डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की जायज मांगें

महाराष्ट्र के रेजिडेंट डॉक्टरों ने 1 अक्टूबर से राज्य भर में अनिश्चितकालीन हड़ताल का आह्वान किया था। महाराष्ट्र स्टेट एसोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स (मार्ड) ने घोषणा की थी कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होंगी, हड़ताल जारी रहेगी।

201010_400_Mard_Organisation_Agitation_Pimpri-Chinchwadरेजिडेंट डॉक्टरों की मुख्य मांग है कि उनकी पढ़ाई की फीस माफ़ की जाए। उनकी दूसरी मांग है कि छात्रावास की अवस्था में सुधार किया जाना चाहिए क्योंकि ये पूरे महाराष्ट्र में बहुत ख़राब है। उनकी तीसरी मांग है कि बी.एम.सी. अस्पतालों के रेजिडेंट डॉक्टरों के वजीफे में से (टी.डी.एस.) टैक्स को पहले ही नहीं काटा जाना चाहिए। इसके अलावा, डॉक्टरों ने मांग की है कि पूरे महाराष्ट्र के सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों को कोविड प्रोत्साहन राशि दी जानी चाहिए।

मार्ड के प्रवक्ता ने बताया कि वे पिछले 5 महीनों से इन मुद्दों को उठा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। राज्य सरकार की ओर से कोई लिखित आश्वासन नहीं मिला है। इसी वजह से वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं। मार्ड ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे हड़ताल को बढ़ा देंगे। हालांकि, एसोसिएशन ने स्पष्ट किया है कि आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं जारी रहेंगी लेकिन ओ.पी.डी. का कोई काम नहीं किया जायेगा।

5 अक्टूबर को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री द्वारा उनकी मांगों को स्वीकार करने के बाद रेजिडेंट डॉक्टरों ने हड़ताल को रोक दिया।

पिछले दो सालों में, स्वास्थ्य कार्यकर्ता अमानवीय परिस्थितियों में काम कर रहे हैं और कोविड मरीजों की सेवा करने के लिए अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं, जबकि वे खुद वायरस की चपेट में आ चुके हैं। सभी जानते हैं कि वे असुरक्षित स्थिति में काम करते हैं और अक्सर उन्हें सुरक्षा उपकरण भी नहीं दिये जाते हैं। उन्हें कोरोना योद्धाओं के रूप में सम्मानित किया गया है, लेकिन इस मौखिक तारीफ के अलावा, स्वास्थ्य अधिकारियों ने काम करने की उनकी स्थिति में सुधार के लिए कोई क़दम नहीं उठाये हैं। कई मामलों में तो उनका वेतन महीनों से बकाया है।

डॉक्टरों, नर्सों और अस्पताल के सहायक कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर समय-समय पर हड़तालें की है और पिछले दो सालों में भी कई हड़तालें की हैं, लेकिन हमेशा यह सुनिश्चित किया है कि अस्पताल में आने वाले मरीजों को इससे नुकसान न हो। शासक वर्ग ने स्वास्थ्य कर्मियों से किए गये अपने हर वादे को तोड़ने के लिए महामारी को बहाना बनाया है। पूरे देश में यह बार-बार दोहराया गया है कि – स्वास्थ्य कर्मी अपनी मांगों की सुनवाई के लिये हड़ताल करते हैं और विरोध प्रदर्शन करते हैं। लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें स्वास्थ्य कर्मियों की हालतों में सुधार किये बिना और उनकी आवास की स्थिति को बदले बिना ही मज़दूरों के गुस्से को ठंडा करने के लिए बार-बार झूठे वादे करती रही हैं।

हाल ही में 4 सितंबर, 2021 को दिल्ली के एम्स की नर्स यूनियन और कर्मचारी यूनियन ने 25 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल करने का नोटिस दिया था। उन्होंने 47 मांगें रखी हैं, जिनमें प्रमुख है वेतनमानों और भत्तों में केंद्र सरकार के कर्मचारियों के साथ समानता। यह एम्स के संचालन नियमों के अनुसार है जिसका अधिकारी उल्लंघन कर रहे हैं। उनकी अन्य महत्वपूर्ण और लंबे समय से चली आ रही मांग है कि नर्सों और अन्य कर्मचारियों के पदों की संख्या बढ़ाई जाये। अस्पताल में कई नये चिकित्सा विभाग बनाए गए हैं, जबकि इन सेवाओं के लिए पदों की संख्या जस की तस बनी हुई है।

2021 के मई और जून में मध्य प्रदेश के जूनियर डॉक्टरों ने अपने वजीफे में 24 प्रतिषत की बढ़ोतरी और 6 प्रतिषत वार्षिक की सुनिश्चित बढ़ोतरी (जो मुश्किल से जीवन यापन की लागत में हुई बढ़ोतरी को पूरा करती है), बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और कोविड-19 से संक्रमित अपने परिवारों का मुफ्त इलाज कराने की मांगों को पूरा करने के लिये प्रदर्शन किया था।

अक्तूबर 2020 में दिल्ली के उत्तरी नगर-निगम द्वारा संचालित हिंदू राव अस्पताल, राजन बाबू टीबी अस्पताल और कस्तूरबा गांधी अस्पताल के डॉक्टरों को अपने वेतनों का भुगतान करने की मांग को लेकर हड़ताल पर जाना पड़ा था, जो कि पिछले चार महीने से बकाया थे! उस समय राजधानी दिल्ली में 5,000 रेजिडेंट डॉक्टरों ने इन अस्पतालों के डॉक्टरों के समर्थन में सांकेतिक हड़ताल की थी। हड़ताल का आह्वान करने से पहले रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सों की यूनियनों ने अस्पतालों के अधिकारियों सहित नगर-निगम के अधिकारियों के सामने कई बार अपनी समस्याएं रखी थीं।

कई राज्यों में रेजिडेंट डॉक्टरों, नर्सिंग कर्मचारियों तथा अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों ने अपने वेतनों के बकाये के भुगतान, रिक्त पदों को न भरे जाने, रेजिडेंट डॉक्टरों की सेवा अवधि में विस्तार, परीक्षाओं की तैयारी पूरी न कर पाने और परीक्षाओं को प्रशासन द्वारा मनमाने ढंग से पुनर्निर्धारित करने, आदि के बारे में अपनी शिकायतें पेश की हैं।

यह बात निंदनीय है कि समाज की इतनी सेवा करने वाले स्वास्थ्य कर्मियों को अपनी जायज मांगों के लिए धरना प्रदर्शन करना पड़ रहा है।

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