बिजली (संशोधन) विधेयक 2021 के ख़िलाफ़ निरंतर जुझारू विरोध प्रदर्शन

बिजली (संशोधन) विधेयक 2021, जिसे कैबिनेट द्वारा अनुमोदित और संसद के मानसून सत्र में पेश किया जाना था, इसे बिजली क्षेत्र के मज़दूरों, किसानों और अन्य उपभोक्ताओं के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लाइज़ एंड इंजीनियर्स (एन.सी.सी.ओ.ई.ई.ई.) के बैनर तले देशभर के बिजली कर्मचारियों के एकजुट विरोध और पूरे देश में हड़ताल की धमकी ने कैबिनेट को बिल की मंजूरी को टालने के लिये मजबूर कर दिया है।

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बिजली संशोधन अधिनियम 2021 का विरोध करते हुए, बिजली कर्मियों ने जंतर-मंतर, नई दिल्ली पर विरोध प्रदर्शन किया

हमारे घरों और कार्यालयों, कारखानों और कृषि क्षेत्रों तक जो बिजली पहुंचती है, वह तीन मुख्य विशिष्ट चरणों से गुजरती है : उत्पादन, प्रसारण और वितरण। इन तीनों को मिलाकर, यह देश के सबसे बड़े व्यवसायों में से एक है, जिसका वार्षिक राजस्व 7 लाख करोड रुपये से अधिक है। 2003 में किये गये पिछले संशोधन में उत्पादन, प्रसारण और वितरण को अलग-अलग कर दिया गया था, और उत्पादन के लाइसेंस को समाप्त कर दिया गया था। वर्तमान संशोधन के ज़रिए वितरण में लाइसेंस को ख़त्म करने का प्रयास किया जा रहा है।

बिजली (संशोधन) विधेयक 2021 का उद्देश्य है पूरे देश में बिजली वितरण का निजीकरण करना। इसमें प्रस्ताव है कि मौजूदा वितरण कंपनियों (राज्य के स्वामित्व वाली डिस्कॉम) के साथ वितरण में निजी कंपनियों को प्रवेश करने की अनुमति दी जाए। जब 2020 में कोविड-19 महामारी फैल रही थी, तब केंद्र सरकार ने फ़ैसला किया कि ज्यादातर राज्य सरकारों से जुड़ी हुई बिजली वितरण प्रणाली के निजीकरण का सही समय यही है। एक तरफ राज्य सरकारें इस दिशा में क़दम उठा रही हैं, तो दूसरी तरफ वित्त मंत्री ने 16 मई, 2020 को केंद्र शासित प्रदेशों (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख सहित, जो एक साल पहले एक राज्य थे) की वितरण प्रणालियों के निजीकरण की घोषणा कर दी। यह कोविड-19 प्रोत्साहन पैकेज के एक भाग के रूप में किया गया था! यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि पुदुचेरी विधानसभा ने जुलाई 2020 में, उस केंद्रशासित प्रदेश में बिजली के निजीकरण के खि़लाफ़ सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था।

सरकार यह दावा कर रही है कि इस संशोधन का उद्देश्य है उपभोक्ताओं को अपने बिजली आपूर्तिकर्ता का चयन करने का विकल्प प्रदान करना तथा बिजली वितरण को और अधिक कुशल बनाना। जबकि वास्तव में, इसका उद्देश्य है सार्वजनिक संपत्तियों को निजी वितरकों को सौंपना और उनके लिए बाज़ार को खोलना। यह दावा सरकार द्वारा कृषि कानूनों को पेश करते समय किए गए दावों के समान ही है। सरकार दावा कर रही है कि किसानों को बिना किसी प्रतिबंध के, देश के किसी भी राज्य में अपनी उपज को बेचने की पूरी आज़ादी दी जा रही है। वास्तविकता यह है कि ये कानून इजारेदार निगमों को कृषि व्यापार पर कब्ज़ा करने में सक्षम बनाएंगे। कौन-सा किसान अपनी उपज को बेहतर क़ीमत पर बेचने के लिए अपने खेत से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर सकेगा? इसी तरह, करोड़ों उपभोक्ता यह चुनने का विकल्प नहीं चाहते हैं कि कौन सी निजी वितरण संस्था उन्हें हर महीने लूटेगी।

इस संशोधन के समर्थन में सरकार द्वारा किया जा रहा दूसरा दावा यह है कि निजी कंपनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा सस्ती और बेहतर सेवा सुनिश्चित करेगी। लेकिन, विभिन्न राज्यों में बिजली उत्पादन और वितरण के निजीकरण का अब तक का अनुभव बहुत ही अलग कहानी बताती है। मुंबई में उपभोक्ताओं के पास टाटा और अडानी के बीच एक विकल्प है, लेकिन वे अभी भी उच्चतम बिजली दरों पर भुगतान करने को मजबूर हैं। इसी तरह, हाल ही में — जून 2020 में, ओडिशा के पांच मंडलों में बिजली के वितरण और खुदरा आपूर्ति के प्रबंधन के, सेंट्रल ईलेक्ट्रिसिटी सप्लाई युटीलिटी ऑफ ओडिशा (सी.ई.एस.यू.) के हाथों से, टाटा पावर लिमिटेड द्वारा टेक-ओवर किये जाने के तुरंत बाद से, बिजली की दरों में बड़ी तेज़ वृद्धि हो गई। यह इसके बावजूद कि ओडिशा अधिशेष बिजली पैदा करने वाला राज्य है।

बिजली की दरों में संभावित कमी का सरकार का दावा इस तथ्य को छुपाता है कि बिजली की लागत का 75 से 80 प्रतिशत उत्पादन के कारण होता है। डिस्कॉम को उत्पादन कंपनियों के साथ बिजली ख़रीद समझौते के तहत निर्धारित क़ीमत का भुगतान करना होता है। पिछले दो दशकों में बिजली उत्पादन क्षेत्र का निजीकरण तेज़ी से आगे बढ़ा है। उत्पादन क्षमता का लगभग आधा (47 प्रतिशत) पहले से ही निजी इजारेदार कंपनियों के हाथों में है। टाटा, अनिल अंबानी, जिंदल, टोरेंट ग्रुप, जी.वी.के., जेपी, हिंदुजा आदि जैसे बड़े पूंजीवादी समूह बिजली उत्पादन क्षेत्र में हैं। विभिन्न राज्यों के डिस्कॉम लागत की तुलना में बहुत अधिक दरों पर इन निजी उत्पादकों से बिजली ख़रीदने के लिए मजबूर हैं।

बिजली उत्पादन में निजी क्षेत्र का प्रवेश जनहित के विरुद्ध है। इसका उदाहरण एनरॉन के अनुभव से मिलता है। बिजली कर्मचारियों और बड़े पैमाने पर लोगों के विरोध के बावजूद अमरीकी कंपनी, एनरॉन को 1992 में दाभोल, महाराष्ट्र में बिजली उत्पादन सुविधा स्थापित करने के लिए पलक पांवड़े बिछाकर, आमंत्रित किया गया था। एनरॉन को आश्वस्त किए गए नियम और शर्तें स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय हित के विरुद्ध थीं। एम.एस.ई.बी. के मज़दूरों और महाराष्ट्र के लोगों के बढ़ते विरोध के कारण, 23 मई, 2001 को एनरॉन के साथ समझौता रद्द करना पड़ा, लेकिन कंपनी को भारी मुआवज़ा देने के बाद ही। अब 2003 के संशोधन के बाद, उत्पादन का फिर तेज़ी से निजीकरण किया गया है।

बिजली उत्पादन के निजीकरण का परिणाम अभी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जब देश बिजली की कमी का सामना कर रहा है। निजी बिजली उत्पादनकर्ता राज्य सरकारों को एनर्जी एक्सचेंज के अनुसार, 20 रुपये प्रति यूनिट पर बिजली बेचकर मुनाफ़ाखोरी कर रहे हैं। इतनी महंगी बिजली ख़रीदने वाली राज्य सरकारों का भुगतान आखिरकार जनता को ही करना होगा।

उत्पादन की ही तरह, वितरण के निजीकरण के लिए भी तरह-तरह की कोशिशें की गयी हैं। कई राज्यों और शहरों में, वितरण का निजीकरण विफल हो गया क्योंकि पूंजीपतियों को इसकी शर्तें आकर्षक नहीं लगीं, और राज्य के डिस्कॉम को इसे वापस अपने हाथों में लेना पड़ा, जिससे जनता के सैकड़ों-करोड़ों रुपये का नुक़सान हुआ। यह ओडिशा में निजी कंपनी एप्लाइड एनर्जी सर्विसेज ट्रांसपावर (ए.ई.एस.) के साथ हुआ। 1999 में, इस कंपनी ने सेंट्रल इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी ऑफ़ ओडिशा (सी.ई.एस.सी.ओ.) के टेक-ओवर के लिए बोली जीती। लेकिन कंपनी 2001 में इसे राज्य को वापस सौंप कर, छोड़कर चली गयी और साथ ही एक बड़ा कर्ज़ छोड़ गयी जिसे करदाताओं को भरना होगा।

2021 के संशोधन के तहत निजी वितरकों को दिए गए नियमों और शर्तों से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस संशोधन के बाद उन्हें इस क्षेत्र का टेक-ओवर करने में सक्षम बनाने के लिए सब कुछ किया जा रहा है।

  • राज्य की बिजली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) निजी वितरण कंपनियों को बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने के लिए बाध्य हैं। बिल में कहा गया है कि एक मौजूदा वितरण कंपनी (यानी, ज्यादातर, राज्य की डिस्कॉम) एक ही संचालन क्षेत्र में पंजीकृत सभी वितरण कंपनियों को बिना किसी भेदभाव के सभी सुविधाएं प्रदान करेगी।
  • राज्य की डिस्कॉम को नेटवर्क के बुनियादी ढांचे को बनाए रखना और उसमें निवेश करना होगा, जबकि निजी वितरण कंपनियों को कोई निवेश करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उपयोग के लिए केवल मामूली शुल्क का भुगतान करना होगा। ब्रेकडाउन होने पर निजी कम्पनियां राज्य की डिस्कॉम से मुआवज़े की मांग कर सकती हैं।
  • इसके अलावा, एक निजी वितरण कंपनी अपने संचालन के क्षेत्र को खुद चुन सकती है। वे ग्रामीण क्षेत्रों में और दूर-दराज के इलाकों में वितरण करने से बच सकती हैं, जबकि वर्तमान में राज्य के डिस्कॉम उन सारे इलाकों में सेवा देने के लिए बाध्य हैं। निजी वितरण कंपनियां केवल बड़े मुनाफ़े वाले ग्राहकों की सेवा करना चुनेंगी, जबकि राज्य की डिस्कॉम को छोटे और दूर-दराज के गैर-मुनाफे़दार ग्राहकों को सेवा देनी पड़ेगी। वास्तव में, ग्राहकों के पास वितरक का चयन करने का विकल्प होने की बजाय, जैसा कि सरकार द्वारा दावा किया गया है, वितरक खुद चुनेंगे कि किसे सेवा देनी है।

जब निजी वितरण कंपनियों के हाथों में सारे लाभदायक कनेक्शन चले जायेंगे, तो राज्य की डिस्कॉम को क्रॉस सब्सिडी देने (एक मुनाफ़ेदार व्यवसाय के मुनाफ़ों से दूसरे व्यवसाय को सब्सिडी देने) में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। बिजली उत्पादन और वितरण के पूर्ण निजीकरण को सुविधाजनक बनाने के लिए सभी सब्सिडी को समाप्त करने का इरादा है। राष्ट्रीय बिजली नीति 2021 में कहा गया है कि बिजली की न्यूनतम और उच्चतम दरों के बीच का अंतर 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। इसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव करोड़ों किसानों पर पड़ेगा।

असली मंशा पहले से ही आर्थिक रूप से तनावग्रस्त राज्य की डिस्कॉम को ‘बीमार’ घोषित करना है, ताकि उनके लाखों-करोड़ों रुपये के विशाल बुनियादी ढांचे को निजी पूंजीपतियों को सस्ते दाम पर बेचा जा सके।

आज़ादी के तुरंत बाद, बिजली के उत्पादन, प्रसारण और वितरण को सरकार के नियंत्रण के तहत लाने के लिए, बिजली अधिनियम 1948 को लागू किया गया था। आज़ादी से पहले, देशभर में सैकड़ों निजी बिजली कंपनियां थीं, लेकिन वे शहरों में सीमित संख्या में, लाभदायक उपभोक्ताओं को ही बिजली की आपूर्ति करती थीं। 1948 में, यह घोषित किया गया था कि विद्युत शक्ति देश की रीढ़ है और इसलिए यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह हमारे देश के हर कोने में सस्ती दरों पर बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करे। यह भी घोषित किया गया कि बिजली क्षेत्र का मक़सद मुनाफ़ा नहीं होना चाहिए। बिजली पैदा करने और उसकी आपूर्ति करने के लिए प्रत्येक राज्य में राज्य बिजली बोर्ड बनाए गए थे और उन्हें 3 प्रतिशत की मामूली वापसी की गारंटी दी गई थी।

1980 के दशक से, राज्य की नीति सभी सार्वजनिक संपत्तियों को नष्ट करने और एक-एक करके सभी क्षेत्रों में उदारीकरण और निजीकरण करने की नीति में बदल गयी है। केंद्र और राज्य सरकारों ने बिजली क्षेत्र में सभी नए सरकारी निवेश को रोककर, सुनियोजित तरीक़े से बिजली उत्पादन का गला घोंटना शुरू कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, कृत्रिम रूप से बिजली की कमी पैदा हो गई, जिससे पूरे देश में बार-बार पॉवर कट होने लगे। इसका फ़ायदा उठाकर, बिजली क्षेत्र को निजी निवेश के लिए खोलने के पक्ष में जनता का समर्थन जुटाया गया। 1991-92 में केंद्र में नरसिंहा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा घोषित उदारीकरण और निजीकरण (एल.पी.जी.) के कार्यक्रम के माध्यम से, वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीति की घोषणा के साथ, इन क़दमों को बड़ी तेज़ी से लागू किया जाने लगा।

विद्युत संशोधन विधेयक 2021, 2014 के बाद से, विद्युत अधिनियम 2003 में संशोधन करने का चौथा प्रयास है – 2014, 2018 और 2020 में तीन बिल पेश हो चुके हैं, लेकिन बिजली कर्मचारियों और लोगों के तीव्र विरोध के कारण, उन सभी को वापस लिया गया है।

बिजली जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। यह राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह सस्ती दर पर सभी तक बिजली पहुंचाए। हमें यह मंज़ूर नहीं है कि निजी कंपनियों को हमारी इस मूलभूत आवश्यकता की क़ीमत निर्धारित करने या यह तय करने की अनुमति दी जाये, कि वे किसे सेवा प्रदान करेंगे और किसे नहीं। बिजली उत्पादन और वितरण एक आवश्यक सार्वजनिक सेवा है। इसे निजी मुनाफ़े का स्रोत नहीं बनाया जा सकता है और न ही बनाया जाना चाहिए। बिजली वितरण का निजीकरण एक जन-विरोधी क़दम है। यह समाज के समग्र हितों के खि़लाफ़ है और इसका विरोध किया जाना चाहिए।

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