उत्तर प्रदेश और हरियाणा में किसानों पर हो रहे खूंखार हमले की कड़ी निंदा करें

3 अक्टूबर को, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में चार किसानों सहित आठ लोगों की मौत हो गई थी, जब राज्य के उपमुख्यमंत्री के एक काफिले ने, यहां पर उनके दौरे का विरोध कर रहे किसानों को जानबूझकर टक्कर मारी। कई को गंभीर चोटें आई हैं। काफिले के सदस्यों ने शांतिपूर्वक विरोध कर रहे किसानों पर गोलियां चलाईं, जिसमें कई अन्य घायल हो गए। क्षेत्र के भाजपा सांसद जो एक केंद्रीय मंत्री भी हैं, उनके बेटे ने, जो काफिले का नेतृत्व कर रहे थे, खुलेआम घोषणा की कि किसानों को पता होना चाहिए कि वे किसको चुनौती दे रहे हैं – वह अपने आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में डींग मार रहे थे जिसको राज्य में सभी लोग अच्छी तरह से जानते हैं।

उसी दिन, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने अपनी पार्टी के सदस्यों को, कुछ सैकड़ों लोगों को इकट्ठा करके, लाठियां लेकर, राज्य के विभिन्न जिलों में विरोध कर रहे किसानों पर हमला करने के लिए उकसाया। उन्होंने यह भी घोषणा की कि उन्हें कुछ दिन जेल में बिताने की चिंता नहीं करनी चाहिए, यदि जरूरत पड़ी, तो उन्हें ‘‘हीरो’’ भी बना दिया जाएगा।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, लखीमपुर खीरी में, किसानों की निर्मम हत्या की कड़ी निंदा करती है। हम किसान आंदोलन से जुड़े बहादुर किसानों पर खूनी हमले आयोजित करने के लिए, अराजकता और हिंसा फैलाने के हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारों के खुलेआम आह्वान की निंदा करते हैं।

केंद्र सरकार से, तीन किसान विरोधी कानूनों को निरस्त करने की अपनी न्यायोचित मांग के समर्थन में, किसान एक साल से अधिक समय से, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। किसानों के संघर्ष को पूरे देश में श्रमिकों और मेहनतकश लोगों के अन्य सभी वर्गों के बीच बढ़ता समर्थन मिल रहा है। केंद्र सरकार के अहंकारी, अड़ियल रवैये के ख़िलाफ़ और जिस सरकार ने उनकी मांगों को मानने से इनकार कर दिया है, पूरे देश में 500 से अधिक किसान यूनियनों के संयुक्त संगठन, संयुक्त किसान मोर्चा, ने सभी मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन आयोजित करने का आह्वान किया है, जब-जब हरियाणा और यूपी राज्य सरकारें, जनसभाएं आयोजित करती हैं। संयुक्त किसान मोर्चे के इस आह्वान के समर्थन में किसानों की प्रतिक्रिया, बहुत ही जबरदस्त रही है। इन परिस्थितियों में, किसान आंदोलन को बदनाम करने के लिए, केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारें, जानबूझकर हिंसक घटनाओं को भड़का रही हैं। इसलिए, 28 अगस्त को, हरियाणा के मुख्यमंत्री की करनाल यात्रा का विरोध कर रहे किसानों के ख़िलाफ़, हरियाणा पुलिस ने क्रूर हिंसा और हमले का आयोजन किया। मुख्यमंत्री के दौरे के प्रभारी सरकारी अधिकारी को, पुलिस से, किसानों के सिर फोड़ने की अपील करते हुए, सुना गया।

लखीमपुर खीरी में जो हुआ वह कुछ नया नहीं है। हिन्दोस्तानी राज्य ने किसानों के ख़िलाफ़ हिंसा आयोजित करने और फिर हिंसा के लिए किसानों को ही दोषी ठहराने की नीति का पालन किया है।

दस महीने पहले, जब किसानों ने घोषणा की थी कि वे 26 नवंबर को किसान विरोधी कानूनों के विरोध में दिल्ली आएंगे, केंद्र सरकार और हरियाणा सरकार ने पंजाब-हरियाणा सीमा पर किसानों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर हिंसा आयोजित की। पुलिस ने राजमार्गों को खोदा, सड़कों पर बैरिकेडिंग की, और किसानों के ख़िलाफ़ पानी की बौछार और आंसू गैस के गोले छोड़े। सरकारों ने किसानों के साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे वे किसी दुश्मन देश के साथ युद्ध कर रहे हों। लेकिन इन सब खूनी कोशिशों के बावजूद वे किसानों को, दिल्ली की सीमाओं तक पहुंचने से रोकने में नाकाम रहे।

फिर 26 जनवरी को, केंद्र सरकार ने जानबूझकर अराजकता और हिंसा फैलाने की योजना बनाई ताकि किसान आंदोलन को बदनाम किया जाये और उनमें फूट डाली जा सके। इस नापाक मकसद के लिए उसने सबसे पहले किसानों को दिल्ली में किसान रैली आयोजित करने की अनुमति दी। इसके बाद उसने, आखिरी समय में जानबूझकर रैली के रास्ते बदल दिए, जिससे कुछ किसान लाल किले तक पहुंच गए। इसने रास्ते में, विभिन्न स्थानों पर टकराव की घटनाओं का भी आयोजन किया। फिर इसने निरंतर प्रचार किया कि कैसे किसान राष्ट्र-विरोधी थे। इसका उद्देश्य देश की व्यापक जनता की नज़र में, किसान आंदोलन को बदनाम करना था।

हमारे देश के किसानों के एकजुट, जुझारू संघर्ष को, सभी वर्गों के लोगों का बढ़ता समर्थन मिल रहा है। इस समर्थन को कमज़ोर करने और किसानों के संघर्ष को कुचलने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य अराजकता और हिंसा फैला रहा है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि किसानों के ख़िलाफ़ इस संगठित और उत्तेजक हिंसा के लिए शासक ही जिम्मेदार है।

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