछ रास्ते बनाए हैं। कुछ पगडंडियां बनाई हैं। किसान आंदोलन की वजह से, अपने आप में पहली बार ऐसा लगने लगा है कि देश में किसान अगर एकजुट हो जाते हैं, एक बैनर के नीचे साथ लड़ने की कोशिश करते हैं, तो वह बाकी वर्गों की तरह ही है, जैसे मजदूर वर्ग, जितने भी ट्रेड यूनियन में हमारे साथी हैं, सेंट्रल ट्रेड यूनियन में हैं या और छोटे-छोटे ट्रेड यूनियन में हैं, अगर वे मिलकर लड़ सकते हैं, तो किसान भी मिलकर एक बड़ा आंदोलन कर सकते हैं। मुझे यहां तक लगता है कि किसानों की पहचान (आइडेंटिटी) और एकता (यूनिटी), बनाने के लिए देश में सकारात्मक और अनुकूल परिस्थिति हैं। यह बनाई जा सकती है और बनेगी, अगर हमारी डिफरेंट फोर्सेज, जो किसानों में काम करती हैं, इसके लिए वे गंभीरतापूर्वक काम करें तो। दूसरा, इसके साथ-साथ अगर देश की वर्किंग क्लास के ट्रेड यूनियन, जो संगठित क्षेत्र में हैं, वे भी इसी तरह इकट्ठे हो जाते हैं, तो देश में एक बड़ा यूनाइटेड फ्रंट बनाकर देश में बड़े आंदोलन की तरफ आगे बढ़ सकते हैं। मैंने आपको बताया था कि पंजाब में जब 10 संगठन से 28 संगठन हुए, तो आंदोलन एक ऊंची पीक पर गया। 25 सितम्बर के बंद के रूप में देखने में आया। जब पंजाब के संगठनों के साथ, देश के अन्य संगठन मिल गए और सब संगठनों ने मिलकर कॉल दिया 26 नवम्बर को दिल्ली चलो का, यह तभी हो पाया है क्योंकि देश के संगठन एक साथ थे। उसके साथ पंजाब की जो एकता थी, जो पंजाबियों की बन चुकी थी। ये सारे तथ्य हमें बताते हैं, कि अगर देश में आंदोलन करने हैं, देश में तानाशाही या फिर केन्द्रीयकृत शासन (सेंट्रलाइज्ड रूल) के खिलाफ़ लड़ाई लड़नी है, तो अवाम के बड़े तबके, किसान और मज़दूर, इनमें जो भी विचारधारा, राजनीतिक, संगठनात्मक मतभेद के चलते, छोटे-छोटे समूह या छोटे या बड़े, उन सबको किसी न किसी तरह से अपना एक संयुक्त कार्यक्रम बनाकर, मिनिमम कॉमन प्रोग्राम बनाकर, सबको एक साथ लाने की ज़रूरत है। मुझे यह लगता है कि आने वाले समय में किसान आंदोलन से सीखकर, एक फासिस्ट-विरोधी और कारपोरेट-विरोधी जन आंदोलन खड़ा किया जा सकता है।

अभी 11 दिसंबर के बाद, हमारे पंजाब के कुछ संगठनों ने सोचा है कि पंजाब में इलेक्शन होने जा रहा है, उसमें अपना हाथ आजमायेंगे। उन्हें लगता है कि वे पावर में आ जाएंगे। मेरी सोच है कि यह रास्ता ठीक नहीं है। हमारा काम था बचे हुए जो मुद्दे हैं, उसके लिए बड़ा आंदोलन खड़ा करना, न कि एक छोटे मुद्दे के लिए, पंजाब के विधानसभा में एक सीट या कुछ सीटें लेना। अभी आंदोलन के सामने, किसान नेताओं के सामने, किसान संगठनों के सामने बहुत बड़े मुद्दे हैं, जिन्हें हमें एड्रेस करना चाहिये। हम 15 जनवरी की मीटिंग में प्लान करेंगे। एस.के.एम., संयुक्त किसान मोर्चा, 13-14 राज्यों में बन गया है, और आने वाले दिनों में बाकी जगहों पर भी बनेगा। किसानों के जो मुद्दे हैं, वे इस आंदोलन में उठे मुद्दों से भी बड़े हैं। कुछ अनुभव किसानों और मज़दूरों के एक साथ संयुक्त कार्यवाही करने का हुआ है, उसे आगे कैसे बढ़ाना है, ये सब काम किसान आंदोलन के सामने हैं। किसान नेताओं को चाहिए था कि उसकी पूर्ति के लिए, एक संघर्षशील आंदोलन की पूर्ति के लिए, खुद को पेश करें, पंजाब असेंबली में जाने की कोशिश नहीं करें। यह रास्ता ठीक नहीं है।

मैं यहीं पर समाप्त करता हूं। बहुत सारी सकारात्मक चीजों के अलावा, 26 जनवरी वाली, लाल किले वाली घटना से सरकार ने भटकाव पैदा करने की कोशिश की। फिर इन्होंने एक बेअदबी को लेकर हादसा करवाया, निहंग सिखों किसी मज़दूर को वहां मार दिया था, वह एक तरह की हमारे अंदर बंटवारा करने की कोशिश थी। फिर लखीमपुर खीरी की घटना, आशीष मिश्रा टैनी के बेटे ने 4 किसानों को गाड़ी से रौंद दिया, उसने इस तरह से दमन करने की कोशिश की। लेकिन हमारे किसान साथियों ने एकता और एक समझ के साथ कई चीज़ों को एक साथ हैंडल किया। केन्द्र सरकार की एजेंसियों की तरफ से हमें बिखेरने की, अंदर से तोड़ने की, हमें बदनाम करने की जो भी कोशिश की गयी, उसका मुक़ाबला करते-करते हमने केंद्र सरकार के साथ लड़ाई लड़ी। यहां तक कि जिस बोर्डर पर हम बैठे थे, स्थानीय गांव के लोगों के बीच हमारे खि़लाफ़ नफ़रत पैदा करने की कोशिश की गयी। लेकिन आंदोलन कुछ इस तरह का था कि ज्यादातर लोग यह कहते थे कि हम आंदोलनकारियों के खि़लाफ़ कुछ नहीं करेंगे। बेशक, हमें कुछ मुश्किलें आई हैं। हम उसको झेलेंगे। क्योंकि पहले दिन से ही वहां पर पानी का प्रबंध, रहने के लिए, उनको अपना वॉशरूम देने के लिए, हरियाणवी लोग आगे आए थे। लेकिन सरकार की एजेंसी फेल हुई। उन्होंने 27-28 जनवरी (2021 संपादक) को आर.एस.एस. के लोगों को लाकर स्टेज पर हमला करने की कोशिश की थी, डायरेक्टली पलवल बॉर्डर पर चल रहे धरना को जबरदस्ती उठा भी दिया। फिर 28 तारीख को गाजीपुर बॉर्डर पर ऐसा करने वाले थे, तब पंजाबी सिख किसान नौजवानों ने उस समय टिकैत जी को हौसला दिया कि हम खड़े हैं कुर्बानी देंगे, मर जाएंगे, लेकिन यहां से हटेंगे नहीं। उस समय वह घटना घटी, जब टिकैत जी ने भावुक होकर अपील की। तो इन चीजों का सामना करते हुए, आंदोलन अंत में, एक हद तक पहुंचा, और तीन क़ानूनों को वापस किया। कुछ मुद्दे रहते हैं, उन मुद्दों को लेकर 15 जनवरी को हम अपनी समीक्षा करेंगे। आगे क्या करना है, उसके बारे में फ़ैसला करेंगे।

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