रोज़गार की मात्रा और गुणवत्ता, दोनों में भारी गिरावट

हमारे देश की आबादी का एक बहुत बड़ा तबका अपनी रोजी-रोटी कमाने में असमर्थ है। लाखों परिवार दो वक़्त की रोटी के लिए भी मोहताज हैं। अपनी आमदनी में होने वाली कमी की वजह से, उन्हें जिससे भी उधार मिल सकता है उससे लेकर वे जीने के लिये लाचार हैं। बेरोज़गारी की समस्या दिन पर दिन और भी जटिल होती जा रही है और इसी के साथ शहरी और ग्रामीण क्षेत्र दोनों में कर्ज़ की समस्या भी बढ़ती जा रही है ।

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रोज़गार के लिए कतार में लगे युवा

शासक वर्ग अक्सर हिन्दोस्तान के “जनसांख्यिकीय लाभांश” (डेमोग्राफिक डिविडेंड) के बारे में बहुत शेखी बघारता है। देश में अधिकतर युवा आबादी होने के कई फ़ायदे हैं। दो-तिहाई से अधिक हिन्दोस्तानी आबादी कामकाजी उम्र की है, जिसे 15-64 वर्ष की आयु की श्रेणी से पारिभाषित किया जाता है। यह विश्व के अन्य देशों के औसत से काफी अधिक है। हालांकि, यह भी सच है कि युवा आबादी का संभावित फ़ायदा, आज पूरी तरह से बर्बाद हो रहा है क्योंकि देश का यही तबका, यानी कि कामकाजी उम्र के लोगों को इस वर्तमान व्यवस्था में नौकरी या स्वरोज़गार के कोई और साधन नसीब नहीं हो पा रहे हैं।

शासक वर्ग के प्रवक्ता बड़ी आसानी से इस समस्या के लिए, कोरोना वायरस पर दोष मढ़ देते हैं। हालांकि, आंकड़े स्पष्ट बताते हैं कि कोरोना वायरस महामारी फैलने के काफी पहले से ही देश में पिछले कई वर्षों से रोज़गार में गिरावट आ रही है। पिछले 18 महीनों के दौरान बार-बार लागू किए गए लॉकडाउन ने पहले से ही एक गंभीर समस्या को और भी संगीन बना दिया है – देश में उपलब्ध मानव संसाधनों को उचित रोज़गार प्रदान करने में देश की आर्थिक प्रणाली पूरी तरह से असमर्थ है।

2021 में लगभग 140 करोड़ की कुल आबादी में से, हिन्दोस्तान की कामकाजी उम्र की आबादी लगभग 94 करोड़ है। इस कामकाजी उम्र की आबादी में से अनुमानित 43.3 करोड़ लोग या तो किसी नौकरी में लगे हुए हैं या सक्रिय रूप से ऐसे रोज़गार की तलाश में हैं। वे देश की श्रम-शक्ति का हिस्सा हैं। इनमें से केवल 39.7 करोड़ लोगों के पास ही नौकरी है और बाकी 3.6 करोड़ लोग बेरोज़गार हैं। नौकरी करने वालों में दोनों, वेतन पाने वाले (लगभग 21 करोड़) और स्व-रोज़गार करने वाले (18.7 करोड़) लोग शामिल हैं।

रोज़गार में गिरावट

श्रम शक्ति के जिस हिस्से को नौकरी मिली है, उस हिस्से के कामकाजी-आयु की कुल जनसंख्या के अनुपात को रोज़गार की दर कहा जाता है। कोरोना वायरस महामारी से पहले से ही यह रोज़गार की दर लगातार गिरती आ रही है। यह 2018-19 में 46 प्रतिशत से गिरकर 2019-20 में 45 प्रतिशत हो गयी थी। अगस्त 2021 में इस दर का केवल 42 प्रतिशत रहने का अनुमान है।

IT_companies_unemployment_400मार्च 2020 से कोरोना वायरस महामारी और बार-बार लगाये गए लॉकडाउन ने दसों लाखों नौकरियों और स्व-रोज़गारों की आय के स्रोतों को भी नष्ट कर दिया है। पूंजीवादी कंपनियों ने काम करने वाले मज़दूरों की संख्या में कटौती की है और दैनिक काम के घंटों में वृद्धि की है। कई लघु उद्योग स्थायी रूप से बंद हो गए हैं।

इस स्थिति का महिलाओं पर विशेष रूप से बहुत ही बुरा असर पड़ा है। लॉकडाउन के दौरान बड़ी संख्या में महिलाओं की नौकरी खोने के लिए जिम्मेदार कारकों में से एक, सार्वजनिक परिवहन की कमी है। एक अन्य कारण यह है कि वस्त्र-उद्योग में बड़ी संख्या में महिलाएं कार्यरत हैं, जिनको असेंबली लाइनों में एक-दूसरे के निकट काम करना पड़ता है। इनमें से अधिकांश फैक्ट्रियां लॉकडाउन के दौरान पूरी तरह से बंद हो गईं और कई तो इतने महीनों बाद भी, अभी तक अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाई हैं। घरेलू कामगार के रूप में काम करने वाली कई महिलाओं ने भी लॉकडाउन के दौरान अपनी नौकरी खो दी।

युवा पीढ़ी पर इसका बहुत बुरा असर पड़ा है। महामारी से पहले भी युवा-बेरोज़गारी दर बहुत बुरी थी। 2019-20 में 15-24 आयु वर्ग के 44 प्रतिशत लोग बेरोज़गार थे। इस समय, यह अनुपात लगभग 54 प्रतिशत होने का अनुमान है। यानी हिन्दोस्तान के आधे से ज्यादा युवा-मज़दूर बेरोज़गार हैं और उनका भविष्य अंधकारमय है!

काम की तलाश के लिये मजबूर बेरोज़गार व्यक्तियों की कुल संख्या 2019-20 में लगभग 2.5 करोड़ थी जो बढ़कर अब 3.6 करोड़ हो गई है।

श्रम शक्ति की भागीदारी में गिरावट

रोज़गार की संभावनाएं इतनी ख़राब हैं कि बहुत से लोग श्रम-शक्ति से पूरी तरह बाहर हो गए हैं। उन्होंने नौकरी तलाशने की कोशिश करना भी बंद कर दिया है। यह सच्चाई, श्रम-शक्ति-भागीदारी दर (एल.पी.आर.) में आई गिरावट के आंकड़ों में दिखाई पड़ती है।

Government-Jobs-Goa_400एल.पी.आर. श्रम शक्ति की कामकाजी आयु की कुल जनसंख्या का अनुपात है। यह आंकड़ा इस बात को दर्शाता है कि देश की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था सामाजिक उत्पादन प्रक्रिया में उपलब्ध कार्य शक्ति का किस हद तक उपयोग कर रही है। यह कामकाजी उम्र की उस आबादी का अनुपात है जिनके पास या तो नौकरियां हैं या सक्रिय रूप से वे रोज़गार की तलाश में हैं। 2016-17 से श्रम शक्ति की भागीदारी दर लगातार गिरती जा रही है। इस समय यह दर लगभग 46 प्रतिशत है। यह पुरुषों के लिए लगभग 70 प्रतिशत और महिलाओं के लिए 20 प्रतिशत से भी कम है।

रोज़गार की गुणवत्ता में गिरावट

बड़े पैमाने पर नौकरियों और लोगों की रोज़ी-रोटी के स्रोतों के विनाश के साथ-साथ, एक तरफ लोगों की असुरक्षा दिन पर दिन बढ़ती जा रही है और दूसरी तरफ जिनके पास नौकरी है उनके काम करने के हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं।

बड़े और छोटे निजी उद्यमों, दोनों में, मज़दूरों के ऊपर किसी भी समय अपनी नौकरी खोने का ख़तरा मंडराता रहता है। उनके पास आजीविका की कोई सुरक्षा नहीं है। अधिकांश पूंजीवादी कंपनियों में नियमित स्थायी नौकरियों को बड़े पैमाने पर अस्थायी और निश्चित अवधि के अनुबंधों वाली नौकरियों में बदल दिया गया है। सार्वजनिक उद्यमों में निजीकरण के कार्यक्रम के कारण इन उद्यमों के मज़दूरों को नौकरी खोने का ख़तरा है।

नौकरियों पर काम करने वाले ऐसे करोड़ों लोग हैं जो अपनी योग्यता से कहीं बदतर श्रेणी का काम करने के लिए मजबूर हैं और उन्हें बहुत ही कम वेतन पर काम करना पड़ रहा है। वे बहुत लंबे घंटों तक काम करते हैं और उन्हें अधिक घंटों तक काम करने के लिए, अतिरिक्त वेतन भी नहीं दिया जाता है। वे इस अन्याय के ख़िलाफ़ अपना विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार से भी वंचित हैं।

हमारे शहरों में डिलीवरी मज़दूर (खाद्य वितरण या कूरियर सेवा वाले मज़दूर) और ओला या ऊबर के ड्राइवर ऐसे मज़दूरों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं जिनके पास न तो नौकरी की सुरक्षा है और न ही उनको अधिक घंटे काम करने के लिए कोई अतिरिक्त वेतन मिलता है। उन्हें नियमित वेतन भी नहीं दिया जाता है। उन्हें केवल प्रोत्साहन बतौर कुछ भत्ता मिलता है परन्तु उन्हें अपने व्यवसाय को चलाने के खर्चों की पूरी लागत खुद ही वहन करनी होती है। जैसे कि डिलीवरी कर्मचारियों को उनके वाहनों के लिए ज़रूरी ईंधन की कीमत खुद चुकानी पड़ती है। ओला और ऊबर ड्राइवर अपने वाहन लेने के लिए कर्ज़ लेते हैं और उन्हें अपनी मामूली आमदनी से ही कर्जे़ की मासिक किश्त (ई.एम.आई.) का भी भुगतान करना पड़ता है। ये तथाकथित “गिग” कर्मचारी, “वेतन वाली नौकरी” और “स्व-रोज़गार” के बीच में आते हैं, हालांकि वे एक कंपनी के लिए काम करते हैं लेकिन उस काम के लिए न तो कोई अनुबंध होता है और न ही कोई निश्चित वेतन और न ही किसी भी प्रकार का भत्ता मिलता है। वे लंबे समय तक काम करते हैं, दिन में 16 घंटे तक!

घरेलू आय को प्रभावित करने वाले दो कारक हैं। एक तो नौकरी न मिलने की मजबूरी या स्व-रोज़गार के माध्यम से रोज़ी-रोटी का कोई साधन खोजने में असमर्थता। दूसरा यदि किसी तरह नौकरी मिल जाए तो बहुत कम मज़दूरी पर काम करने की मजबूरी। नियमित वेतन पर कार्यरत बहुत से लोगों ने अपनी नौकरियां खो दीं और उनके पास रोज़ी-रोटी कमाने का और कोई साधन भी नहीं था। ठेके या दैनिक मज़दूरी पर काम करने वाले बहुत से लोगों को कुछ रोज़गार तो मिला, लेकिन बहुत कम मज़दूरी की दरों पर।

आज हालात ये हैं कि घरेलू इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को ठीक करने के लिए घर-घर तकनीकी सेवायें देने के लिए एक इंजीनियर आता है जिसके पास एक मास्टर्स डिग्री भी है; या फिर एक स्कूल वैन चालक जो ऋण पर खरीदे गए ई-रिक्शा को चलाकर अपनी रोज़ी-रोटी कमाने के लिए संघर्ष कर रहा हो; या कोई व्यक्ति जो पहले किसी 5-स्टार होटल में शेफ के रूप में काम करता था, अब एक एन.जी.ओ. के लिए काम कर रहा है और इस तरह अपने पहले के वेतन का केवल पांचवां हिस्सा ही कमा पा रहा है।

आमदनी में होने वाले नुक़सान से निपटने के लिए परिवारों को अपनी पारिवारिक संपत्ति तक बेचनी पड़ रही है या भारी उधार लेना पड़ा है, जिसमें परिवारों की आय का 2 से 6 गुना तक का कर्ज़ होता है। हाल ही में किये गए एक कोविड-19 आजीविका सर्वेक्षण के अनुसार, सबसे ग़रीब परिवारों (निचले 25 प्रतिशत) पर उनकी मासिक घरेलू आय का लगभग चार गुना कर्ज़ का बोझ पाया गया और यह कर्ज़ भी, बड़े साहूकारों से उच्च ब्याज दरों पर लिए गया है, जिसका मतलब है कि आगे लंबे समय तक ग़रीबों को और भी बदतर हालातों का सामना करने की मजबूरी। हाल के महीनों में ईंधन और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों ने ग़रीबों के लिए घरेलू आमदनी पर बोझ को और भी बढ़ा दिया है।

समस्या की जड़

Youth_unemployment-3_400पूंजीवादी उत्पादन, उत्पादन के साधनों के मालिकों (पूजीपतियों) द्वारा निजी मुनाफ़़े को अधिकतम करने के उद्देश्य से संचालित होता है। पूंजीपति मज़दूरों को दी जाने वाली मज़दूरी को उत्पादन की लागत मानते हैं, जिसे पूंजीवादी मुनाफ़े को ज्यादा से ज्यादा करने के लिए कम से कम किया जाता है। इसका मतलब है कि पूंजीपति कम से कम मज़दूरों से ज्यादा से ज्यादा काम करवाने और इसलिए काम के घंटे बढ़ाने का लगातार प्रयास करते हैं। पूंजीवादी उत्पादन अनिवार्य रूप से बेरोज़गारों की एक सेना के निर्माण की ओर ले जाता है, जो पूंजीपति वर्ग के लिए एक रिज़र्व के रूप में कार्य करती है और जिसका उपयोग मांग में तेज़ी से बढ़ोतरी होने पर किया जाता है। इस सच की खोज कार्ल मार्क्स ने 150 साल से भी पहले की थी। उन्होंने इसे “बेरोज़गारों की रिजर्व सेना” कहा था।

इजारेदार पूंजीवाद के चरण में पूंजीवाद, छोटे पैमाने के उत्पादकों और व्यापारियों को लगातार और समय-समय पर कंगाल करता रहता है। इस प्रकार जैसे-जैसे इजारेदार पूंजीवाद बढ़ता है, वह अपने द्वारा सृजित नई नौकरियों की तुलना में कहीं अधिक नौकरियों और स्व-रोज़गारों के स्रोतों को नष्ट कर देता है।

वर्तमान समय में एक विशिष्ट अतिरिक्त कारक यह भी है कि पूंजीपतियों ने कोविड महामारी का उपयोग श्रम के शोषण को बढ़ाने के लिए किया है, मज़दूरों की संख्या में और कटौती की है तथा हर दिन प्रत्येक मज़दूर का अधिक शोषण करके और भी अधिक उत्पादन निकाला है।

निष्कर्ष

बेरोज़गारी की समस्या का एकमात्र स्थायी समाधान पूंजीवाद को समाजवाद में तब्दील करना है। बड़े पैमाने पर उत्पादन के साधनों को पूंजीवादी निजी संपत्ति से समाजवादी आम संपत्ति में बदलने से आर्थिक निर्णयों पर निजी मुनाफ़े के मक़सद का वर्चस्व समाप्त हो जाएगा। एक अमीर अल्पसंख्यक के मुनाफ़े को अधिकतम करने के लिए उत्पादन करने की बजाय, सामाजिक उत्पादन को देश की पूरी आबादी की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में मोड़ा जा सकता है।

सभी लोगों की बढ़ती भौतिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सभी आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में बड़े विस्तार की आवश्यकता होगी। काम करने की उम्र की सभी महिलाओं और पुरुषों जो काम करने के लिए उत्सुक और तैयार हैं, उन सभी को नौकरी मिलेगी जिसके द्वारा वे सभी के लिए ज़रूरी उत्पादक वस्तुएं उपलब्ध कराने के सामूहिक प्रयास में अपना योगदान दे सकेंगे। जैसे-जैसे श्रम की उत्पादकता, समय के साथ बढ़ती है, पूर्ण रोज़गार बनाए रखते हुए कार्य दिवस के घंटो को क्रमश: कम किया जा सकता है।

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