बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस के 29 वर्ष बाद:
हुक्मरान पूंजीपति वर्ग के खि़लाफ़ मज़दूरों और किसानों की एकता की हिफ़ाज़त में

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 1 दिसंबर, 2021

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बाबरी मस्जिद के विध्वंस के गुनाहगारों को सजा की मांग के लिए संयुक्त प्रदर्शन (फाइल फोटो)

हुक्मरान पूंजीपति वर्ग उदारीकरण और निजीकरण कार्यक्रम के खि़लाफ़ मज़दूरों और किसानों की बढ़ती एकता को तोड़ने के लिए, तरह-तरह के हथकंडों का इस्तेमाल कर रहा है। “इस्लामी आतंकवाद” और “सिख आतंकवाद” का हौवा खड़ा करना, सैकड़ों वर्षो पहले राजाओं द्वारा किए गए अपराधों के लिए पूरे मुसलमान कौम से बदला लेने की भावना की हिमायत करना, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खि़लाफ़ झूठा प्रचार फैलाना और हिंसा भड़काना, ये सब उन पैशाचिक तरीकों में से कुछ हैं, जिनका हमारे हुक्मरान, लोगों को आपस में लड़वाने के लिए, नियमित तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

सुरक्षित रोज़गार के अधिकार, मानव अधिकारों और जनवादी अधिकारों पर इजारेदार पूंजीपति वर्ग के सब तरफा हमलों के खि़लाफ़, मज़दूरों और किसानों और सभी जनतांत्रिक ताकतों की एकता की हिफ़ाज़त करने की आज सख़्त ज़रूरत है। हमें सांप्रदायिक आधार पर बांटने के हुक्मरान वर्ग के प्रयासों के खि़लाफ़ डट कर संघर्ष करके, लोगों की एकता की हिफ़ाज़त करने की ज़रूरत है। इस संदर्भ में, हमारे ऐतिहासिक अनुभव से और खास तौर पर, बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस, जिसकी 29 वीं सालगिरह 6 दिसंबर 2021 को है, उस से सबक सीखना बहुत महत्वपूर्ण है।

समस्या की जड़

किसी खास धार्मिक विचार के लोगों को निशाना बनाकर सांप्रदायिक हिंसा और सांप्रदायिक विचार फैलाये जाने की समस्या की जड़ क्या है, इसके बारे में समझना सबसे अहम सबक है। इस समस्या की जड़ के बारे में सच्चाई को लोगों से छिपाने के लिए हुक्मरान वर्ग और उसकी पार्टियां बहुत सारे ग़लत विचार फैलाते हैं।

बाबरी मस्ज़िद 15वीं सदी में बनाया गया एक मस्ज़िद था, जिसका 6 दिसंबर, 1992 को दिन-दहाड़े ध्वंस किया गया था। इसके ठीक बाद देश के कई इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा आयोजित की गई थी। हजारों-हजारों लोग, हिंदू और मुसलमान, केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों में बैठी पार्टियों द्वारा आयोजित हिंसक हमलों में मारे गए थे।

हिन्दोस्तानी राज्य का आधिकारिक बयान यह कहता है कि बाबरी मस्ज़िद का विध्वंस अनजान-गुमनाम कारसेवकों की भीड़ द्वारा किया गया था, जिन्होंने भगवान राम के प्रति अपनी भक्ति से प्रेरित होकर ऐसा किया था। पर सच्चाई तो यह है कि बाबरी मस्ज़िद का विध्वंस एक बहुत बड़ी सोची-समझी साज़िश थी और उसके लिए पहले से ही खूब सारी तैयारियां की गई थीं।

देश के कोने-कोने से लाखों-लाखों भक्तों को अयोध्या में लाकर इकट्ठा किया गया था। सुरक्षा बलों को आदेश दिया गया था कि वे उस स्थान से दूर खड़े रहें। कई जाने-माने सांसद वहां उपस्थित थे, जो उस पूरी प्रक्रिया का सर्वेक्षण कर रहे थे और बार-बार यह नारा दे रहे थे कि बाबरी मस्ज़िद बीते समय में मुसलमान राजाओं की हुकूमत में, हिन्दुओं की गुलामी का एक प्रतीक है।

एक ग़लत और खतरनाक सोच यह है कि सिर्फ भाजपा और संघ परिवार ही सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा की समस्या के लिए दोषी हैं। दोनों भाजपा और कांग्रेस पार्टी ने बाबरी मस्ज़िद का विध्वंस करने और वहां पर राम मंदिर की स्थापना करने के उस विभाजनकारी राजनीतिक अभियान को मिलकर और एक से बढ़कर एक घिनावना कदम उठाकर, अंजाम दिया था।

कांग्रेस पार्टी की तत्कालीन केंद्र सरकार और भाजपा की तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार, दोनों ही बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस को अंजाम देने में गुनहगार हैं। कांग्रेस पार्टी, भाजपा और शिवसेना – उन सबको श्री कृष्ण आयोग ने 1992-93 में मुंबई में सांप्रदायिक हत्याकांड को आयोजित करने के लिए दोषी ठहराया था। परंतु इसके बावजूद, उनमें से किसी भी पार्टी के खि़लाफ़ कोई कार्यवाही नहीं की गई है। इन तथ्यों से हम क्या समझ सकते हैं? यही, कि उन सभी अपराधों के पीछे सम्पूर्ण हुक्मरान वर्ग का हाथ था। हुक्मरान वर्ग का मकसद था हिन्दुओं और मुसलमानों को आपस में लड़वाना, ताकि उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम के खि़लाफ़ शोषित वर्गों की एकता को ख़त्म किया जाए।

“अयोध्या का विवाद”

अयोध्या के विवाद के बीज को अंग्रेज हुक्मरानों ने 160 से अधिक वर्षों पहले बोया था। अवध 1857 के ग़दर के सबसे सक्रिय केंद्रों में से एक था। उस ग़दर में हिन्दुओं और मुसलमानों ने एकजुट होकर, अंग्रेज हकूमत का तख़्तापलट करने की लड़ाई लड़ी थी। उस महान जन विद्रोह को बेरहमी से कुचल दिया गया था। उसके बाद अंग्रेज हुक्मरानों ने फ़ैज़ाबाद के सरकारी अखबार में यह प्रकाशित कर दिया कि बाबरी मस्ज़िद ठीक उसी स्थान पर बनाया गया था जहां भगवान राम का जन्म हुआ था और बाबरी मस्ज़िद को राम मंदिर का विनाश करके बनाया गया था।

1947 में अंग्रेजों की हकूमत के ख़त्म होने के बाद हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग ने अंग्रेजों से सीखी हुयी -“बांटो और राज करो”- की सारी तरकीबों को बरकरार रखा तथा और विकसित किया। उन्होंने अयोध्या विवाद को ज्वलंत रखा, ताकि जब-जब ज़रूरत हो उसका फायदा उठाया जा सके।

बाबरी मस्ज़िद के ही स्थान पर राम मंदिर बनाने के अभियान को 1980 के दशक में शुरू किया गया था। राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने वहां शिलान्यास करने की इज़ाज़त दी थी और भाजपा के नेता आडवाणी ने अयोध्या जाने के लिए रथ यात्रा आयोजित की थी।

29 वर्ष पहले किए गए उन अपराधों को आयोजित करने वालों के असली मकसद और उनकी असली पहचान को छिपाने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य के सभी अंगों – कार्यकारिणी, विधायिकी और न्यायपालिका – ने मिलजुल कर काम किया है।

न्यायपालिका ने यह तो माना है कि बाबरी मस्ज़िद का विध्वंस गैर-कानूनी था। परंतु न्यायपालिका ने किसी ठोस सबूत के न होने के बावजूद, उस दावे को जायज ठहराया है कि बाबरी मस्ज़िद जिस जगह पर था वही भगवान राम का जन्म स्थान है। इसके अलावा, अदालत ने यह फैसला सुनाया कि आडवाणी, जोशी, भारती और वे सारे नेता, जिन पर बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस को अगुवाई देने का आरोप लगाया गया था, वे सब बेकसूर हैं। इससे सरकार के उस झूठे दावे को वैधता दी गयी है कि बाबरी मस्ज़िद का विध्वंस भक्तों की भीड़ द्वारा की गई एक स्वतः स्फूर्त हरकत थी। यानी कि न्यायपालिका ने बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस को जायज ठहराया है और उसे अंजाम देने में हुक्मरान वर्ग की भरोसेमंद पार्टियों की भूमिका पर पर्दा डाल दिया है।

निष्कर्ष

इतिहास के अनुभव से हमें एक अहम सबक यह मिलता है कि सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा फैलाने के लिए कोई एक खास पार्टी या धार्मिक संगठन जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए संपूर्ण हुक्मरान वर्ग जिम्मेदार है। सरकार चलाने वाली पार्टी हुक्मरान वर्ग का प्रबंधक टीम मात्र ही है जिसे हुक्मरान वर्ग के कार्यक्रम को लागू करने का दायित्व सौंपा गया है। समय-समय पर चुनाव करके उस प्रबंधक टीम को बदला जा सकता है।

सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक पार्टी के हाथ में हो, सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा हुक्मरान वर्ग का पसंदीदा हथकंडा है। जिसके जरिए वह लोगों की एकता को तोड़ने का काम करता है और इजारेदार पूंजीपतियों की हुक्मशाही को स्थापित करता है।

सांप्रदायिकता के खि़लाफ़ संघर्ष को इजारेदार पूंजीपतियों के उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम के खि़लाफ़ संघर्ष से अलग नहीं समझना चाहिए। जो सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के खि़लाफ़ संघर्ष को एक अलग संघर्ष, यानी धर्मनिरपेक्षता के खि़लाफ़ हिंदुत्व का संघर्ष समझते हैं, वे इस हक़ीक़त को नजरअंदाज करने की गंभीर ग़लती कर रहे हैं कि सांप्रदायिक बंटवारे की राजनीति के पीछे हुक्मरान इजारेदार पूंजीपति वर्ग के हित ही छिपे हुए हैं।

जिस-जिस समुदाय के लोगों को अपनी मजहबी पहचान के आधार पर निशाना बनाया जाता है, उन्हें अपनी जिंदगी, अपने विचार और इबादत के तौर-तरीकों की हिफ़ाज़त करने के लिए संगठित होने का पूरा अधिकार है। उन्हें सांप्रदायिक करार देना या “धर्म और राजनीति को मिलाने” के लिए दोषी ठहराना सरासर झूठ है। यह असली गुनहगारों के बजाय, सांप्रदायिक हिंसा के शिकार बने पीड़ितों को ही दोषी ठहराने के बराबर है।

सांप्रदायिकता के खि़लाफ़ संघर्ष का निशाना हुक्मरान वर्ग और उसकी भरोसेमंद पार्टियां होनी चाहिए, जिनमें दोनों भाजपा और कांग्रेस पार्टी शामिल हैं। सांप्रदायिकता के खि़लाफ़ संघर्ष का निशाना उस राज्य पर होना चाहिए जो मेहनतकश बहुसंख्या के ऊपर पूंजीपति वर्ग की हुक्मशाही की हिफ़ाज़त करता है।

हमें, इस देश के लोगों को, बार-बार इस मांग को उठाना चाहिए कि सांप्रदायिक हिंसा फैलाने वाले सभी गुनहगारों को सज़ा मिलनी चाहिए, चाहे सत्ता में उनका कितना ही ऊंचा स्थान क्यों न हो। जो सरकार और प्रशासन में जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं, उन्हें लोगों के जीने के अधिकार और ज़मीर के अधिकार की हिफ़ाज़त न करने के लिए जवाबदेह ठहराना होगा और उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा देनी होगी।

हमें इंसाफ के लिए संघर्ष को इस उद्देश्य के साथ आगे बढ़ाना होगा कि पूंजीपति वर्ग की हकूमत को ख़त्म करना है और उसकी जगह पर मज़दूरों और किसानों का राज स्थापित करना है। हमें एक नए राज्य का निर्माण करना होगा जिसमें ज़मीर के अधिकार को समाज के हर सदस्य का सर्वव्यापक और अलंघनीय अधिकार माना जाएगा और उसकी हिफ़ाज़त की जाएगी। ऐसा राज्य ही यह सुनिश्चित कर सकता है कि अगर कोई भी व्यक्ति, समूह या पार्टी किसी के ज़मीर के अधिकार या किसी दूसरे मानव अधिकार का हनन करता है, तो फौरन उस पर मुकदमा चलाया जायेगा और उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जायेगी।

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