टमाटर की कीमतों में गिरावट से किसानों को भारी नुकसान

27 अगस्त को महाराष्ट्र के नासिक में किसानों ने अपने टमाटरों के दर्जनों डिब्बों को सड़क पर और बाजार के चौक में फेंक दिया। वे उस कीमत का विरोध कर रहे थे जिस पर उन्हें अपनी फ़सल बेचनी पड़ी रही थी।

नासिक और तोशान, हरियाणा में टमाटर की कीमतें अगस्त 2021 में 7.5 रुपये प्रति किलोग्राम और जुलाई 2021 में 10.5 रुपये प्रति किलोग्राम थी। उससे गिरकर अब सितंबर 2021 में वे 25 किलोग्राम के पेटी के लिए 50 रूपए, यानि 2 रुपये प्रति किलोग्राम, हो गई हैं। पिछले साल जुलाई में टमाटर का थोक भाव 20.4 रुपये प्रति किलो था।

Nasik_farmers_dump_tomatoes_400नासिक में, किसान अपनी उपज को थोक बाजार में नहीं ला रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि जो फसल की कीमत है वह परिवहन लागत को भी पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हरियाणा के किसानों ने भी कहा कि वे लागत वसूल नहीं कर पा रहे हैं।

नवीनतम आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, देश की बाग़वानी फ़सल उत्पादन 2020-21 मौसम में 33 करोड़ टन के उच्चतम स्तर को छूने के लिए तैयार है, जो उत्पादन में लगभग 3 प्रतिषत की वृद्धि है।

यह पूरे देश के लिए उत्सव का अवसर होना चाहिए। दूसरी ओर, यह उत्पादकों यानि किसानों के लिए एक आपदा है। कृषि लागत और मूल्य आयोग के अनुसार, एक किसान अपनी जमीन पर एक किलोग्राम टमाटर उगाने के लिए कम से कम 4 रुपये ख़र्च करता है। किराए की जमीन और किराए के मज़दूरों के साथ, एक किलो टमाटर उगाने की लागत 8-10 रुपये प्रति किलोग्राम तक जा सकती है। इसलिए, 2 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत के साथ किसानों की आय को भारी नुकसान हो रहा है।

चाहे सब्जियां हों या तिलहन या मिर्च या चीनी, सभी को लेकर उत्पादकों को अत्यधिक मूल्य अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है। टमाटर जैसी जल्दी खराब होने वाली उपज के मामले में यह समस्या बहुत ज्यादा विकट हो जाती है, क्योंकि इन्हे लंबे समय तक संग्रहित नहीं किया जा सकता है, जब तक कि किसान के पास ठन्डे भंडारण घर की सुविधा न हो। किसानों को व्यापारियों की रहम पर रहना पड़ता है, जो उनसे सस्ते में ख़रीद कर खुदरा बाज़ार में मंहगे बेच देते हैं। इस वजह से, शहरों में काम करने वाली आबादी, जो उत्पाद खरीदती है, उसे भरपूर आपूर्ति होने के बावजूद उसका लाभ नहीं मिलता है। लेकिन जब खुदरा बाज़ार में आपूर्ति कम होती है, तो वे आसमान को छूने वाली क़ीमतों का भुगतान करते हैं।

निस्संदेह, इस संकट का कारण शासक वर्ग द्वारा गारंटीकृत ख़रीद मूल्य पर किसानों की फ़सल को नहीं खरीदा जाना है। कृषि मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता इस परिस्थिति के लिए यह कहकर सफाई दे रहे हैं कि एक मौसम में कीमतें अगले मौसम में फसल पैटर्न को प्रभावित करती हैं, और किसानों को 2020-21 में टमाटर की इतनी उपज करनी ही नहीं चाहिए थी!! यह केवल वर्तमान व्यवस्था की अराजकता को दर्शाता है। यह उत्पादन को व्यवस्थित करने और लागत और उपज की कीमतों को निर्धारित करने की आवश्यकता को दर्शाता है, ताकि किसानों को मानव अस्तित्व की गारंटी दी जा सके। यह 2022 या किसी अन्य वर्ष तक किसानों की आय को दोगुना करने के झूठे वादों का भी स्पष्ट रूप से पर्दाफाश करती है।

अर्थव्यवस्था की दिशा उत्पादकों की भलाई को सुरक्षित करने की ओर नहीं है। इसके विपरीत, केंद्र द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के माध्यम से सरकार ठीक इसका उल्टा काम कर रही है। किसान देश में कहीं भी बिना बाधाओं के अपनी उपज बेच सकेंगे के नाम पर, उनका असली उद्देश्य है इजारेदार निगमों को कृषि में प्रवेश करने में सक्षम बनाना। जिन परिस्थितियों ने लाखों किसानों को बर्बादी और आत्महत्या की ओर धकेला है, उन्हें उसी दिशा में और धकेला जा रहा है।

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